सूरज धीरे-धीरे पहाड़ी के सिर पर से अपना आँचल समेट कर पल भर को ठिठका. गहरे नीले और काले आँचल में शाम को लहरा कर आता देख मुस्कुराया और उसके लिए रास्ता बनाता धीरे से दूसरी ओर सरक गया. (Yaad story by Smita Karnatak)

मैं खिड़की पर अपनी लेमन टी का कप पकड़े देर तक इस मिलने बिछुड़ने को देखती रही. झील में उतरती रात गहराने लगी थी कि अचानक फ़ोन की घंटी बजी और मैं इंसानों की दुनिया में वापस आ गई.

बिना नाम का कोई नंबर था. मन किया कि न उठाऊँ लेकिन बेख्याली में न जाने क्या सोचकर उठा लिया.

“हैलो, सुप्रिया जी से बात हो सकती है ?”

“जी ! बोल रही हूँ. आप …?”  मैंने थोड़े असमंजस से कहा.

“आप रोमिला गांगुली को जानती हैं ?” उधर से फिर सवाल पूछा गया.

“जी ! लेकिन आप कहाँ से बोल रहे हैं ?” रोमिला का नाम सुनकर मेरा स्वर थोड़ा नरम हुआ लेकिन असमंजस बरक़रार था.

“आप उत्तरकाशी में रही हैं कभी ?”

फिर सवाल. मन में खीज उठी. ये शख़्स सवाल पर सवाल किये जा रहा है और मुझे कुछ  पूछने का मौक़ा नहीं दे रहा.

“लेकिन आप कौन हैं और  कहाँ से बोल रहे हैं ?” सख़्त लहजे को भरसक नरम बनाने का प्रयास करते हुए मैंने पूछा .

फ़ोन के दूसरी तरफ़ दो-तीन लोगों के हँसने और चुहलबाजी की गूँज सुनाई दी.

“आप वहाँ मिशन स्कूल में पढ़ी हैं ?” फिर सवाल.

ये आख़िर है कौन ? मन थोड़ा हैरान-परेशान हुआ. सब्र जवाब देने लगा था और मैंने तल्ख़ी से कहा, “आपने अभी तक अपना परिचय नहीं दिया है.”

दूसरी ओर फिर वही दो-तीन लोगों के हँसने का समवेत स्वर उभरा. फ़ोन काटने ही वाली थी कि अचानक अपना नाम सुना. “ सुप्रिया !” और मेरे हाथ वहीं थम गये.  ये तो रोमिला की आवाज़ है.

“हैलो, रोमिला ?” मैंने ग़ुस्से, खीज, बेचैनी और उत्सुकता को गटकते हुए कहा.

“हाँ मैं, कहाँ है तू ?”

“मैं तो घर पर हूँ लेकिन ये सब क्या है ? ये कौन है जो इतने सवाल-जवाब मुझसे किए जा रहा है. उदित की आवाज़ तो ये है नहीं.” मैंने एक साथ कई प्रश्नों के गोले उसकी तरफ़ दाग दिए.

“तुझे उत्तरकाशी वाले अजय की याद है जो बचपन में हमारे साथ पढ़ता था ?”

“ हाँ, बिल्कुल है. आज कहाँ से याद आ गई तुझे उसकी ?”

“ मैडम सुप्रिया ! ये वही अजय है, अजय सिंह .” रोमिला ने बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में कहा.

“क्या ?”  रसोई की ओर जाते हुए मैं लगभग लड़खड़ा ही गई. “ओ मॉय गॉड ! आई कान्ट बिलीव दिस. यू आर नॉट जोकिंग. आर यू , रोमिला ?” ख़ुशी और आश्चर्य से मेरा रोम-रोम हुलक पड़ा.

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“अब बात करेगी उससे ?” रोमिला ने हँसते हुए पूछा.

“हाँ हाँ दे उसे फ़ोन. नहीं नहीं, वेट, वेट ए मिनट. पहले मुझे यक़ीन तो कर लेने दे कि ये बात सच है.”

