आज भारत में किसी बड़े प्रदर्शन, छात्र आंदोलन या राजनीतिक रैली के दौरान पुलिस द्वारा आँसू गैस के गोले छोड़े जाना एक सामान्य दृश्य है. भारतीय पुलिस की भीड़ नियंत्रण प्रणाली में यह हथियार दशकों से शामिल है. इसकी कहानी प्रथम विश्व युद्ध के यूरोपीय मोर्चों पर शुरू होती है. वहीं पहली बार आधुनिक रासायनिक युद्ध का जन्म हुआ और वहीं से ऐसे रासायनिक पदार्थों पर शोध आरम्भ हुआ जिन्हें बाद में युद्ध के मैदान से निकालकर पुलिस व्यवस्था का हिस्सा बना दिया गया.
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक युद्ध में बारूद, विस्फोटक और धातु के हथियारों का ही प्रभुत्व था. रसायन विज्ञान तेजी से विकसित हो रहा था, लेकिन उसे युद्ध का मुख्य साधन नहीं माना जाता था. यूरोप की बड़ी शक्तियाँ विस्फोटकों की क्षमता बढ़ाने पर अधिक ध्यान दे रही थीं. इसी बीच जर्मनी का रासायनिक उद्योग दुनिया में सबसे आगे निकल चुका था. बायर, बीएएसएफ और होएक्स्ट जैसी कंपनियाँ नए रासायनिक यौगिक विकसित कर रही थीं. इन कंपनियों में काम करने वाले अनेक वैज्ञानिक बाद में युद्धकालीन अनुसंधान कार्यक्रमों से भी जुड़े.
1899 और 1907 के हेग सम्मेलनों में युद्ध के कुछ नियम तय किए गए. इनमें ऐसे प्रक्षेपास्त्रों के उपयोग पर आपत्ति दर्ज की गई जिनका उद्देश्य जहरीली गैस फैलाना हो. इन समझौतों ने रासायनिक हथियारों के विकास को नहीं रोका. यूरोप की लगभग सभी बड़ी सेनाएँ प्रयोगशालाओं में गैसों पर अनुसंधान करती रहीं. युद्ध की स्थिति आने पर इन प्रतिबंधों का कितना पालन होगा, इस पर किसी को विशेष भरोसा नहीं था.
जुलाई 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ. शुरुआती महीनों में किसी भी पक्ष को निर्णायक बढ़त नहीं मिली. पश्चिमी यूरोप में हजारों किलोमीटर लंबी खाइयाँ खोदी गईं. दोनों सेनाएँ महीनों तक एक-दूसरे के सामने जमी रहीं. मशीनगनों और तोपखाने ने खुले मैदान में आगे बढ़ना लगभग असंभव बना दिया. सैन्य योजनाकार ऐसे हथियार खोज रहे थे जो खाइयों में छिपे सैनिकों को बाहर निकलने पर मजबूर कर सकें.
22 अप्रैल 1915 को बेल्जियम के यीप्र (Ypres) मोर्चे पर जर्मन सेना ने लगभग 168 टन क्लोरीन गैस छोड़ी. गैस सिलेंडरों से निकला हरे रंग का बादल हवा के साथ मित्र राष्ट्रों की खाइयों की ओर बढ़ा. सैनिकों की आँखों में तीव्र जलन होने लगी, साँस लेना कठिन हो गया और बड़ी संख्या में सैनिक अपनी स्थिति छोड़कर पीछे हट गए. हजारों लोग प्रभावित हुए. आधुनिक इतिहास में पहली बार किसी देश ने औद्योगिक स्तर पर रासायनिक गैस का उपयोग युद्ध के हथियार के रूप में किया.
