उत्तराखंड सरकार ने कृषि भूमि पर निर्माण व भूमि उपयोग संबंधित पूर्ववर्ती नीति में फेरबदल किया है. यह निर्णय लिया गया कि अब कृषि भूमि पर पर्यटन/रिसोर्ट आदि के निर्माण को भूमि उपयोग परिवर्तन के बिना अनुमति दी जाएगी. पहले की तरह भूमि को खेती से अलग श्रेणी में बदलना जरुरी नहीं होगा अपितु पर्यटन-अनुकूल निर्माण को सीधे मंजूरी मिल सकेगी. इसके साथ ही बन रही सड़क की न्यूनतम चौड़ाई के मानक (पहाड़ में 6 मीटर और मैदान में 9 मीटर) को भी संशोधित किया गया, जिससे निर्माण /पर्यटन विकास के लिए अवसंरचना की शर्ते आसान हों.
उत्तराखंड सरकार के अनुसार पर्यटन व स्थानीय विनियोग आकर्षित करने के लिए यह निर्णायक कदम है जिससे हिमालय में पर्यटन बढ़ेगा और व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार होगा. कुछ मीडिया रिर्पोट का यह मत रहा कि यह नीति किसानों व उपक्रमियों के लिए विनियोग के नये अवसर प्रदान करेगी. होमस्टे व रिसोर्ट की दशा सुधरेगी. नीति के विरोध में पहाड़ की खेती व पर्यावरण समर्थक संगठनों ने इसे खेती की जमीन के अवक्षय का कारक बताया क्योंकि यह भूमि के उपयोग में ढील देता है. यह निर्णय भूमि संरक्षण के लिए घातक होगा जिसकी आड़ में बड़े भू माफिया और असरदार लोग अधिक लाभ प्राप्ति के अवसर पा लेंगे. विकास की गति तेज करने के मंसूबे के साथ यह राज्य के भूमि संरक्षण कानूनों से विसंगति करेगा. जब खेती की जमीन को पर्यटन व निर्माण के लिए खोला जायेगा तो भूमि उपयोग का ऐसा बदलाव खेती की जमीन का क्षरण करेगा. यह राज्य के नये भू-कानून से संगति नहीं करेगा जिसमें कृषि भूमि की अनियंत्रित बिक्री रोकने व बाहरी लोगों द्वारा इसकी खरीद पर कई पाबंदियां लगाई गई थीं. ऐसे में इसे “भूमि संरक्षण के मूल उद्देश्य से असंगत” माना गया.
उत्तराखंड सहित केंद्रीय हिमालय में भूमि उपयोग व भूमि आवरण के परिवर्तन पर हुए शोध पत्र बताते हैं कि निर्माण, वन कटाव, खेती में बदलाव से हुए भूमि उपयोग के परिवर्तन कार्बन संचय में ह्रास करते हैं. प्राकृतिक उपयोग से हटाए जाने पर भूमि क्षेत्र की कार्बन क्षमता कम होती है तब जलवायु परिवर्तन के संकट सामने आने लगते हैं. ऐसे में भूमि उपयोग पर नियंत्रण कर खेती को बनाए -बचाए रखने के प्रयास जलवायु स्थायित्व बनाए रखने के लिए जरुरी हैं. भूमि उपयोग के परिवर्तन जैसे कि कृषि भूमि पर निर्माण से मिट्टी का जैविकीय रूप बदलता है जिससे दीर्घ काल में खेती कमजोर पड़ जाती है वहीं भूमि का विखंडन जैविक खेती के विस्तार को धीमा कर देता है तो ढलानों पर निर्माण से आपदा के जोखिम बढ़ते हैं साथ ही नये निर्माण से जल प्राप्ति में कमी व हो रहे अपशिष्ट को खपाने की समस्या उत्पन्न होने लगती है. ऐसे में जब कृषि भूमि एक चौथाई से अधिक खेती के काम से हट चुकी है निर्माण की अनुमति पर आधारित नीति समस्याओं को और गहरा कर देगी.