मुझे अब हँसी आने लगी थी. “उफ़्फ़ रोमिला ! यक़ीन नहीं हो रहा. हाउ इज दिस पॉसिबल ? कैसे कहाँ मिला ये ? मैंने चहकते हुए पूछा.

“वो मैं बाद में बताऊँगी. तू पहले अजय से बात कर .” रोमिला ने अजय को फ़ोन थमा दिया.

“हैलो सुप्रिया !” अब उस स्वर में एक खोए हुए दोस्त की आवाज़ दूर क्षितिज के पार से आती सुनाई दी.

“ओह अजय ! यक़ीन नहीं होता. कैसे हो , कहाँ हो तुम, रोमिला से कैसे मिले, ढूँढा कैसे इसने तुम्हें?”

“मैंने तो एक-एककर सवाल पूछे थे, तुम तो एक बार में ही सब पूछे जा रही हो ,” और वह बेसाख़्ता हँस दिया.

“लेकिन ये करिश्मा हुआ कैसे ? हम तो तब इतने छोटे थे कि ठीक से सब कुछ याद भी नहीं और पैंतालीस साल बाद इस तरह मिलना … यक़ीन ही नहीं होता.”

“यक़ीन तो मुझे भी नहीं हुआ था. बस समझो कि चमत्कार हो गया. मैं यहीं हूँ तुम्हारे ही शहर में.” अजय की शांत गंभीर सी आवाज़ उधर से गूँजी.

“क्या, सच में ? कैसे, कब आए ?” अब मेरे सवालों का सिलसिला थमने को नहीं आ रहा था.

“यहाँ आए हुए मुझे साल भर हो गया है, यहीं रैमजे हॉस्पिटल में. यहीं रोमिला से मिला. तुम कैसी हो?”

“मतलब ? तुम वही डॉक्टर अजय सिंह हो ? ओह, आज तो एक के बाद एक सरप्राइज़ मिल रहे हैं.

तुम्हारी तो लोग बड़ी तारीफ़ करते हैं. लेकिन वो अजय तो पायलट बनना चाहता था.”

“तुम्हें याद है ?” उसने हँसते हुए कहा. “वो बचपन की बातें तो उसी उम्र के साथ गुज़र गईं.”

“तुम सालभर से यहाँ हो और हमें मालूम भी नहीं कि तुम वही अजय हो. रोमिला ने भी नहीं बताया, हद्द है.” मैंने थोड़ी नाराज़गी ज़ाहिर करनी चाही.

“कैसे बताती, न उसे पता था न मुझे. वो तो आज शाम बातों – बातों में उत्तरकाशी की बात चली जो यहाँ तक पहुँची. तभी पता चला कि डॉक्टर रोमिला तो वही बंगाली लड़की है जो नई-नई आई थी मिड सेशन में, जब हम तीसरी में पढ़ते थे.”

“हाँ और फ़ाइनल में उसके नंबर मुझसे ज़्यादा आये थे, मैं जब रोने-रोने को हो गई तब तुमने अपनी आधी टॉफ़ी मुझे खिलाई थी.” कहते हुए  मैं ज़ोर से हँस पड़ी. बचपन जैसे एक लंबा सा मोड़ काटकर वापस लौट आया था.

“एक मिनट अजय ! मुझे फ़ोन देना.” उधर से रोमिला की दमदार आवाज़ सुनाई दी.

“सुनो मैडम जी ! हमारा ड्राइवर आपके घर के लिए रवाना हो गया है, चुपचाप गाड़ी में  बैठो और आ जाओ. बाक़ी प्यार-मोहब्बत यहीं कर लेना. मीनाक्षी तुम्हारे पसंदीदा वेज कटलेट बना रही है.”

“मीनाक्षी ?” मैंने कुछ समझते हुए भी पूछा.

“अरे, अजय की बैटर हाफ !” रोमिला अल्हड़ता के साथ बोली.

“ओह, पहले बताया क्यों नहीं. पर इतनी जल्दी, कैसे ? अनिकेत भी टूर पर गए हैं.”

“ओहो, डरपोक लड़की ! इसीलिए तो गाड़ी भेज रही हूँ , अब जल्दी से तैयार हो और आ जा. बाक़ी बातें यहीं आकर होंगी,” और उसने फ़ोन काट दिया.