यीप्र की घटना के बाद रासायनिक युद्ध तेज़ी से फैल गया. जर्मनी ने फॉस्जीन और बाद में मस्टर्ड गैस विकसित की. ब्रिटेन और फ्रांस ने भी अपने रासायनिक हथियार कार्यक्रम शुरू कर दिए. कुछ ही वर्षों में तीनों देशों ने लाखों गैस गोले तैयार किए. प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने तक अनुमानतः एक लाख से अधिक सैनिक रासायनिक हथियारों से मारे जा चुके थे और दस लाख से अधिक सैनिक इनके प्रभाव से घायल हुए. युद्ध के दौरान गैस मास्क सैनिकों के नियमित उपकरण का हिस्सा बन गए.
ब्रिटेन ने 1916 में विल्टशायर के पोर्टन डाउन में अपना प्रमुख रासायनिक अनुसंधान केंद्र स्थापित किया. यहीं गैसों के प्रभाव, सुरक्षा उपकरणों और नए रासायनिक एजेंटों पर व्यवस्थित अनुसंधान शुरू हुआ. युद्ध समाप्त होने के बाद भी यह संस्थान बंद नहीं हुआ. ब्रिटिश सरकार ने इसे स्थायी अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित किया. अगले कई दशकों तक ब्रिटेन के लगभग सभी प्रमुख रासायनिक कार्यक्रम यहीं से संचालित हुए.
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जिन गैसों का सबसे अधिक नाम लिया जाता है, उनमें क्लोरीन, फॉस्जीन और मस्टर्ड गैस शामिल हैं. इनका उद्देश्य सैनिकों को मारना या स्थायी रूप से अक्षम करना था. इसी अवधि में वैज्ञानिक ऐसे रासायनिक पदार्थों पर भी काम कर रहे थे जिनका प्रभाव अपेक्षाकृत अस्थायी हो. इनसे आँखों में तेज़ जलन, लगातार आँसू, खाँसी और कुछ समय के लिए साँस लेने में कठिनाई होती थी, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में इनका प्रभाव कुछ समय बाद समाप्त हो जाता था. इन्हें *लैक्रिमेटरी एजेंट* (Lachrymatory Agents) कहा गया. आगे चलकर यही पदार्थ सामान्य भाषा में आँसू गैस के नाम से जाने गए.
युद्ध के वर्षों में इन एजेंटों का महत्व सीमित रहा क्योंकि सेनाएँ अधिक घातक गैसों पर ध्यान दे रही थीं. युद्ध समाप्त होने के बाद परिस्थितियाँ बदलने लगीं. यूरोप के कई देशों में श्रमिक आंदोलन, राजनीतिक प्रदर्शन और औपनिवेशिक क्षेत्रों में असंतोष बढ़ रहा था. सरकारों के सामने ऐसा साधन विकसित करने की चुनौती थी जिससे भीड़ को नियंत्रित किया जा सके, लेकिन हर स्थिति में गोली चलाने की आवश्यकता न पड़े. रासायनिक अनुसंधान की दिशा भी धीरे-धीरे इसी आवश्यकता के अनुरूप बदलने लगी.
1918 के बाद ब्रिटेन ने अपने रासायनिक कार्यक्रमों को केवल युद्ध तक सीमित नहीं रखा. सैन्य अधिकारी,वैज्ञानिक और औपनिवेशिक प्रशासक इस बात पर विचार करने लगे कि युद्ध के दौरान विकसित रासायनिक तकनीक का उपयोग साम्राज्य के दूसरे हिस्सों में किस प्रकार किया जा सकता है. अगले दशक में इसी विचार ने ब्रिटिश साम्राज्य की पुलिस व्यवस्था को बदलना शुरू किया. भारत भी उसी साम्राज्य का हिस्सा था.
प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार अपने चरम पर था. मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया के विशाल क्षेत्रों का प्रशासन लंदन से नियंत्रित होता था. युद्ध ने ब्रिटेन को सैन्य अनुभव तो दिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि हर विद्रोह या अशांति को केवल सेना के बल पर नियंत्रित करना महंगा और कठिन था. ब्रिटिश प्रशासन ऐसे साधनों की तलाश में था जो कम सैनिकों के साथ अधिक प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सकें. रासायनिक अनुसंधान इसी आवश्यकता से जुड़ने लगा.
