पहाड़ी लाल कद्दू की ज़ायकेदार चटनी
सर्दियों का मौसम आते ही आप पहाड़ के किसी गांव की ओर चले जायें, आपको छत पर तथा दन्यारों पर लाल-लाल कददू की लम्बी लम्बी कतारें दिख जायेंगी. दरअसल छत पर ही इन पके हुए कद्दुओं का लम्बे समय तक भं... Read more
आजादी के बाद और कुछ हुआ हो या न हो पर जिन्हें कोई नहीं जानता था वह ऊंची सीढ़ियां चढ़ गए लेकिन जो आजादी के लिए दीवानगी की हद तक पार कर गए उनकी स्मृतियां तक मिट गई हैं. हल्द्वानी का स्वराज आश्... Read more
चुड़कानी, कढ़ाही और बारिश
जब कभी कोई डॉक्टर मेरे खून की जांच करता है,तो उसमें निर्बाध प्रवाह, कुछ भांग, जखिया, गंद्रायणी जैसी खुशबू पाता है, हालांकि खून में लौह तत्व की खुशबू ज्यादा होती है, पर अपन का तो ऐसे ही है. ब... Read more
ईजा के मरने का इंतजार…
ईजा कल मरेगी या परसों इसी उधेड़बुन में रात का दूसरा पहर भी बीत गया. करीब दस साल बाद आज वह उस कमरे में सोया था जहां 40 साल पहले पैदा हुआ था. कितना खुश हुई थी कलावती. इसके बाद उसे एक बेटा-बेटी... Read more
कटकी के बिना अधूरी है पहाड़ी चाय
महानगरों से आने वाली अधिकतर बस पहाड़ी इलाकों में तड़के सुबह ही प्रवेश करती है. सुबह की ताज़ी हवा में चाय की ख़ास सुगंध आपका स्वागत करती है. पहाड़ी चाय की पहली घूट आपके शरीर को इस कदर तरोताजा कर द... Read more
4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – बत्तीसवीं क़िस्त पिछली क़िस्त का लिंक: बच्चे से बढ़कर और उससे पहले भला किसी मां के लिए क्या हो सकता है? मेरा नौवां महीना शुरू हो चुका है, डॉक्टर ने... Read more
शुमाखर की बहुचर्चित किताब है, “स्माल इस ब्यूटीफुल.” भारत जैसे विविधता भरे खेती -किसानी के माहौल के लिए इस किताब में अनुभव किये गए प्रयोग और इस्तेमाल की जा रही तकनीक उन लाखों किस... Read more
पहाड़ और मेरा जीवन- 56 मैं विद्यार्थी जीवन के दौरान और बाद में भी कई बार पैसों को लेकर थोड़ी तंगी में जरूर रहा, पर मैंने कभी पैसों की बहुत ज्यादा परवाह की हो, मुझे याद नहीं. उस लिहाज से देख... Read more
सबको शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिए
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जिसे हम जेएनयू के नाम से जानते हैं. इस यूनिवर्सिटी को कुछ लोगों ने जान-बूझकर देशद्रोहियों का अड्डा और वामपंथ का किला नाम दिया है, ताकि इस यूनिवर्सिटी की खूबियों... Read more
धारचूला में पहले टेलीफोन की पचास साल पुरानी याद
धारचूला में टेलीफोन का पदार्पण 1961 में तहसील बनने के बाद ही हुआ होगा क्योंकि उससे पहले उसके आने की संभावना कम ही थी. वह भी पुराने पोस्ट ऑफिस पर ही उपलब्ध रहा था. (First Telephone in Dharchu... Read more


