मिलने की उतावली तो मुझे भी हो रही थी पर अचानक मिले इस घोर क़िस्म के सरप्राइज़ से मैं मारे ख़ुशी के जड़ सी हो गई थी. सूझ ही नहीं रहा था कि क्या किया जाय. ड्राइवर तो पंद्रह-बीस मिनट में पहुँचता होगा.

इतनी उत्कंठा और आवेग में भी मन जैसे कुलाँचे मारकर पैंतालीस साल पीछे चला गया जब उत्तरकाशी के उस नए नए खुले छोटे से स्कूल में दूसरी-तीसरी कक्षाओं में पढ़ने वाले हम बमुश्किल बीस बाइस बच्चे रहे होंगे . अलमारी खोली तो स्कूल का गेट आँखों के आगे घूम गया जिसपर हम टीचर की नज़र बचाकर झूला करते थे. इसी तरह एक दिन गेट पर झूलते हुए हमने सड़क किनारे एक अंधे आदमी को खड़े देखा. नैतिक कहानियों के असर और कुछ अच्छा करने की मन में ऐसी हिलोर उठती थी कि मैंने और अजय ने उसे हाथ पकड़कर सड़क पार कराई और अपने  इस कारनामे से फूले हुए जब हम स्कूल के अंदर वापस घुसे तब फ़ादर ने सचमुच हमारी पीठ थपथपाई. अजय की तो याद नहीं पर मैं फूल कर कुप्पा हो गई थी.

हड़बड़ाहट में शॉल उठाया तो साथ रखा पर्स नीचे गिर पड़ा जिसमें पिछली बार कोवलम बीच से बटोरे हुए छोटे-छोटे शंख नीचे गिर पड़े. इतने बरस जो खोया रहा वह आज समुन्दर ने मुझे सचमुच लौटा दिया था.

पाँचवीं कक्षा तक के उस छोटे से स्कूल में अजय और मैं एक ही क्लास में थे. अजय एक  शर्मीला लड़का था और मैं स्कूल भर  की चंचल लड़की, पढ़ाई-लिखाई से लेकर खेलकूद और नृत्य-नाटक सभी में सबसे आगे रहने वाली. क्लास के इतने बच्चों में मुझे बाद तक केवल अजय की ही याद रह गई थी. रोमिला और मैंने तो दसवीं तक साथ पढ़ाई की इसलिए बचपन की दोस्ती और गहरी होती गई. लेकिन ये अजय था जिसके साथ मैं शुरू से अपना टिफ़िन बाँटती और खेलती थी.

मैंने साड़ी पहननी शुरू की तो फिर से उस छह मीटर के कैनवस पर बचपन के रंग बिखरने लगे. मैंने चुन्नटें डालनी शुरू कीं. स्कूल का वार्षिकोत्सव था और हम एक नाटक कर रहे थे जिसमें मैं डॉक्टर और अजय मरीज़ बना था. नाटक अंग्रेज़ी में था और मेरा डॉयलॉग कुछ ऐसा था, “ऑय एम ए डॉक्टर, ऑय एम ए डॉक्टर.” मरीज़ इंजेक्शन लगाने से डरता है और डॉक्टर उसे प्यार से समझाती है.

कँधे पर पल्लू डालकर उसमें पिन लगाते हुए मैं पुलकित हो उठी. आज मेरा वही मरीज़ डॉक्टर है.

फ़िल्म फ़्लैशबैक में यूँ ही चलती रहती कि तभी दरवाजे पर घंटी बजी. शायद ड्राइवर आया होगा. खिड़की से झाँककर देखा, वही था. जल्दी से पर्स और फ़ोन उठाकर बाहर की ओर भागी. पर्स में स्मृतियों के सिक्के छनछना रहे थे, छन छन छनन छन्न. गाड़ी चल पड़ी. अजय के घर की ओर.  मेरे मन की गाड़ी का तो रिवर्स गियर लग गया था, आगे बढ़ती ही नहीं थी.