ऐसी समस्याओं के सन्दर्भ में भूमि प्रयोग की बेहतर व कारगर नीति, अनुमति पर आधारित न हो कर सीमा आधारित होनी चाहिये.भूमि के प्रयोग सीमामान (LUCT) को ध्यान में रख किए गए सुदूर संवेदना के अध्ययन यह बताते हैं कि खेती की जमीन के 10 से 15% भाग में निर्माण से भूमिगत जल के स्त्रोत कमजोर पड़ जाते हैं. मिट्टी का क्षरण होता है और कृषि का पुर्नस्थापन असंभव होने लगता है. ऐसे में उचित नीति यह है कि किसी भी ग्राम/जलागम में निर्माण वाला भाग 8 से 10% से कम ही रहे. यदि इससे अधिक पर निर्माण होता है तो ऐसा रूपांतरण भूमि की गुणवत्ता के लिए खतरा है.
उत्तराखंड में कृषि भूमि ~27% घट चुकी है जो प्राप्त उपज में ह्रास को सूचित करती है. इसलिए नीति नियम के अनुसार अब प्रत्येक ग्राम/ब्लॉक में कम से कम 60-75% कृषि भूमि संरक्षित होनी चाहिए. यदि 60% से कम कृषि योग्य भूमि रह जाये तो केवल कृषि/पुर्नस्थापन गतिविधि हो व पूर्ण निर्माण प्रतिबंधित कर दिया जाए. यह खाद्य सुरक्षा के साथ जैविकीय खेती के बने-बचे रहने की दशा होगी.
विखंडित व ऊबड़-खाबड़ भूमि में की गई जैविकीय खेती टिकाऊ नहीं होती. इसका कारण यह है कि बहुत छोटे खेतों में बरसात के समय पानी टिकता नहीं व ऊपरी पोषक परत की मिट्टी का बहाव होने लगता है. दूसरा, यदि इलाके में पेय जल की वार्षिक मांग का 70% नवीकरणीय पूर्ति से हो रहा हो तो वहाँ निर्माण की अनुमति स्थानीय जल स्त्रोतों पर विपरीत प्रभाव डालेगी. पहाड़ी इलाकों में अपशिष्ट आत्मसात करने की क्षमता सीमित होती है इसलिए कूड़ा निस्तारण का प्रबंध किये बिना नये निर्माण भूमि के स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं. पहाड़ में 0 से 15 डिग्री के ढाल वाली जगह पर ही निर्माण उचित है. 15 से 25 डिग्री के ढाल वाली भूमि के तलाऊं में निर्माण किया जा सकता है पर 25 डिग्री से ऊपर के ढाल पर निर्माण भूमि के अपरदन व आपदा के जोखिम का कारण बन जाता है.
उत्तराखंड अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना से पारिस्थितिक रूप से एक संवेदनशील राज्य है जहाँ 85% से अधिक भू-भाग पर्वतीय है. यहां कृषि भूमि सीमित, खंडित और ढालदार है. परंपरागत रूप से जीवन यापन कृषि-वन-पशु पालन से होता रहा है. यहां भूमि मात्र एक भौतिक संसाधन नहीं बल्कि आजीविका, पारिस्थितिकी व आपदा न्यूनीकरण के आधार के साथ सांस्कृतिक पहचान-लोकथात की सूचक है. उत्तराखंड की विशिष्ट भूमि उपयोग नीति वचनों में भूमि को बाजार उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि जीवन-समर्थन प्रणाली के रूप में मान्यता दी गई है तथा राज्य के विकास को धारक क्षमता पर आधारित करने का उद्देश्य भी रचा गया है. उत्तराखंड में जैविक खेती का प्रचार-प्रसार हाल के वर्षों में तेजी से हुआ है. आगे भी यह क्रम बना रहे इसके लिए जरुरी है कि भूमि उपयोग की शुद्धता बनी रहे तथा कृषि एवम जैविक भूमि का संरक्षण हो जिससे संतुलित क्षेत्रीय विकास संभव बने. स्थानीय आजीविका व आवास के सुदृढ़ी करण, आपदा के कम जोखिम व इनकी रोकथाम की तैयारी से संतुलित आंचलिक विकास की संभावना बढ़ती है जो पलायन की संरचनात्मक रोकथाम की प्रस्तावना के मुख्य सोपान हैं. इसके मार्गदर्शक सिद्धांतों में हिमालय का वह सावधानी सिद्धांत रहा है कि, “जब तक भूमि उपयोग से पर्यावरणीय जोखिम पूरी तरह से आंके न जाएँ तब तक भूमि उपयोग में परिवर्तन व छेड़छाड़ की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए”.