1919 और 1920 के दौरान ब्रिटिश सरकार के भीतर रासायनिक एजेंटों के उपयोग पर कई स्तरों पर चर्चा हुई. उस समय विंस्टन चर्चिल युद्ध मंत्री (Secretary of State for War) और बाद में उपनिवेश मंत्री (Secretary of State for the Colonies) रहे. उनके सरकारी पत्रों और ज्ञापनों में रासायनिक एजेंटों का उल्लेख मिलता है. चर्चिल का मानना था कि ऐसे रासायनिक पदार्थ जिनसे स्थायी मृत्यु न हो, कुछ परिस्थितियों में सैन्य कार्रवाई का विकल्प बन सकते हैं. उन्होंने विशेष रूप से *lachrymatory gas* अर्थात् आँखों में जलन और आँसू लाने वाले एजेंटों के उपयोग का समर्थन किया. बाद के वर्षों में इन दस्तावेज़ों की अनेक व्याख्याएँ हुईं. लोकप्रिय लेखों में अक्सर यह लिखा गया कि चर्चिल ने जहरीली गैस से उपनिवेशों पर हमला करने का आदेश दिया था. उपलब्ध सरकारी अभिलेख इस निष्कर्ष का समर्थन नहीं करते. दस्तावेज़ यह अवश्य बताते हैं कि रासायनिक एजेंटों के उपयोग पर गंभीर विचार हुआ, लेकिन अनेक प्रस्ताव राजनीतिक, तकनीकी और सैन्य कारणों से लागू नहीं किए गए.
उस समय सबसे अधिक चर्चा मेसोपोटामिया, अर्थात वर्तमान इराक, को लेकर हुई. प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह क्षेत्र ब्रिटिश नियंत्रण में आया था और वहाँ ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह लगातार बढ़ रहे थे. सेना ने विद्रोहियों के विरुद्ध हवाई हमले, तोपखाने और अन्य साधनों के साथ रासायनिक एजेंटों के उपयोग पर भी विचार किया. ब्रिटिश संसद और सेना के भीतर इस विषय पर मतभेद सामने आए. कुछ अधिकारियों का तर्क था कि यदि किसी रासायनिक एजेंट से कम जनहानि होती है तो उसका उपयोग पारंपरिक गोला-बारूद की तुलना में अधिक मानवीय माना जा सकता है. दूसरी ओर अनेक राजनीतिक नेताओं और सैन्य अधिकारियों ने इसका विरोध किया. अंततः मेसोपोटामिया में बड़े पैमाने पर जहरीली गैस के उपयोग का कोई प्रमाणित उदाहरण उपलब्ध नहीं है.
इसी अवधि में उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र, जिसे आज पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा के रूप में जाना जाता है, भी ब्रिटिश प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ था. पहाड़ी इलाकों में छोटे-छोटे कबायली समूहों के विरुद्ध अभियान चलाना कठिन था. यहाँ भी रासायनिक एजेंटों के उपयोग पर विचार किया गया. उपलब्ध अभिलेख बताते हैं कि यह चर्चा सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं थी, लेकिन इसके व्यावहारिक उपयोग के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते. ब्रिटिश सरकार को अंतरराष्ट्रीय आलोचना, रसद संबंधी कठिनाइयों और मौसम जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ता था. गैस का प्रभाव पूरी तरह हवा की दिशा पर निर्भर था. गलत परिस्थिति में वही गैस अपनी सेना के लिए भी खतरा बन सकती थी.