*****

एक बार स्कूल में खेलते-खेलते अजय गिर पड़ा और उसके बाँए हाथ में प्लास्टर चढ़ाना पड़ा. स्कूल में वार्षिकोत्सव की तैयारी चल रही थी और उन दिनों अजय की माँ उसे लेने आया करती थीं. शायद उसके पापा डिफ़ेंस सर्विसेज़ में थे. फूलों वाले प्रिंट की सफ़ेद साड़ी पहने ऊँचा सा जूड़ा बनाए परी सी दिखने वाली उसकी माँ जब उसे लेने  स्कूल पहुँची तो सात-आठ साल की बच्ची में बसी एक नारी अनायास ही जाग उठी. मुझे याद है कि मैं देर तक उन्हें निहारती हुई  ये सोचती रही कि एक दिन बड़ी होकर मैं भी ऐसे ही साड़ी पहनकर ऊँचा सा जूड़ा बनाऊँगी. सफ़ेद तभी से मेरा पसंदीदा रंग है जिसमें सभी रंग खिलकर उभरते हैं. जूड़े में खोंसी गई गुलाब की कली या गजरा भी बाद में इस कल्पना में जुड़ गया.

मालरोड के किनारे की लाइटें झील के पानी में गहरे उतरकर आनंद से झिलमिला रहीं थीं. ठंड के कारण मैंने अपना शॉल कंधे पर और कसकर लपेट लिया. हाथ जाने क्यों बालों पर फिर गया. अरे, ये जूड़ा मैंने कब बना लिया. इस जूड़े में न जाने क्या-क्या बँधा हुआ है.

“वो पहाड़ देख रही है ?” आठ साल के उस लड़के ने अपनी दोस्त से पूछा. लड़की धूप से मिचमिचाई आँखें लिए उधर देखने लगी जिधर लड़के ने इशारा किया था. मैंने भी गाड़ी के शीशे से बाहर गहरा आई पहाड़ी को देखा, वहाँ घुप्प अँधेंरों में कहीं-कहीं रौशनी तो ज़रूर थी.

“मेरा घर इस पहाड़ के पीछे जो पहाड़ है ना,  उसके भी पीछे है.” बाएँ हाथ पर प्लास्टर चढ़ाए अपने दाएँ हाथ की नन्हीं सी उँगली पहाड़ के ऊपर तक ले जाते हुए उस लड़के ने कितनी मासूमियत से ये बात कह दी थी. लड़की दोनों हाथ अपनी बालिश्त भर कमर पर टिकाए सामने के एक दाँत टूटे मुँह को खोले, आँखें झपकाती पहाड़ के पीछे के पहाड़ की दूरियाँ नापती लड़के को तनिक अचरज से घूरने लगी.

घर के गेट पर पहुँचकर जब गाड़ी ने हॉर्न बजाया तब मुझे अहसास हुआ कि गाड़ी डॉक्टर अजय के घर के बाहर खड़ी है. कार्तिक पूर्णिमा का चाँद अपने पूरे शबाब पर था और चाँदनी पिघल-पिघल कर झील के बदन पर थिरक रही थी. पहाड़ के पीछे के सारे पहाड़ सिमट कर बिल्कुल पास आ गए थे. (Yaad story by Smita Karnatak)

स्मिता को यहाँ भी भी पढ़ें: रानीखेत के करगेत से कानपुर तक खिंची एक पुरानी डोर

हल्द्वानी में रहने वाली स्मिता कर्नाटक की पढ़ाई लिखाई उत्तराखण्ड के अनेक स्थानों पर हुई. उन्होंने 1989 में नैनीताल के डी. एस. बी. कैम्पस से अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. किया. वे संस्मरण और कहानियाँ लिखती हैं और हिंदी तथा अंग्रेज़ी में अनुवाद करती हैं. लोककथाओं के अनुवाद में उनकी विशेष दिलचस्पी है. वे एक वॉयस ओवर आर्टिस्ट भी हैं और कई जाने माने लेखकों की कविताओं और कहानियों को अपने यूट्यूब चैनल देखती हूँ सपने पर आवाज़ दे चुकी हैं.

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Sudhir Kumar

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