भूमि उपयोग के परिवर्तन सीधे मिट्टी के स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी, जल चक्र खेती की क्षमता व कार्बन पृथक्करण पर प्रभाव डालते हैं. भूमि उपयोग में हो रहे परिवर्तन पर सुदूर संवेदना व जीआईएस से प्राप्त सूचनाएं यह बताती हैं कि हिमालयी भू आकृति में त्वरित रूप से बदलाव हो रहे हैं. वहीं शासन खाद्य सुरक्षा और जैविक खेती को भूमि उपयोग में प्राथमिकता सूची में रखता है. इस प्रकार कृषि-पारिस्थितिकी उच्च अधिमान में रखी जाती है. भूमि उपयोग का वर्गीकरण करते हुए कृषि संरक्षण क्षेत्र के अंतर्गत सभी सिंचित, असिंचित व परंपरागत सीढ़ीनुमा खेत जैविक खेती के संभावित क्षेत्र बनते हैं जो कृषि संरक्षण क्षेत्र के अंतर्गत आएंगे. इनमें स्थायी निर्माण निषद्ध होगा केवल कृषि-सम्बन्धित संरचनाएं अनुमेय होंगी. साथ ही भूमि रूपान्तरण हेतु राज्य-स्तरीय स्वीकृति अनिवार्य होगी. जैविक खेती संरक्षण क्षेत्र के रूप में प्रमाणित एवम संभावित जैविक क्षेत्र में न्यूनतम 100 से 200 मीटर में निर्माण बफर के रूप में होगा. यहां सीवेज/रासायनिक अपवाह पर पूर्ण प्रतिबंध होगा व इसे सामुदायिक जैविक क्लस्टर मॉडल का रूप दिया जाएगा.
मौजूदा गांवों का सघन विकास व बिखरे निर्माण पर रोक लगाते हुए कृषि भूमि में फैलाव निषिद्ध रहेगा व जल-अपशिष्ट प्रबंधन करना अनिवार्य होगा. धारक क्षमता के आंकलन में जल उपलब्धता, कृषि भूमि अनुपात, अपशिष्ट वहन क्षमता व आपदा जोखिम सूचक के आकलन के बगैर कोई भूमि उपयोग मान्य नहीं होगी. इसके लिए राज्य भूमि-उपयोग प्राधिकरण जैसे बहु-विभागीय निकाय में वैज्ञानिक, कृषि, आपदा विशेषज्ञ निरन्तर ऐसे सभी पक्षों की परख करें. जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिला भूमि उपयोग समिति स्थानीय परिवेश में इनका मूल्यांकन करे जिसमें ग्राम सभा का प्रतिनिधित्व हो. ग्रामसभा की भूमिका भूमि-उपयोग परिवर्तन में अनिवार्य सहमति के सन्दर्भ में हो जो स्थानीय धारक क्षमता की निगरानी व जैविक खेती के संरक्षण के उपायों पर निरन्तर कार्यशील रहे.
भूमि उपयोग के सभी निर्णय (1) धारक क्षमता के निर्देशक – सीसीआई (2) माउंटेन लिवएबिलिटी इंडेक्स – एमएलआई (3) एग्रीकल्चरल लैंड रिटेंशन रेश्यो (4) पहाड़ निवास निर्देशक, जैसे सूचकों से सम्बद्ध रहने चाहिये. उपर्युक्त पक्ष उन अपेक्षित परिणामों की सूचना देंगे जो जैविक खेती के संरक्षण, खाद्य आत्मनिर्भरता, आपदा जोखिम में कमी, संतुलित विकास व पलायन में संरचनात्मक कमी से जुड़े हों. यह ऐसा नीतिगत प्रारूप प्रस्तुत करेगा जो अनियंत्रित निर्माण से नियंत्रित विकास और भूमि उपयोग से भूमि-संरक्षण की ओर ले जाने का आधार बनेगा. इनके विरुद्ध यदि अवैध निर्माण होते हैं तो उस संरचना को ध्वस्त करने, लाभार्थी को मिल रही सब्सिडी/अन्य फायदे को निरस्त करने जैसे प्रवर्तन व आर्थिक दंड का विधान रहे. संक्रमण काल में मौजूदा निर्माणों का सामाजिक-पर्यावरणीय ऑडिट व चरणबद्ध नियमितीकरण या पुनर्संरेखण हो.