इन अनुभवों ने ब्रिटिश प्रशासन को एक अलग दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया. युद्ध के मैदान और औपनिवेशिक अभियानों में उपयोगी न साबित होने वाली तकनीक पुलिस व्यवस्था में अधिक उपयोगी दिखाई देने लगी. भीड़ नियंत्रण के लिए ऐसा साधन चाहिए था जो कुछ समय के लिए लोगों को उस स्थान से हटने पर मजबूर करे, लेकिन व्यापक गोलीबारी की आवश्यकता न पड़े. लैक्रिमेटरी एजेंट इस आवश्यकता के सबसे निकट थे. इनसे आँखों में तीव्र जलन, लगातार आँसू और सांस लेने में कठिनाई होती थी. अधिकांश मामलों में खुले वातावरण में पहुँचने के बाद इसका प्रभाव समाप्त हो जाता था. ब्रिटिश प्रशासन ने इन्हें “कम घातक” भीड़ नियंत्रण उपकरण के रूप में देखना शुरू किया.
1920 के दशक में ब्रिटेन के वैज्ञानिक संस्थानों और निजी रासायनिक उद्योग ने ऐसे एजेंटों पर शोध बढ़ाया जिन्हें छोटे गोलों, ग्रेनेड और विशेष प्रक्षेपास्त्रों के रूप में छोड़ा जा सके. पुलिस के लिए अलग प्रकार के गोले विकसित किए गए. इनका उद्देश्य किसी क्षेत्र को कुछ मिनटों के लिए खाली कराना था. इस अवधि में ब्रिटिश पुलिस प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी रासायनिक एजेंटों के उपयोग पर अध्ययन शुरू हुआ. धीरे-धीरे यह विचार विकसित हुआ कि भविष्य में औपनिवेशिक क्षेत्रों में होने वाले राजनीतिक आंदोलनों और श्रमिक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए आँसू गैस उपयोगी सिद्ध हो सकती है.
1930 के दशक तक ब्रिटिश साम्राज्य के अनेक हिस्सों में राष्ट्रीय आंदोलन तेज़ हो चुके थे. भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन, हड़तालें और सार्वजनिक प्रदर्शन लगातार बढ़ रहे थे. मिस्र, फ़िलिस्तीन और अन्य उपनिवेशों में भी ऐसी ही परिस्थितियाँ थीं. ब्रिटिश प्रशासन को यह स्पष्ट दिखाई देने लगा कि केवल लाठीचार्ज और गोलीबारी पर निर्भर रहना राजनीतिक दृष्टि से महंगा पड़ सकता है. हर गोलीकांड सरकार की आलोचना बढ़ाता था और औपनिवेशिक शासन की वैधता पर प्रश्न खड़े करता था. आँसू गैस को इसी समस्या के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया. सरकारी दस्तावेज़ों में इसे कई बार “more humane” अर्थात अपेक्षाकृत अधिक मानवीय विकल्प कहा गया. इसका अर्थ यह नहीं था कि आँसू गैस पूरी तरह सुरक्षित थी. इसका अर्थ केवल इतना था कि ब्रिटिश प्रशासन इसे गोली चलाने की तुलना में कम घातक मानता था.
इसी सोच ने आँसू गैस को युद्ध के हथियार से पुलिस के हथियार में बदल दिया. अगले कुछ वर्षों में ब्रिटिश भारत की पुलिस व्यवस्था भी इसी परिवर्तन का हिस्सा बनी. भारत में इसके प्रयोग से पहले अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया गया, परीक्षण किए गए और विशेष उपकरण आयात किए गए. 1936 में पंजाब पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय में हुए आधिकारिक परीक्षण इस प्रक्रिया के शुरुआती दस्तावेज़ी प्रमाणों में गिने जाते हैं. इसके बाद आँसू गैस ब्रिटिश भारत की पुलिस व्यवस्था में व्यवस्थित रूप से शामिल होने लगी.
