पिछली कड़ी : कुमाऊं का सबसे बड़ा सामाजिक समूह “खस” रहा : आर. डी. सनवाल
सन 1928 में अल्मोड़ा के दिगोली गांव में जन्म हुआ पूरन का, तीनों ओर से घिरे हुए पहाड़, पेड़ों का झुरमुट , आंगन में क्यारी में खिलते फूल, तरह-तरह की बेल-लता और फलों के बोट. ईजा-बाबू, कका-काकी, घर के लोग सामने दूर तक दिखते खेतों में कुछ न कुछ करते दिखते. और बड़ा हुआ तो पहाड़ में अपने घर की खिड़की पर बैठ कर वह हिमालय को एकटक देखे रहता.उसके असीमित विस्तार को देख उसकी भव्यता से मंत्र मुग्ध हो जाने उसमें खो जाने रम जाने का योग सध गया. बालपन से ही हिमालय ने उसके मन, उसकी भावना को छू लिया जिसका प्रमाण बनी पंद्रह साल की उम्र में लिखी कविता जो 1943 में हिंदी साहित्य पत्रिका “विशाल भारत” के पहले पेज में छपी. कवि का नाम था पूरन चंद्र जोशी. पढ़ने लिखने में खूब होशियार.
इंटर तक पढ़ाई अल्मोड़ा से हुई और आगे की शिक्षा के लिए लखनऊ जाना हुआ.कहीं भी रहो सोच तो बस पहाड़ में बसी रहती. वहाँ होता तो घर के खेत में कितने काम करता. कितने यार दोस्त,कितने लोग ईजा-बाबू बैणी-दाज्यू, बिरादर-पड़ोस वाले और खेत में काम करता हलिया, जागर में दमुवे की गमक से करेंट लगा देने वाला वो साजी. टेढी-मेड़ी पगडंडी पर दौड़ते-कूदते, हाँफ्ते आता स्कूल, नीचे गाड़ गधेरे. वो दूर खड़ी चट्टान जहाँ चढ़ हाथ में दराती-ज्योडा लिए जाती गांव की औरतें. पटाल के पास बैठे बतियाते हुक्का गुदगुड़ाते लोग, फौज से रिटायर हो घर में आ बसे सूबेदार सैब, कितनी कथा सुनाते लाम की. पहाड़ से बने अपने रिश्तों की याद उसे अक्सर भावुक बना देती और उसके लिए कुछ करने की भावना को लगातार उत्प्रेरित करती.
सामाजिक स्तरीकरण में इसी दिगोली गाँव वाले पूरन चंद्र जोशी की रूचि अपने लोगों के काम धंधों पर टिकती. कितने किसम की जाति, ठुल बामण, पितली बामण, हलिया, खसिया, ढोली, साजी, शिल्पकार. रोज-मर्रा की जिंदगी में अपने खेतों पर कुछ न कुछ काम करते लोग. पहाड़ में लोगों की जमीन तलाऊं वाली उपरांऊ वाली,पानी वाली तो होती ही तो पहाड़ी के इनारे किनारे कहीं बिल्कुल तांबई रंग की मिट्टी निकलती तो कहीं कमेट. ये सब घर की लिपाई पुताई के काम आता. कमेट की तो सफेद स्याही भी बनती जिसमें निंगाल की कलम डुबा धोटा लगी काली पाटी में लिखा जाता. बांजा पड़ गये खेत भी दिखते जिनकी सरहदों पर रामबाँस और कंटीले झाड़ उगे रहते. कितने किसम के पेड़, उन पर चढ़ गई लताएं और बेल. आमा को सब पता कि कौन से पेड़ की छाल , उसके पत्ते या फिर जड़ से लेकर फल तक किस काम आते.हर मास कुछ न कुछ हो रहे कौतुक, कभी संक्राति कभी देवी पूजा देली पूजा, कभी गोल्ल गंगनाथ. ऊँचे पहाड़ पर दूध परी तो कहीं थान,गाँव में हो रही रामलीला, होली के स्वांग, पूस से शुरू होली की बैठक.