वस्तुतः उत्तराखंड में कृषि भूमि पर निर्माण होते रहा है. इससे कहीं अनियंत्रित घना बसाव है तो कहीं बिखरा बसाव समस्या पैदा करता रहा है. ऐसे अवांछित व अनियंत्रित भूमि उपयोग के कारण जैविक खेती कमजोर हो रही है, भूमि की धारक क्षमता घट रही है और जल, खाद्य सुरक्षा और आपदा का जोखिम बढ़ रहा है. राज्य की भौगोलिक-पारिस्थितिक विशिष्टता को देखते हुए एक पृथक “हिमालय अनुकूल भूमि उपयोग नीति” की तत्काल आवश्यकता है अन्यथा कृषि भूमि पर निर्माण की अनुमति से भूमि का स्थायी रूपान्तरण होने लगेगा. खाद्य उत्पादन में कमी आएगी. अपशिष्ट एवम जल संकट होगा तथा भूस्खलन व आपदा के जोखिम सामने आएंगे.
उत्तराखंड में समस्या यह है कि भूमि उपयोग के परिवर्तन धारक क्षमता पर आधारित नहीं है. जबकि यह विचार सत्तर के दशक में ही स्वामी माधवाशीष ने पनुआनौला स्थित मिरतोला आश्रम द्वारा किये कई सूक्ष्म अध्ययनों के आधार पर दिया था. स्वामी माधवाशीष प्लानिंग कमीशन में विशेषज्ञ रहे. नीचे से नियोजन की प्राथमिकताओं पर अध्ययन से हिमालय की खेती, फल-फूल-सब्जी-मसाले व पशु पालन के प्रारूप को रचते उन्होंने अपनी व्याख्या दी. उनके शिष्य डॉ. जैकसन ने धारक क्षमता को मापने के आधार बताये. पहाड़ की खेती जिन संकटों से ग्रस्त है उसकी व्याख्या की. इनके साथ पंतनगर में कृषि विभाग के प्रोफेसर डॉ.शंकर लाल साह, रानीचौरी परिसर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. वीर सिंह व विवेकानंद अनुसन्धान शाला के वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चंद्र भट्ट के अध्ययन महत्वपूर्ण हैं.
सबसे बड़ी समस्या तो अब भी यह है कि जमीन के संरक्षण के लिए कोई सशक्त कानूनी ढांचा नहीं है.ग्राम सभा की भूमिका सीमित है. वहीं शहरों में खेती की जमीन पर बिखरा निर्माण बढ़ रहा है. इसलिए कृषि भूमि पर सामान्य निर्माण निषिद्ध किया जाए. जैविक खेती क्षेत्रों में बफर जोन रहें. बिखरे निर्माण पर रोक लगे, क्लस्टर आधारित बसाव किया जाए. किसी भी निर्माण से पहले धारक क्षमता का अनुमान लगाया जाए. निर्माण हेतु ग्राम सभा की पूर्ण सहमति हो. निश्चय ही इस प्रक्रिया के आरंभ में भूमि संबंधी आंकड़े एकत्रित करने, धारक क्षमता के अध्ययन व संस्थागत ढांचे के निर्माण में व्यय होगा पर दीर्घ काल में इसका शुद्ध वित्तीय प्रभाव पर्यावरणीय क्षति से बचाव, आपदा प्रबंधन व्यय में कमी व खाद्य आयात निर्भरता की कमी के रूप में सामने आएगा. ऐसी नीति राज्य भूमि राज्य भूमि राजस्व अधिनियम, नगर व ग्राम नियोजन अधिनियम व पंचायती राज अधिनियम के अनुरूप अधिसूचित होनी चाहिये जिसमें आवश्यकतानुसार नियमावली में सुधार व संशोधन किये जा सकें. इस प्रक्रिया की संस्थागत व्यवस्था राज्य भूमि उपयोग अथॉरिटी – एसएलयूए द्वारा संपन्न हो जिसके अध्यक्ष मुख्य सचिव व कृषि, आपदा, पर्यावरण व ग्रामीण विकास विशेषज्ञ सदस्य व जिला भूमि उपयोग समिति के अध्यक्ष जिलाधिकारी रहें.
