Featured

इस देश की हर बहन-बेटी को मोहब्बत के ऐसे मेडलों की ज़रूरत है

हरियाणे के बलाली गाँव का नाम सुना होगा. वही फोगाट बहनों का गाँव! दिल्ली से एक सौ दस किलोमीटर दूर इस गाँव तक पहुँचने में गाड़ी से अमूमन दो-ढाई घंटे लगते हैं. रास्ते में झज्जर कस्बा पड़ता है जहाँ से बलाली कोई साठ किलोमीटर है.

बीते दिन इस पूरे रास्ते पर लोगों का सैलाब उमड़ आया कि विनेश फोगाट पेरिस से घर लौट रही थी. सब ने उसे देखना था, उसे आशीष देना था, उसका हौसला न टूटने देने को रास्ता गुलजार रखना था. इस सबके चलते विनेश को गाँव पहुँचने में बारह घंटे से ज्यादा लग गए.

ओलिम्पिक में जो हुआ उसकी कचोट पूरे देश को महसूस हुई लेकिन बलाली के लोगों की व्यथा अलग थी. विनेश की जीत के जो प्रत्यक्ष सामाजिक-राजनैतिक अर्थ निकलते उनका सीधा ताल्लुक एक बहुत बड़े समाज के आत्मगौरव से है. त्रासदी थी तो दिल तोड़ने वाली लेकिन बहुत उदार कलेजा रखने वाले हरियाणा के इस गाँव के लोगों ने एकमत हो कर कहा, “विनेश ही हमारा सोने का तमगा है!”

बहरहाल कल के दिन इस लड़की का अभूतपूर्व स्वागत हुआ. उसके सम्मान में जगह-जगह तम्बू गाड़े गए, मंच बनाए गए, तकरीरें की गईं और विनेश को यह अहसास कराया गया कि उसकी उपलब्धि कितनी बड़ी थी.

शुरू में मैंने झज्जर कस्बे का नाम जान-बूझ कर लिखा था क्योंकि कल सुबह ही इसी झज्जर से एक प्रौढ़ आदमी अपने कन्धों पर तीस किलो की एक कांवड़ लेकर बलाली के लिए निकला. कांवड़ में देसी घी के दो कनस्तर बंधे हुए थे. झज्जर से बलाली पहुँचने में उसे दस घंटे से ज्यादा लगा. यह सारा घी विनेश के लिए था कि घी पहलवानों की खुराक का सबसे ज़रूरी हिस्सा होता है. और उसे कंधों पर लाद कर पैदल ले जाया जाना था कि विनेश को अपनी उपलब्धि का उचित सम्मान किये जाने का अहसास हो.

विनेश फोगाट को अपनी बहन बताने वाले, अदम्य जिजीविषा वाले इस ज़बरदस्त इंसान का नाम परमजीत मलिक है. वही परमजीत मलिक जो एक ज़माने में भारतीय कुश्ती संघ के फिजियोथेरेपिस्ट के तौर पर काम कर रहे थे और जिन्हें सिर्फ इस गुनाह के लिए नौकरी से निकल दिया गया था कि उन्होंने पहलवान लड़कियों के साथ होने वाले शारीरिक उत्पीड़न का खुला विरोध किया था. जब देश के पहलवान  जंतर मंतर पर लम्बे धरने पर बैठे थे, परमजीत मलिक लगातार उनके साथ बने रहे.

आज जब अपने सबसे सगों के लिए राखी और उपहार तक ऑनलाइन भेज दिए जाने का रिवाज चल निकला है, परमजीत मलिक तीस किलो घी कन्धों पर लादे साठ किलोमीटर पैदल चलते हैं कि मुंहबोली बहन-बेटी की हिम्मत बढ़े, उसका सम्मान हो!

विनेश को ही नहीं, इस देश की हर बहन-बेटी को मोहब्बत के ऐसे मेडलों की ज़रूरत है!

अशोक पाण्डे

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा

कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है,…

4 days ago

बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…

1 week ago

आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”

पूरी तरह आंचलिक परिवेश में तैयार, "टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी" वरिष्ठ इतिहासकार डॉ निर्मल जोशी की नव प्रकाशित…

1 week ago

भूख न तीस न डर न फिकर छ्, मुट्ट बोटीं छन कसीं कमर छ्

ये सितंबर 1994 की सुबह थी जब खटीमा में पूर्व सैनिकों का जुलूस निकल रहा था. पूर्व…

1 week ago

उत्तराखण्ड के सरोवर

उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु…

1 week ago

दौड़ता अल्मोड़ा : फ़ोटो निबंध

पिछले 3 सालों से अल्मोड़ा के कुछ जागरूक युवा अल्मोड़ा मानसून मैराथन का आयोजन कर रहे हैं,जिसमें…

1 week ago