अब पढ़ाई के साथ ये सब और गहरे जानना है अध्ययन करना है. ये पूरन चंद्र जोशी ही थे जिन्होंने पहाड़ की पूरी टोह कर कुछ नई सी बातें सामने रख दीं जिनका मूल पहाड़ में रहने वाले लोग थे, परिवार, कुनबा, समुदाय जिस पर अध्ययन मनन कर ऊँची डिग्री हासिल कर उन्होंने बताया कि कुमाऊं में स्तरीकरण केवल जाति पर आधारित नहीं था बल्कि इसमें भूमि स्वामित्व, राजस्व व्यवस्था, ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियाँ व शिक्षा का प्रसार भी महत्वपूर्ण कारक रहे. उनका निष्कर्ष था कि कुमाउनी समाज केवल जाति से नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के अन्य घटकों से पहचाना जाता है. मैदानों की तुलना में कुमाऊं में जाति व्यवस्था अपेक्षाकृत लचीली रही. कुछ शिल्पकार जातियों ने शिक्षा, सेना, सरकारी नौकरी व रोजगार में संलग्न रह उन्नति की. इसके साथ ही कुमाऊं में सामाजिक प्रतिष्ठा का एक बड़ा आधार भूमि स्वामित्व था जैसे ब्राह्मण व राजपूत परिवारों के पास जमीन अधिक थी तो शिल्पकार वर्ग के पास भूमि कम रही. ब्रिटिश राजस्व नीति का प्रभाव यह पड़ा कि ब्रिटिश प्रशासन ने भूमि को निजी संपत्ति में बदल दिया इससे नया ग्रामीण मध्य वर्ग बना और सामाजिक शक्ति भू स्वामियों के पास गई.
कुमाऊं का अपना पहाड़ी समाज व हिमालय की उपत्यकाओं का स्पर्श उनके लेखन पर पड़ा. लखनऊ विश्व विद्यालय के स्कूल ऑफ इकोनमिक्स व सोशियोलॉजी में उन्होंने प्रवेश लिया व शोध उपाधि प्राप्त की. जोशी ने अपने अध्ययन में खोजबीन की तीन मुख्य पद्धतियों का उपयोग किया. पहला ग्राम सर्वेक्षण, दूसरा ऐतिहासिक दस्तावेजों का सन्दर्भ व तीसरा सामाजिक व आर्थिक जानकारियों व समंको का आपसी संबंध व तुलनात्मक विवेचन.प्रोफेसर राधाकमल मुखर्जी के मार्गदर्शन में उन्होंने “उत्तर औपनिवेशिक भारत में कृषि सामाजिक संरचना व सामाजिक आर्थिक विकास उत्तरप्रदेश” शोध प्रबंध प्रस्तुत किया.
हिमालय के बारे में जानने-समझने की उनकी दृष्टि बहुत पैनी थी. बचपन से ही उन्हें पहाड़ प्यारे थे.नौले- धारे से भरता पानी, वहाँ के सीढ़ीदार खेत, गाँव से ऊपर जंगल, घास और लकड़ी बटोर कर जमा करना,पेड़ों पर बने घास के लूटे, तरह तरह के पक्षी और जंगल से आती जनवरों की आवाजें. खेतों में काम करने के रिवाज, कभी पौध लगाने, निराई गुड़ाई करने, फसल काटने में गाये गीत और रात को पहरा भी कि कहीं भालू, सुँवर, साही आ आलू गडेरी न खोद दें. ये उनके मन की गहराई में दबा छुपा था इसीलिए जब उन्होंने पहाड़ के बारे में लिखा तो उसे केवल भौगोलिक इलाके के रूप में नहीं बल्कि खास सामाजिक आर्थिक लोक थात की तरह समझा. वह कुछ समय इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टिट्यूट कलकत्ता के आयोजना विभाग में रहे जहां प्रशांत चंद्र महालनोबीस के अधीन उन्होंने द्वितीय योजना के ब्लू प्रिंट पर काम किया. 1957 से 1962 तक वह दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में रहे तथा 1962 से 1991 तक इंस्टिट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ नई दिल्ली में जहाँ अंतिम चार वर्ष तक वह संस्थान के निदेशक रहे. वह कुशल अध्यापक व अनुसन्धान कर्ता थे. सर्वांगीण विकास व क्षेत्रीय कृषि पर उनकी विशेषज्ञता रही. आर्थिक व सामाजिक पक्षों पर दस पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में व सात हिंदी भाषा में छपी तो कई शोध पत्र व लेख निरन्तर प्रकाशित हुए. जन आंदोलनों के प्रति वह संवेदनशील थे तो गाँधी दर्शन से प्रभावित रहे. 1996 में प्रकाशित उनकी पुस्तक “महात्मा गाँधी : द न्यू इकोनॉमिक एजेंडा” में उन्होंने गाँधी के ग्राम स्वराज्य, विकेंद्रित अर्थव्यवस्था व नैतिक अर्थशास्त्र का सार गर्भित विश्लेषण किया.