उत्तराखंड में आजीविका के एकीकृत क्षेत्र में कृषि के साथ पर्यटन एवम हस्तशिल्प की संकल्पना रहे जिससे बिना भूमि रूपान्तरण होमस्टे का प्राविधान हो. यह स्थानीय संसाधन आधारित मॉडल बने जिसमें स्थानीय रोजगार की विपुल सम्भावना बनी रहे. निर्माण एवम भूमि रूपान्तरण नीति के अधीन कृषि भूमि पर सामान्य निर्माण निषिद्ध हो. अपवाद की दशा मात्र वह हों जब सार्वजनिक हित को ध्यान में रख कृषि समर्थक संरचनाएँ बनायी जा रहीं हों या फिर आपदा पुर्नवास किया जा रहा हो.
राज्य सरकार ने खेती की जमीन पर निर्माण कार्य की अनुमति विशेष परिस्थितियों या सामान्यीकृतरूप में दी है जिसका प्रभाव भूमि उपयोग की प्रवृतियों पर पड़ना स्वाभाविक है. उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में खेती की जमीन पर निर्माण की अनुमति के प्रभाव को केवल निजी सुविधा या रियल स्टेट के आधार पर नहीं देखा जा सकता. इसके सम्मिश्रित प्रभाव हैं जिनका आंकलन वर्तमान की उन परिस्थितियों में जरुरी है जब खेती की जमीन में लगातार ह्रास देखा जा रहा हो.
सरकार का यह निर्णय ग्रामीण परिवारों को मकान की सुविधा देने के साथ पर्यटन के विकेन्द्रीकरण हेतु होमस्टे व निजी विनियोग को बढ़ाने एवम पलायन रोकने के लिए स्थानीय निर्माण की अनुमति के तर्क पर आधारित है. अभी इसमें कृषि-पारिस्थितिकी के संरक्षण व धारक क्षमता पर पड़ने वाले बोझ जैसे पक्ष उपेक्षित ही रखे गये हैं.
वहीँ उत्तराखंड को जैविक प्रदेश के रूप में स्थापित करने के प्रयास किये गए हैं. जैविक खेती के लिए सतत, निरन्तर व खुले भू-क्षेत्र की जरुरत होती है. वर्तमान कृषि की नीतियाँ जैविक खेती को उपज की गुणवत्ता की दृष्टि से उच्च प्रतिमान दे रहीं हैं. ऐसे में खेती की जमीन पर निर्माण की दशा जैविक खेती पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालेगी. जैविक खेती केवल रसायन प्रयोग न करने से ही नहीं होती बल्कि इसमें मिट्टी का जीवित तंत्र (सूक्ष्म जीव, केंचुए इत्यादि) समाहित है. साथ ही यह खुले भू-क्षेत्र की निरंतरता पर आधारित होती है. खेतों के बीच जब मकान, होम स्टे, रिसॉर्ट व आवागमन पथ व सड़कें आ जातीं हैं तो इसका प्रभाव जैविक खेती की लैंडस्कैप प्रणाली पर पड़ता है.
जैविक खेती जहां आपदा न्यूनीकरण का प्राकृतिक साधन है वहीं अनियंत्रित निर्माण जोखिम बढ़ाता है. जैविकीय प्रमाणन ह्रासमान होते हैं क्योंकि जैविकीय खेती के लिए प्रदूषण से दूरी और रासायनिक अपवाह न होना आवश्यक दशा है. अब पहाड़ में निर्माण कार्य हेतु पाथर व पत्थर की जगह सरिया व सीमेंट, मिट्टी के स्थान पर बालू, खड़िया-कमेट व चूने की जगह रासायनिक रंग-रोगन व पेंट, नक्काशी दार खिड़की दरवाजों की जगह प्लाई का प्रयोग बढ़ता जा रहा है. जैविक पदार्थों के स्थान पर अकार्बनिक पदार्थों के प्रयोग से अपशिष्ट बढ़ रहे हैं जो समीप के खेत तक आ दूषण बढ़ाएंगे.ऐसे में जैविक उत्पाद का प्रीमियम मूल्य गिरेगा व किसान पुनः कम आय-ऊँचे जोखिम के दुश्चक्र में फंसेगा.
