नए अंदाज में सुनिये कुमाऊनी होली मोहन गिरधारी
होली के जश्न में चार चाँद लगाती है कुमाऊनी होली ‘हां, हां, हां, हां… मोहन गिरधारी… रूमानी छेड़छाड़ और चुहल भरी यह होली उत्तराखण्ड की पारंपरिक लोकप्रिय होलियों में से है. (Moh... Read more
इस बसंत गिर्दा की संगीतमय कविता का रस
कबूतरी देवी, भानुराम सुकोटी गिर्दा और हीरा सिंह राणा के सर्वकालिक लोकप्रिय गीतों को रीक्रियेट कर चुके करन जोशी के यू ट्यूब चैनल केदारनाद बसंती मौसम में गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ का र... Read more
अपनी दुधबोली से एक परिचय
कुमाऊनी भाषा उत्तराखंड के कुमाऊँ मण्डल के छह जनपदों में बोली जाती है. इसके अलावा देश के विभिन्न भागों में जहां-जहां भी प्रवासी कुमाऊनी रहते हैं, वे भी सामान्य भाषा का प्रयोग करते हैं. इस तरह... Read more
कुमाऊंनी लोकसाहित्य में अनेकानेक पक्षियों का उल्लेख है. मोनाल, तीतरी, शुक, कव्वा, गौतेली, कफुआ, हुट-हुटिया आदि. लेकिन घुघुत का उल्लेख कुमाऊंनी लोकसाहित्य में खुल कर हुआ है. एक लोकगीत में घुघ... Read more
उत्तराखण्ड की लुप्त होती पारंपरिक लोककलाओं के दौर में ही ऐपण के अच्छे दिन चल रहे हैं. कुमाऊं की चित्रकला ऐपण के गांवों से शहरों, कस्बों और महानगरों तक पैर पसारने का सिलसिला चल निकला है. हेमल... Read more
रैदास के वंशज हैं उत्तराखण्ड के दास
यूं तो हिंदी भाषा में दास शब्द का सामान्य अर्थ है किसी के अधीन रहने वाला सेवक नौकर— दास के कई रूप हुआ करते हैं. लेकिन उत्तराखण्ड में दास ताल वाद्य बजाने और देववाणी गाने वाले ख़ास जनों को कहा... Read more
रामजन्म से उनकी जलसमाधि तक
हमरी सीता हैं रात अँजोरी तोहरे राम हैं कारा भँवरवा जब कवि अपनी बोली -भाषा या कहें कि मातृभाषा में कविता रचता है ,तो वह मात्र कविकर्म ही नहीं कर रहा होता है, अपितु वह अपनी लोकपरंपरा, संस्कार... Read more
लोककथा : शेरू और श्याम
सावित्री ने आज घर पर ही रहने का फैसला किया. थकाऊ खेती के काम से आज उसे फुरसत मिली थी. हफ्ते दस दिन से वह इतनी व्यस्त हो गयी थी कि अपने बेटे को समय नहीं दे पा रही थी. चाहती थी कि आज वह अपने ब... Read more
लोककथा : ह्यूंद की खातिर
पुरानी बात है जब दो वक्त की रोटी जुटाना ही बड़ी बात थी. उन्नत बीज और सही जानकारी न होने की बजह से खेतों में कठिन परीश्रम करने के बावजूद भी पैदावार कम ही होती. परन्तु लोग अभाव में रहते हुये भ... Read more
लोककथा : दुबली का भूत
सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्रों में स्थायी निवास के साथ-साथ प्रायः एक अस्थाई निवास बनाने का चलन है, जिसे छानी या खेड़ा कहा जाता है. इन छाानियों में कभी खेती-बाड़ी बढ़ाने के लिए तो कभी हवा पानी बद... Read more


