पूरन चंद्र जोशी ने मुख्यतः कुमाऊं के समाज का अध्ययन करते हुए ग्राम स्तर पर सर्वेक्षण किया जिसमें अल्मोड़ा का सिरकोट, खतयाड़ी, आगे दन्या के गाँव, हवालबाग विकास खंड का इलाका इत्यादि के अलावा और कई बसासतें शामिल थीं.हर गांव में उन्होने भूमि स्वामित्व संरचना व जातियों का बसाव, लोगों द्वारा किए जा रहे परंपरागत पेशे, गाँव में पढ़ाई -लिखाई की दशा व स्तर, सेना और अन्य सेवाओं में लोगों की भागीदारी की जाँच की. अन्य द्वितीयक सन्दर्भ के लिए हिमालयन गजेटियर व ब्रिटिश काल के बंदोबस्त रिकॉर्ड का उपयोग किया. उनकी पुस्तक “लैंड रिफॉर्म्स इन इंडिया : ट्रेंड्स एंड परस्पेक्टिव” अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हुई जिससे स्वतंत्र भारत की कृषि के मुख्य विश्लेषणकर्ता के रूप में उनकी पहचान बनी. इंस्टिट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ द्वारा आर्थिक वृद्धि की अध्ययन श्रृंखला में गहन ग्रामीण अनुसन्धान कार्यक्रम के क्षेत्र को उन्होंने संकीर्ण आर्थिक चरों की गतिविधियों पर ही आधारित नहीं किया बल्कि इसे एक व्यापक आधार दिया. इसमें उपनिवेश काल की कृषि संरचना, स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार, जमींदारी व किसानों की वर्ग संरचना की गहन समीक्षा की गई.
प्रोफेसर जोशी ने सामाजिक, सांस्कृतिक व सांस्कृतिक घटकों का संयोजन किया. कृषि की सामाजिक संरचना को उन्होंने समाज के वर्गों और शक्ति संतुलन के साथ देखा तथा सामाजिक आर्थिक विषमता व शैक्षिक असमानता के आधार पर विश्लेषण किया. नीति निर्माण में उनका योगदान विशिष्ट स्तर पर बना रहा. वह योजना आयोग के आर्थिक पैनल के सदस्य रहे. सूचना व प्रसारण मंत्रालय की सॉफ्टवेयर कमेटी व इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के चेयरमैन रहे. इंडियन सोशियोलॉजीकल सोसाइटी के चयनित अध्यक्ष व सोसाइटी के जर्नल सोशियोलॉजिकल बुलेटिन के संपादक रहे.
प्रोफेसर जोशी ने कुमाऊं के सामाजिक स्तरीकरण का प्रारंभिक अध्ययन किया तथा ग्रामीण सामाजिक संरचना, भूमि उपयोग, पहाड़ के समाज में हो रहे परिवर्तन तथा शिक्षा व सामाजिक गतिशीलता पर रोचक व सारगर्भित लेख लिखे. हिमालयी समाज को उन्होने सांस्कृतिक नहीं बल्कि आर्थिक क्रिया व गतिविधियों के द्वारा समझाया और स्पष्ट किया कि कुमाऊं की अर्थव्यवस्था के मुख्य तीन आधार हैं. पहला लघु स्तर की खेती क्योंकि खेत छोटे और उत्पादन सीमित होता है. दूसरा पारम्परिक काम व शिल्प तथा तीसरा सेना व सरकारी नौकरी के साथ अन्य अर्ध कुशल व साधारण कामों के द्वारा आजीवका कमाने के लिए गाँव से बाहर जाने का सिलसिला. ऐसे में यहाँ की आर्थिकी बहुल स्त्रोत आधार पर टिकी है. उनका विवेचन हिमालय का पहला समाज शास्त्रीय अध्ययन बना जिसमें उन्होंने साफ दिखाया कि पहाड़ का समाज मैदानी भारत से भिन्न स्वरूप का है क्योंकि यहाँ की सांस्कृतिक व आर्थिक परिस्थितियां भिन्न हैं. स्तरीकरण की इस दशा में जाति, कौशल, शिक्षा व प्रवास से सामाजिक संरचना बनी.