ब्रिटेन में आँसू गैस को पुलिस उपकरण के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद अगला चरण इसे उपनिवेशों तक पहुँचाने का था. भारत उस समय ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा उपनिवेश था. बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक यहाँ राष्ट्रीय आंदोलन लगातार व्यापक हो रहे थे. सविनय अवज्ञा आंदोलन, मजदूर हड़तालें, छात्र प्रदर्शन और सार्वजनिक सभाएँ औपनिवेशिक प्रशासन के लिए सामान्य चुनौती बन चुकी थीं. प्रत्येक बड़े प्रदर्शन में गोली चलाना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ता था. जलियाँवाला बाग जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अंधाधुंध गोलीबारी केवल तत्काल भीड़ को नहीं रोकती, बल्कि पूरे साम्राज्य की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुँचाती है. इसी पृष्ठभूमि में भारत के लिए भी आँसू गैस को एक वैकल्पिक पुलिस उपकरण के रूप में देखा गया.
ब्रिटिश सरकार ने पहले इसे सीधे मैदान में नहीं उतारा. पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षण देने और रासायनिक एजेंटों की प्रभावशीलता जाँचने के लिए परीक्षण आयोजित किए गए. नवंबर 1936 में ब्रिटिश संसद में भारत सरकार द्वारा पंजाब पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय में आँसू गैस के प्रयोगों का उल्लेख किया गया. इन परीक्षणों का उद्देश्य यह समझना था कि भारतीय पुलिस किन परिस्थितियों में इस उपकरण का उपयोग कर सकती है और इसके लिए किस प्रकार का प्रशिक्षण आवश्यक होगा. उपलब्ध सरकारी अभिलेख बताते हैं कि इन प्रयोगों को पुलिस आधुनिकीकरण का हिस्सा माना गया था, न कि सैन्य कार्यक्रम का.
1930 के दशक के उत्तरार्ध तक आँसू गैस ब्रिटिश साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में पुलिस उपकरण के रूप में स्वीकार की जा चुकी थी. ब्रिटिश बर्मा में 1939 के दौरान इसके उपयोग के दस्तावेज़ मिलते हैं. उस समय तक बर्मा का प्रशासनिक ढाँचा लंबे समय तक ब्रिटिश भारत का ही हिस्सा रहा था और वहाँ की पुलिस व्यवस्था भी औपनिवेशिक मॉडल पर आधारित थी. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यह तकनीक ब्रिटिश प्रशासन के लिए और अधिक उपयोगी हो गई. युद्धकालीन परिस्थितियों में आंतरिक सुरक्षा, औद्योगिक अशांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आँसू गैस का उपयोग बढ़ा.
भारत में इसका विस्तार धीरे-धीरे हुआ. सभी प्रांतों में यह एक साथ लागू नहीं हुई. अलग-अलग प्रांतीय सरकारों और पुलिस विभागों ने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इसे अपनाया. पुलिस प्रशिक्षण मैनुअलों में आँसू गैस के गोले, गैस मास्क, प्रक्षेपण उपकरण और उपयोग की परिस्थितियों का उल्लेख मिलने लगा. औपनिवेशिक शासन के अंतिम वर्षों तक यह भीड़ नियंत्रण के नियमित साधनों में शामिल हो चुकी थी.
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन प्रशासनिक ढाँचे का अधिकांश हिस्सा यथावत रहा. भारतीय पुलिस ने औपनिवेशिक काल के अनेक कानून, प्रशिक्षण पद्धतियाँ और उपकरण अपने पास रखे. आँसू गैस भी उन्हीं में से एक थी. स्वतंत्र भारत में इसे किसी विदेशी तकनीक के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि पुलिस के नियमित उपकरण के रूप में अपनाया गया. बाद के दशकों में इसकी आपूर्ति और निर्माण का कार्य देश के भीतर होने लगा.
1960 और 1970 के दशक में भारत सरकार ने आँसू गैस के घरेलू उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया. रक्षा अनुसंधान तथा गृह मंत्रालय के सहयोग से ऐसे संस्थानों का विकास हुआ जो पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लिए आँसू गैस के गोले, ग्रेनेड और अन्य उपकरण तैयार कर सकें. मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थापित Tear Smoke Unit इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था. आज यही संस्थान, जिसे वर्तमान में Tear Smoke Unit (TSU), BSF के नाम से जाना जाता है, भारत में प्रयुक्त अधिकांश आँसू गैस उपकरणों का निर्माण करता है.