उत्तराखंड में पहले से ही कृषि भूमि घट रही है जिसके अनेक कारण हैं. जीवन निर्वाह हेतु की जा रही खेती के सापेक्ष राशन में मिला अनाज सस्ता दिखता है इसलिए प्रायः इसको उगाने के लिए की जाने वाली मेहनत से किनारा कर लिया जाता है. फसल का उचित मूल्य न मिलना व सीढ़ीदार छोटी जोत के खेत पर खेती करना अधिक मेहनत व अधिक लागत को दिखाता है. रोजगार के बेहतर अवसरों के लिए गाँव के परिवारों से पलायन का सिलसिला जारी रहता है. परिवार में बुजुर्गों व बच्चों की संख्या अधिक हो जाने की दशा पहले से ही श्रम शक्ति के अभाव को प्रकट करती है. कई स्थानों में खेतिहर भूमि व वन भूमि की सीमा को ले विवाद व कानूनी जटिलता बनी हुईं है. ऐसे में जब नीतिगत रूप से निर्माण को वैधता मिल जाए तो कृषि उपज की गिरावट की प्रवृति अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी रूप लेने लगेगी. कृषि भूमि घटने से स्थानीय उत्पादन गिरेगा. अनाज व सब्जियों को मैदान से आयात किये जाने की निर्भरता बढ़ेगी. पहाड़ी इलाके केवल उपभोक्ता क्षेत्र बन कर रह जायेंगे और आपदा व सड़क अवरोध की स्थिति में खाद्य असुरक्षा बढ़ेगी.
कृषि भूमि पर निर्माण का सबसे गंभीर पक्ष धारक-क्षमता पर पड़ने वाला प्रभाव है. यह किसी इलाके की ऐसी अधिकतम क्षमता है जिसमें जल, भूमि, भोजन, अपशिष्ट के साथ परिस्थितिकी संतुलन बनाए रखा जा सकता है. उत्तराखंड में अधिकांश शहर व कस्बोँ में धारक क्षमता का बोझ बढ़ता जा रहा है. तब समीपवर्ती गांवों में निर्माण की अनुमति से खेती पर ठोस कचड़े, मल, प्लास्टिक व अन्य रासायनिक अपशिष्ट का भार बढ़ेगा. जैव अपशिष्ट तो मिट्टी में समाहित हो जाते हैं पर पहाड़ की अपशिष्ट वहन क्षमता बहुत सीमित होती है. निर्माण की अनुमति जल-संसाधनों पर दबाव डालती है. पहाड़ की खेती वैसे ही वर्षा आधारित है जिसमें, टैंक व सीवेज निर्माण से जल के भूमिगत स्त्रोतों पर प्रभाव पड़ेगा जिससे पेय जल व सिंचाई संकट बढ़ेगा. परंपरागत जल स्त्रोत-धारे-नौले तो अब सिमटते ही जा रहे हैं. कृषि भूमि पर घर-रिसोर्ट की अनुमति से खेती योग्य जमीन की मात्रा व गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा ही. फलत: खाद्य निर्भरता कम होती जाएगी और पहले से ज्यादा अनाज मैदानों से आएगा. पहाड़ उपभोक्ता क्षेत्र बनता रहेगा, उत्पादक क्षेत्र की इसकी अपनी खास पहचान धूमिल होती जाएगी.
पहाड़ की कृषि भूमि उपरांऊ या उच्च स्थलों में सामान्यत:ढलान पर होती है जिस पर होने वाले निर्माण जैसे कि कटान, रिटेनिंग वाल व इनका सम्मिलित दबाव पारिस्थितिक जोखिम को बढ़ाएगा. जैविक खेती जहां मिट्टी को बांधती है वहीँ इस पर निर्माण भूमि को कमजोर करता है जिससे मिट्टी का क्षरण, भूमि का अवक्षय व अपरदन होगा. हर बारिश में पहाड़ की मिट्टी पानी के साथ नीचे को बहती है. किये जाने वाले निर्माण से इस बहाव की सघनता बढ़ेगी व परिणामतः मिट्टी और कमजोर होगी जिससे नदियों की गाद बढ़ेगी.