इंस्टिट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ दिल्ली में प्रोफेसर व फिर निदेशक रहते उन्होने ग्रामीण विकास व भूमि सुधार की परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जिनसे सामाजिक परिवर्तन सम्भव हों और आर्थिक वृद्धि के चर प्रभावित हों. इसप्रकार बहु विषयक व सामाजिक विज्ञान पर आधारित खोजबीन का सिलसिला चला. इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी के अध्यक्ष रहते उन्होंने समाज शास्त्रीय अनुसन्धान व अकादमिक संवाद को बढ़ावा दिया. अर्थशास्त्र व समाज शास्त्र के बीच अंतरविषयक संबंध की विधि को आपस में जोड़ा. वह “नेशनल कमीशन फॉर रूरल लेबर” के सदस्य रहे जिसने ग्रामीण मजदूरों की स्थिति, रोजगार, मजदूरी व सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के लिए नीतिगत सुझाव दिए. आईसीएसएसआर की विविध शोध परियोजनाओं से जुड़ उन्होंने समाज की समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर ध्यान दिया. उन्हें जवाहर लाल नेहरू नेशनल फेलोशिप के लिए चुना गया जहाँ उन्होंने विकास की संस्कृति पर नये अध्ययन करने का आधार बनाया.गांव के रहन सहन व कारबार को समझाने वाले उनके अनुभवों से समस्या के समाधान की गहरी समझ मिली. दूरदर्शन की सॉफ्टवेयर कमेटी के अध्यक्ष रहते खेती, काम धंधे, साक्षरता, कौशल व आम जन द्वारा भोगे जा रहे तनाव व दबाव को दूर करने वाले कार्यक्रमों की शुरुवात हुई जिसे लोगों ने बड़े ध्यान व रूचि से देखा व पसंद किया.
कई संस्थानों के सलाहकार/सदस्य के रूप में विश्वविद्यालयों की शोध परिषद व विकास नीति से जुड़े सरकारी अध्ययन समूहों में उनका योगदान रहा जिससे उन्हें केवल अकादमिक अर्थशास्त्री ही नहीं बल्कि संस्था संस्थापक विचारक के रूप में देखा गया. हिमालयी विकास की मूल अवधारणा में प्रोफेसर जोशी ने कृषि, वन, प्रवास और राज्य नीति को एक साथ रखा. उनके विश्लेषण में पर्वतीय क्षेत्र की समस्याएं केवल गरीबी या पर्यावरण की नीति नहीं है बल्कि ऐतिहासिक नीतियों, आर्थिक संरचना और प्रवास से जुड़ी जटिल प्रक्रिया है. पहाड़ की खेती जीवन निर्वाह व्यवस्था का उदाहरण बनती है इसलिए कृषि के साथ पशुपालन, वन,सेना, सरकारी नौकरी, प्रवास पर निर्भर रहते यह “बहुल आजीविका आर्थिकी” का रूप लेती है.
हिमालय की आर्थिक समस्याएं मात्र उसके भौगोलिक स्वरूप से नहीं वरन औपनिवेशिक नीतियों के कारण बढ़ती रहीं जिसमें वनों को राजकीय नियंत्रण में लेना मुख्य था जिसने आमजन के अधिकार और गतिविधियों को संकुचित कर दिया. फिर बंदोबस्त ने भूमि को निजी संपत्ति में बदल दिया. कुछ परिवार बड़े भू स्वामी हो गये तो छोटे किसान कमजोर पड़ गये. कुमाऊं और गढ़वाल को “रिक्रूटिंग क्षेत्र” बनाने से प्रवास बढ़ा, नकद आय के स्त्रोत खुले व सामाजिक संरचना बदली. अब समस्याएं केवल गरीबी व पर्यावरण जनित नहीं बल्कि ऐतिहासिक नीतियों, आर्थिक संरचना व प्रवास से जुड़ जटिल हो गईं.
कुमाऊं में जोशी ने समाज शास्त्रीय विश्लेषण किया जो सामाजिक स्तरीकरण को दिखाता था और इसको ग्राम सर्वेक्षण कर प्रकट किया गया. दूसरी तरफ गढ़वाल में ऐसे अध्ययन अधिक हुए जो व सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तन को सूचित करते थे व ऐतिहासिक स्त्रोत पर आधारित थे. गढ़वाल में इतिहास और सामाजिक संरचना पर शिव प्रसाद डबराल व गढ़वाल के ग्रामीण समाज व सामाजिक प्रभाव पर जयंती प्रसाद नौटियाल ने काम किया.
जोशी का अध्ययन बीसवीं सदी के मध्य के समकालीन कुमाउनी समाज पर केंद्रित रहा जबकि कुमाऊं की सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए कत्यूरी काल, चंद राजवंश और फिर गोरखा राज के बाद ब्रिटिश शासन के प्रभाव सहित विश्लेषित किया जाना जरुरी होता. कुमाऊं के सामाजिक स्तरीकरण में बड़ा बदलाव बंदोबस्त से हुआ. इसे स्पष्ट करने के लिए पहले के राजवंश और फिर ब्रिटिश नीति के प्रभाव की पड़ताल जरुरी थी..
