माला नाम था उसका. छरहरी काया, बला की ख़ूबसूरत. लेडीज साइकिल से जब कॉलेज आती, बालों में कलरफुल स्कार्फ बाँधे कयामत ढाती थी. लड़के उसकी एक झलक पाने को उतावले रहते थे, पर वह नाक की सीध में चलती थी. चंचलता ने जैसे उसे छुआ ही नहीं था. (Column By Lalit Mohan Rayal)
लड़कों की जो गधापचीसी की उम्र होती है, उसमें वह कुछ ज्यादा ही अति विश्वासी हो जाते हैं. उसके स्वभाव को भलीभांति जानकर भी वे उसके कृपाकटाक्ष पाने को बेताब रहते. होड़ लगाकर उसकी नजरों में आना चाहते थे.
कुछ दिन हुए एक दुर्घटना में मोहन का पैर फ्रैक्चर हुआ था. वह भी उसके आशिकों में शुमार था. उन दिनों साजन नाम की म्यूजिकल हिट फिल्म आई थी जिसमें दो नायक और एक नायिका होते हैं, लेकिन दर्शकों की सिंपैथी नायकों में से एक— संजय दत्त के पक्ष में गई. फिल्म में उसका किरदार एक भावुक शायर का था, ऊपर से फिजिकली चैलेंज्ड. वह वैशाखी के बजाय हॉकी स्टिक ज़मीन पर टिका कर चलता है.
तो मोहन को दिमाग लगाने ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा. साजन से प्रेरणा लेकर वह साजन कलर की गैलिस वाली पैंट पहने हॉकी स्टिक के सहारे चलता हुआ माला के गेट पर सुबह-शाम पहरा देते मिलता. वह शायर तो नहीं था लेकिन गला उसका सुरीला था.
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रकीबों के मुताबिक मोहन ने आपदा में अवसर ढूंढा था. उनके मन में एक आशंका यह भी सता रही थी कि कहीं वह अपनी परिस्थिति-विशेष का फायदा उठाकर सिंपैथी न जुटा ले. अगर ऐसा हो गया तो फिर वे हाथ मलते रह जाएंगे. कइयों को डाह हुई, हाय हमारा पैर क्यूँ न टूटा. कहने का मतलब है, मोहन-माला सोचकर ही लड़कों के कलेजों पर साँप लोटने लगा.
नायिका के दो नौजवान भाई थे. साजन कलर की पैंट पहने मोहन पर उनकी नजर पड़ी तो उन्हें खटका सा हुआ. वे भी हमउम्र ही थे, सो उसका इरादा पढ़ने में उनसे जरा भी चूक नहीं हुई. वे जान गए कि यह किस प्रयोजन से यहाँ मौजूद मिलता है. दरअसल उसका गेट अप उसकी निशानदेही ही नहीं, वरन् उसके इरादों की चुगली सी करता नजर आता था.
शीघ्र ही उन्होंने उसका इलाज करने की ठानी. बहन की रक्षा की खातिर एक शाम उन्होंने उसका दूसरा पैर भी फ्रैक्चर कर दिया और उसे वैशाखी पर चलने को मजबूर कर दिया. मोहन प्यारे फिर कभी आसपास तक नहीं दिखाई दिए. (Column By Lalit Mohan Rayal)

उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. अब तक आपकी पाँच किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, अन्य प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं. ‘काफल ट्री\’ के सहयोगी हैं.
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