समय के साथ आँसू गैस में भी परिवर्तन हुए. प्रारंभिक दौर में प्रयुक्त लैक्रिमेटरी एजेंटों का स्थान धीरे-धीरे अधिक प्रभावी रासायनिक यौगिकों ने ले लिया. आज विश्व के अधिकांश देशों में CS गैस (2-Chlorobenzalmalononitrile) सबसे अधिक उपयोग की जाती है. कुछ परिस्थितियों में CN गैस (Chloroacetophenone) और OC (Oleoresin Capsicum) आधारित एजेंटों का भी प्रयोग होता है. इनका उद्देश्य अब भी भीड़ को तितर-बितर करना है, हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार यह चेतावनी देते रहे हैं कि बंद स्थानों, अत्यधिक मात्रा या संवेदनशील व्यक्तियों पर इनका प्रभाव गंभीर हो सकता है.
आँसू गैस का इतिहास केवल एक रासायनिक पदार्थ का इतिहास नहीं है. यह युद्ध में विकसित तकनीक के पुलिस व्यवस्था में स्थानांतरित होने का इतिहास भी है. प्रथम विश्व युद्ध की प्रयोगशालाओं में विकसित रासायनिक अनुसंधान ने पहले सैन्य हथियारों का रूप लिया. उन्हीं प्रयोगशालाओं से निकले अपेक्षाकृत कम घातक एजेंट बाद में औपनिवेशिक पुलिस व्यवस्था का हिस्सा बने. ब्रिटिश साम्राज्य ने उन्हें अपने उपनिवेशों तक पहुँचाया और भारत भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा था. स्वतंत्रता के बाद सरकार बदल गई, लेकिन भीड़ नियंत्रण की तकनीक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वही बना रहा जिसे ब्रिटिश प्रशासन ने बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में अपनाना शुरू किया था.
आज जब भारत में किसी प्रदर्शन के दौरान आँसू गैस का गोला छोड़ा जाता है, तब उसके पीछे लगभग एक शताब्दी का इतिहास मौजूद होता है. इस इतिहास में प्रथम विश्व युद्ध की खाइयाँ हैं, ब्रिटेन की रासायनिक प्रयोगशालाएँ हैं, औपनिवेशिक प्रशासन की नीतियाँ हैं और पुलिस व्यवस्था का वह ढाँचा भी है जिसे स्वतंत्र भारत ने बड़े पैमाने पर विरासत में स्वीकार किया.
संदर्भ –
1. Haber, L. F. *The Poisonous Cloud: Chemical Warfare in the First World War.* Oxford University Press. https://global.oup.com/
2. Journal of Modern History. Domesticating Chemical Weapons: Tear Gas and the Militarization of Policing in the British Imperial World.https://www.journals.uchicago.edu/doi/10.1086/704383
3. UK Parliament (Hansard), Disturbances (Tear Gas Experiments), 16November 1936. https://hansard.parliament.uk/commons/1936-11-16/debates/3b0b4925-d051-4891-b129-a80c75f85cbb/Disturbances(TearGasExperiments)
4. UK Parliament (Hansard), Poison Gas Debate, 9 March 1920.https://api.parliament.uk/historic-hansard/commons/1920/mar/09/poison-gas
5. International Churchill Society. Churchill and Chemical Warfare.https://winstonchurchill.hillsdale.edu/churchill-and-chemical-warfare/
6. International Churchill Society. Leading Myths: Churchill Advocated the First Use of Lethal Gas. https://winstonchurchill.org/publications/finest-hour/finest-hour-160/leading-myths-churchill-advocated-the-first-use-of-lethal-gas/
7. British Army / Porton Down historical records.
8. Tear Smoke Unit (BSF), Government of India. https://bsf.gov.in
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