ब्रिटिश शासन से पहले चंद राजाओं के शासन में कुमाऊं की भूमि व्यवस्था सामुदायिक व परंपरागत रही थी. भूमि पर स्वामित्व प्रायः भूमि समुदाय या कुलों के आधार पर माना जाता था. कई इलाकों में खातेधारी अधिकार स्पष्ट नहीं थे. किसान, काश्तकार व मुखिया के बीच सामाजिक संबंध थे कानूनी नहीं. अपनी जरूरतों की उपज प्रायः खेतिहर द्वारा स्वयं पूरी कर ली जाती थी. इस आरंभिक काल में सामाजिक मान-सम्मान मात्र भूमि से नहीं बल्कि जाति, कुल, राजा के दरबार व उसकी फौज या और किसी नौकरी के ओहदे से भी तय होता था. गोरखा काल में मनमाने कर लगे व दंड भी बढ़े जिससे अराजकता की स्थिति भी आई. उन्हें पराजित करने के बाद ब्रिटिश काल में बंदोबस्त हुआ जिसमें भूमि की नापजोख हुई व हर खेत का कानूनी स्वामी तय हुआ जिससे सरकार स्थिर राजस्व आगम प्राप्त करती रहे. अब भूमि व्यक्तिगत संपत्ति बनी जिनके पास पहले से अधिक जमीन थी वह और समृद्ध हुए व छोटे किसान व काश्तकार कमजोर पड़ गये.
बंदोबस्त के बाद कुमाऊं में एक नया मध्य वर्ग उभरा जिसमें शिक्षित ब्राह्मण, ठाकुर, जमींदार, माफीदार व सरकारी कर्मचारी के साथ वणिक समुदाय था. इनके पास अधिक जमीन थी, वह शिक्षित बन रहे थे व प्रशासन में उनका दखल बढ़ रहा था. इस वर्ग ने आने वाले समय में राजनीति, सामाजिक आंदोलन, शिक्षा, अखबार, लेखन व अन्य लोक पक्षों में प्रभावी भूमिका का निर्वाह किया. पहले समाज में जाति के अनुसार पेशे नियत थे जैसे लोहार, बढ़ई, जुलाहे, गाने बजाने वाले पर ब्रिटिश राज की नीतियों व बाजार के फैलने से पारम्परिक पेशों में स्थानीय लोगों की मांग गिरने लगी. इसने जाति आधारित पेशेगत व्यवस्था को कमजोर कर दिया.
ब्रिटिश शासन में सेना की भर्ती व शिक्षा सुविधा के विस्तार से निम्न जातियों के लोग भी लाभान्वित हुए. बंदोबस्त से सामाजिक संरचना बदल कर तीन स्तरों, भूस्वामी, छोटे किसान, भूमिहीन व शिल्पकार वर्ग के रूप में दिखाई देने लगी. पहले समाज अधिक परंपरागत व सामुदायिक था अब आर्थिक वर्ग संरचना अधिक मुखर हो गई. बंदोबस्त ने समाज को तीन तरह से बदला. इसने भूमि को निजी संपत्ति बना दिया. नया ग्रामीण मध्य वर्ग उभरने लगा. समाज आर्थिक वर्गों में विभाजित हो गया. जोशी ने जाति व्यवस्था को पहाड़ में लचीला बताया अर्थात यहाँ जाति व्यवस्था मैदानी भारत की तुलना में कम कठोर पाई गई. फिर भी कई गाँवों में अछूत प्रथा व सामाजिक दूरी काफी अधिक थी. मंदिरों में प्रवेश, नौलों, धारों व जल स्त्रोतों के उपयोग व विवाह संबंधों में प्रतिबंध थे. उनके अध्ययन में सामाजिक भेदभाव की गहराई को कम करके आँका गया.
