मैमूद: शैलेश मटियानी की कालजयी कहानी
महमूद फिर ज़ोर बाँधने लगा, तो जद्दन ने दायाँ कान ऐंठते हुए, उसका मुँह अपनी ओर घुमा लिया. ठीक थूथने पर थप्पड़ मारती हुई बोली, “बहुत मुल्ला दोपियाजा की-सी दाढ़ी क्या हिलाता है, स्साले! द... Read more
हल्द्वानी के गट्टू भाई का बाघ से सामना
नई-नई शादी के पंद्रह दिन बाद उस रात गट्टू भाई की अपनी बीवी से पहली लड़ाई हुई. बीवी का लिहाज करने के उद्देश्य से उन्होंने दोस्तों की संगत में नित्य की जाने वाली शराब पार्टियों पर संयमपूर्ण रो... Read more
अल्मोड़े के पास एक गांव में अल्पबुद्धि और दीर्घबुद्धि नाम के दो दोस्त हुआ करते थे. अल्पबुद्धि, नाई और दीर्घबुद्धि, पंडित थे. दोनों निहायत आलसी और खदवे. दोनों का घर पत्नियों की मेहनत से चलता.... Read more
चट्टान से गिरकर अकाल मृत्यु को प्राप्त पहाड़ी घसियारिनों को समर्पित लोकगाथा ‘देवा’
बहुत सुन्दर गाँव था. खूब गधेरा पानी. अपनी बंजाणी घना जंगल और थी उसी गाँव में एक सुन्दर निर्मल झरने की तरह लड़की देवा. सारे गाँव की बेटी. हमेशा उसके पास एक हँसी रहती थी. दुखी से दुखी उस हँसती... Read more
भविष्य: एक पहाड़ी लोहार की कहानी
रतखाल की दुकानों से लौटे हरकराम गुमसुम से बैठे हैं. वहाँ से आते वक्त ही पैर टूटने लगे थे. दो मील का सफर ही अंतहीन हो गया था, जबकि सारा रास्ता ढलान का था. चढ़ाई होती तो घर पहुँचना मुश्किल ही... Read more
एक छोटा बालक था. उसकी दादी उसे रोज एक रोटी उसके ज्योज्याग (कमरबन्द) में बांधकर उसे भेड़ चराने भेजती थी. एक दिन भेड़ चराने से पहले उसने अपनी रोटी एक झाड़ी में छिपा दी. वापस आया तो झाड़ी से रो... Read more
कोऊ न जानत कवि की पत्नी के मन की पीर
“कब से ऐसा महसूस हो रहा है?” “ये क्या बकवास है? अरे इसमें महसूस जैसा क्या है, मैं हूँ कवि, तो हूँ.” “मैं आपसे नहीं, आपकी पत्नी से पूछ रहा हूँ.” “अरे डाक्साब,पहिले तो... Read more
हिंदी के कथाकारों में शेखर जोशी बड़ा नाम हैं. आपसी संबंध, आंचलिकता और पर्वतीय जीवन से सरोबार उनकी कहानियां दुनियाभर में पसंद की जाती हैं. अल्मोड़ा के ओलिया गांव में जन्में शेखर जोशी की कहानि... Read more
जब दूरदराज के इलाकों में सेवाएं देने के लिए शिक्षकों में कुछ अतिरिक्त योग्यताओं की जरूरत पड़ती थी
दूरदराज के इलाकों में सेवाएं देने के लिए, उन दिनों शिक्षकों में कुछ अतिरिक्त योग्यताओं की जरूरत पड़ती थी. स्वास्थ्य-सेवाओं के नाम पर, वहां पर कुछ भी नहीं होता था. डिस्पेंसरी तो छोड़िए, फार्म... Read more
इंद्रू : जिसे प्रकृति ने लोहे और पत्थरों की सख्ती से निपटने के लिए ही पैदा किया
जहाँ हमारे गाँव की हद खत्म होती है वहीं पर एक जमाने में इंद्रू सुनार की लोहे गलाने की भट्टी हुआ करती थी. इंद्रू केवल नाम भर का सुनार था, काम तो वो खेती किसानी, पशुपालन और रोजमर्रा के घरेलू क... Read more


