जोशी ने सामाजिक स्तरीकरण को समझाने में भूमि स्वामित्व, आय, पेशा जैसे आर्थिक कारकों को बहुत महत्त्व दिया पर हिमालयी समाज में संस्कृति, धार्मिक परंपराएं व स्थानीय शक्ति संरचना भी महत्वपूर्ण थीं. उन्होंने लिखा कि कुमाऊं में आर्थिक स्थिति सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है. कुमाऊं का जाति-तंत्र देश के जातिगत स्वरुप का ही परिवर्तित रूप है जो मैदानी भारत जितनी कठोर और बंद नहीं है यहाँ मैदानों की भांति अत्यधिक छुआछूत व दृढ़ सामाजिक दूरी नहीं है. कुमाऊं में विविध जातियों के बीच सामुदायिक श्रम विद्यमान है. खेती के काम में सभी हलिया, सयार व अन्य की आपसी मदद लेते हैं. गीत व वाद्य यन्त्रों की मदद से फसल रोपाई कटाई चलती है. त्यौहार मेले उत्सव जागर में सबके हिस्से अपने काम हैं. यह “नरम राज्य पदानुक्रम” है जिसकी व्याख्या जोशी ने की. उनकी शोध पद्धति, क्षेत्रीय सीमा और निष्कर्षों की सामान्यता को लेकर कहा गया कि कुमाऊं एक विविधता पूर्ण क्षेत्र है जहाँ अलग-अलग घाटियों व पट्टियों की सामाजिक संरचना भिन्न है. जोशी ने जो स्थलीय अध्ययन किया वह मुख्यतः अल्मोड़ा के गाँवो तक सीमित था.
पूरन चंद्र जोशी ने कुमाउनी समाज को “अनुपस्थित आर्थिक समाज” की उपमा दी. इसमें ऐसी आर्थिक व्यवस्था पनपती है जिसमें स्थानीयता से दूरी बनी रहती है. संसाधनों का दोहन और उत्पादन ऐसी जगहों पर होता है जिनसे स्थानीय समाज बहुधा अनजान रहता है या उस प्रक्रिया से अपरिचित या अनुपस्थित रहता है. गांव वालों को यह पता नहीं होता कि उनके द्वारा उपयोग में लाई जा रही वस्तु या जिंस कहाँ और कैसे बनी और उसके बनाने में प्रकृति को कितना नुकसान हुआ. अनुपस्थित आर्थिक समाज में बहुधा यह देखा जाता है कि लोगों की जमीन गांव में है पर उसके धारक या मालिक शहरों की तरफ निकल गये हैं. युवा श्रम शक्ति आजीविका के लिए, रोजगार के लिए गांव से बाहर निकल गई है. कई दशाओं में ऐसी संरचना आंतरिक अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है जैसे बाहर काम कर रहे लोगों के द्वारा गांव में अपने परिवार को भेजी गई रकम से उनका जीवन स्तर बढ़ता है.पर जब पहाड़ के वन,जल -विद्युत, खनिज का उपयोग वाहय क्षेत्र में किया जाता है तो स्थानीय जनता को इससे सीमित लाभ ही मिलता है.
प्रोफेसर जोशी कुमाउनी समाज को “अर्ध बंद समाज” कहते थे जहाँ सामाजिक गतिशीलता का दायरा संकुचित व सीमित होता है. अपने बच्चों को स्कूल भेजने, पढ़ाई लिखाई की अभिरूचि बढ़ने के साथ लोगों की नौकरी लगने, सेना में भर्ती होने व इस प्रक्रिया में पलायन होने से पहाड़ी समाज में कई अवसर खुले. आज भी पहाड़ी समाज के ढांचे में यह प्रवृति दिखाई देती है कि शिक्षा और नौकरी के अवसर बढ़ने के बावजूद ग्रामीण समाज की पारम्परिक संरचना यथावत बनी रही. सामाजिक ढांचा इस प्रकार का होने लगता है जहाँ बाहर की दुनिया या अन्य संस्कृतियों के साथ संपर्क सीमित होता है पर पूरी तरह कटा हुआ नहीं होता. उन्होंने बताया कि कुमाउनी समाज न तो पूरी तरह बंद समाज है और न ही पूरी तरह खुला आधुनिक समाज. इसे संक्रमणशील समाज कहा जा सकता है जिससे तात्पर्य यह है कि यह पूरी तरह स्थिर नहीं है. इसके ऐसे पक्ष हैं जिनसे सामाजिक गतिविधि बदली. ब्रिटिश काल में शिक्षा की सुविधा मिलने से सीमित वर्ग सामाजिक रूप से ऊपर उठा तो फौज में भर्ती और अन्य सरकारी नौकरी के मिलने से अवसर मिले. जो लोग गाँव से निकले वह आर्थिक रूप से बेहतर हैसियत रखने लगे. इससे समाज में शिक्षित मध्यम वर्ग उभरा. आजादी के बाद सरकारी कर्मचारी बढ़े, निजी क्षेत्र की कई नौकरियों व शहर के कई छोटे बड़े कामधंधों में लोग लगे. फिर पेंशन धारियों की संख्या बढ़ी. ऐसे कई घटकों से गांव की पारम्परिक संरचना धीमे-धीमे बदलने लगी.
समाज का आंशिक रूप से बंद होना जाति आधारित सीमाओं से प्रभावित रहा. जाति व्यवस्था मजबूत थी. ब्राह्मण, राजपूत, शिल्पकार व अन्य सेवा जातियाँ थीं जिनके बीच सामाजिक तालमेल, विवाह व पेशे परम्परानुसार ही चलते रहे. प्रोफेसर जोशी ने कहा कि कुमाउनी समाज केवल जाति आधारित नहीं बल्कि भूमि, शिक्षा व पेशे के आधार पर भी स्तरीकृत है. इस सामाजिक संरचना को पलायन से हुए आर्थिक अवसर ने प्रभावित किया. इन प्रवृतियों को देखते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि पहाड़ का विकास तभी होगा जब शिक्षा व अवसर समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे, संसाधनों का समान वितरण हो तथा सामाजिक असमानता को समझते हुए नीचे के स्तर पर टिक रहे लोगों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जाए.
प्रोफेसर जोशी ने स्पष्ट किया कि ग्राम नेतृत्व, प्रशासनिक संपर्क व शिक्षा मुख्यतः कुछ सामाजिक समूहों विशेषतः कुलक वर्ग में केंद्रित थी. शिक्षा प्राप्त वर्ग सेना, प्रशासन, सरकारी व शहर की नौकरी में जाता रहा जिससे पलायन मात्र आर्थिक घटना नहीं बल्कि सामाजिक संरचना में बदलाव का भी कारण बना. ब्रिटिश काल से ही जब शिक्षा का प्रसार हुआ और नई नौकरियां आयीं तो समाज में एक नये वर्ग का विस्तार हुआ. इससे शिक्षित ब्राह्मण और राजपूत ऊपर उठे. समाज में मध्यम वर्ग उभरा. पारम्परिक जजमानी व्यवस्था के साथ कृषि समाज से जुड़ी जातियाँ लोहार, बढ़ई, बुनकर, ढोली इत्यादि की परस्पर निर्भर आर्थिक संरचना बनी रही जिनसे ग्रामीण उत्पादन तंत्र बनता था. सामाजिक प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा आधार भूमि थी जो उच्च जातियों के पास रही. फिर छोटे भूमिधारी व खेतिहर थे व भूमिहीन व सेवा प्रदान करने वाली जातियाँ थी. ऐसे में आर्थिक व सामाजिक शक्ति कुछ वर्गों में केंद्रित रही. इस तरह स्तरीकरण का बहुस्तरीय ढांचा बना रहा जिसके कारक जाति, भू स्वामित्व, पेशा, शिक्षा तथा प्रशासनिक पंहुच में निहित रहे.
उत्तराखंड के कई गांवों में सामाजिक स्थिरता इसलिए बनी रही क्योंकि प्रवासी आय से न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा मिली. सुद्रढ़ पारिवारिक व सामुदायिक संबंध व अपनी संस्कृति से जुड़ाव बना रहा. भले ही परिवार के कुछ सदस्य बाहर काम करें पर त्यौहार, धार्मिक परंपराओं के निर्वाह, कर्मकांड व पारिवारिक समारोह में गांव से जुड़े रहे जिससे सामाजिक पहचान बनी रही. सामुदायिक सम्बन्ध मजबूत होने से सामाजिक तनाव कम हुआ. गांव में परस्पर सहयोग बना रहा. सहयोग की यह परम्परा जिसमें आपसी श्रमदान, लोक पर्व, उत्सव तो शामिल हुए ही,संकट या विपदा आपदा में सहायता करने की रीत ने लोगों को आपस में जोड़े रखा. इस सामाजिक पूंजी ने समाज को स्थिर रखा.ग्रामीण समाज में परिवार,बिरादरी व रिश्तेदारी के संबंध बने रहे. प्रवास किए लोग गांव के घर, खेत व वहां रह रहे कुटुंब को छोड़ते नहीं. इससे सामाजिक ढांचा बना रहा. सेना, सरकारी नौकरी व शहरों में किए जाने वाले रोजगार से प्राप्त आय ने परिवार की आधारभूत जरूरतों को पूरा किया व जीवन स्तर बढ़ाया. पलायन से गांव की श्रम शक्ति बाहर गई जिसका प्रभाव ग्रामीण कामधधों व खेती पाती से कम उत्पादन के रूप में दिखाई दिया पर बाहर गये लोगों द्वारा भेजी रकम से आर्थिक आधार बना रहा.
पूरन चंद्र जोशी यह तर्क देते हैं कि स्वतंत्रता के बाद पहाड़ के लिए नीतियों की अनदेखी हुई. न तो कृषि का स्वरूप बदला और न ही स्थानीय कारीगरी व शिल्प का संवर्धन हुआ. पर्वतीय इलाके की समस्याएं उसकी संरचना के कारण भिन्न रहीं जो नीचे से नियोजन की अपेक्षा करती थीं. अलग राज्य की मांग के लिए भी इसी तर्क पर आश्रित रहा गया. हिमालयी अर्थव्यवस्था का वैज्ञानिक विश्लेषण करते उन्होंने मैदानी भारत के मॉडल के थोपे जाने का विरोध किया व वैकल्पिक दृष्टिकोण रखा जिसका उत्तराखंड के बौद्धिक व सामाजिक आंदोलनों पर गहरा प्रभाव पड़ा. यहाँ की कम उत्पादक खेती, बाजार की कमी, रोजगार का अभाव और बढ़ता प्रवास आर्थिक चरों की क्रिया बढ़ा न पाया. औपनिवेशिक नीतियों के चलते वनों पर राजकीय नियंत्रण व बंदोबस्त से समुदायों के अधिकार सीमित कर देना आर्थिक रूप से समाज को पंगु कर गया था. जंगल राज्य के हित लाभ के लिए संरक्षित हुए पर ग्रामीणों की आजीविका प्रभावित हुई. यह हिमालय की दुविधा का उदाहरण बना जो विकास की आवश्यकता व पर्यावरण के साथ टकराव की समस्या बना. यहाँ भौतिक विकास के लिए जारी परियोजनाएं ही उसके अस्तित्व के लिए संकट बनती गयी. अब दो विरोधी प्राथमिकताएं साथ साथ चल रही हैं पहला तो आर्थिक विकास के लक्ष्य जो निर्धनता दूर करने व रोजगार सृजन के लिए जरुरी है तो दूसरी ओर इको तंत्र जो जंगल बचाने, भूमि क्षरण रोकने के लिए प्राथमिक बनता है.
1960 से 1980 के दौर में अन्तर्राष्ट्रीय संस्थान हिमालय को पर्यावरण संकट का इलाका मानते रहे तो जोशी ने इसे निर्धनता, अल्प उत्पादन व बाजार के अभाव से ग्रस्त पाया. समाधान के लिए विकास व इको तंत्र को विरोधी नहीं वरन एक दूसरे के पूरक के रूप में संवर्धित करने की नीति बनाई. स्थानीय संसाधनों पर आधारित काम धंधे, पहाड़ी खेती में सुधार व समुदाय आधारित वन प्रबंधन की अवधारणा रखी जो कई सामाजिक आंदोलनों के रूप में उभरी जिनमें चिपको मुख्य रहा. यह तर्क स्थापित किया गया कि जंगल केवल लकड़ी व राजस्व का स्त्रोत नहीं बल्कि गांव के जीवन का आधार है. हिमालय की दुविधा में प्रोफेसर जोशी ने हिमालय के समाज को मात्र पर्यावरण की समस्या के रूप में नहीं बल्कि आर्थिक-सामाजिक रचना के रूप में व्याख्यायित किया.
अर्थशास्त्री हिमालय की आर्थिकी को निर्धनता के दुश्चक्र व न्यून स्तरीय संतुलन पाश से ग्रस्त बताते थे. निर्धनता मात्र एक समस्या नहीं बल्कि एक चक्र बनाती है जो रागनर नर्क्से के सिद्धांत के अनुसार कम उत्पादन-कम आय-कम बचत-कम विनियोग व पुनः कम उत्पादन का घेरा बढ़ाती है. हिमालय की सीमित उत्पादक खेती, पूंजी व विनियोग का अल्प प्रवाह व आवागमन की कमी से किसान को सही बाजार नहीं मिलता. साथ ही प्रवास होने के सिलसिले से सबल श्रमशक्ति का अभाव होने लगता है. इससे उत्पादकता और सिकुड़ती है. विकास के क्रम में सड़क, जल विद्युत, उद्योग को प्राथमिकता मिलती है जिसके निर्माण से भूमि, वन, खनिज, जल पर पड़ा प्रभाव पर्यावरण के किए लम्बे समय में चिंता का कारण बन जाता है. हिमालय की समस्या मात्र पर्यावरण का संकट ही नहीं यह तो गरीबी, बाजार के अधूरेपन व प्रेरित विनियोग की कमी वाली आर्थिक संरचना की दुर्बलता बन जाती है. इसे खंडित करने के लिए प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी क्षेत्रीय विकास योजना, स्थानीय संसाधन आधारित कामधंधे, ग्रामीण सड़क व ग्रामीण बाजार के नेटवर्क को निरंतर विस्तार देना जरुरी बताते रहे.
(जारी)

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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