पहाड़ों में निर्माण की चाहत के रहते खेती व उद्यान की जमीन काफी अधिक खरीदी गई है और इस बारे में यही कहा जाता है कि जो पहले मालिक भू स्वामी थे अब वह नौकर चौकीदार बन कर रह गए हैं. सरकार इस सन्दर्भ में लम्बे समय तक चुप रही. जमीनें बिकती रहीं. अब तो इसकी अनुमति भी है जिसके आड़े-तिरछे उल्लंघन के अधिक गहरे सामाजिक-आर्थिक प्रभाव पड़ेंगे. अल्प काल में भले ही किसान या भूमि विक्रेता को भूमि की बिक्री से अल्पकालिक लाभ होता दिखाई दे पर खेती किसानी के सिमटने से उसकी दीर्घकालिक आजीविका पर प्रभाव पड़ना ही है. अगली पीढ़ी में खेती किसानी की अभिरूचि मिटती जा रही है. परंपरागत धंधे दम तोड़ रहे हैं. स्थानीय रोजगार योग्य कामगार दिखाई देने कम हो गये हैं. यह सिलसिला अभी जारी है तो जमीन पर निर्माण की अनुमति से असमान विकास व क्षेत्रीय असंतुलन की प्रक्रिया और बढ़ेगी. आरम्भ में जहाँ सड़क और बेहतर लोकेशन है वहां का किसान थोड़े लाभ में जरूर रहेगा पर दूरस्थ गांव और पिछड़ा महसूस करेंगे.
इस नीति की मूल समस्या में सरकार का तर्क लोगों को घर बनाने की सुविधा हो सकता है पर वास्तव में यह भूमि उपयोग में परिवर्तन की नीति है जो धारक क्षमता व जलागम आधारित ज़ोनिंग के मापन के बिना व कृषि-इकोतंत्र संरक्षण की परवाह किये बिना हिमालयी संवेदन शीलता के विरुद्ध जा सकती है. कृषि भूमि व इसकी मेढ़ो पर उगी झाड़ियाँ घास व विविध पौधे ढलानों को स्थिर रखती है पर निर्माण के लिए कटान, पत्थर व बोल्डर तोड़ने के लिए डायनामाइट का नियम विरुद्ध प्रयोग व फिर बना दी गई संरचनाएं भू स्खलन व मिट्टी के क्षरण को तो बढ़ाएंगी ही पानी के नैसर्गिक स्त्रोतों में भी बुरा प्रभाव डालेंगी.
उत्तराखंड में खेती की जमीन पर निर्माण की अनुमति जैविक खेती, खाद्य सुरक्षा व पर्यावरण संतुलन तीनों के लिए दीर्घकालिक खतरा है. अल्पकाल में इससे भले ही लाभ महसूस हों पर दीर्घकाल में यह पलायन, मैदानी भागों पर अनाज व सब्जी इत्यादि की निर्भरता व अधिक निर्माण से आपदा के जोखिम को बढ़ाएगी भी.
यह नीति आयोग द्वारा निर्दिष्ट निम्न एसडीजी मानकों के विरुद्ध जाती है :
भले ही एसडीजी स्कोर अच्छा हो पर जमीनी हकीकत कमजोर रहेगी क्योंकि गुणात्मक कारकों पर ध्यान नहीं दिया गया है. इस नीति की कमजोरी यह है कि इसमें धारक क्षमता के असेसमेंट का अभाव है. जलागम/कृषि व इकोतंत्र के आधार पर जोनिंग नहीं की गई है. यह तो अल्पकालिक विकास का दृष्टिकोण है जहाँ जैविक खेती को कानूनी संरक्षण नहीं है. साथ में यह पहाड़ी विशिष्टता की अनदेखी करती है. वैकल्पिक नीतिगत सुझाव में यह तर्क दिया गया कि इससे भूमि उपयोग में सुधार होगा क्योंकि यह कृषि भूमि पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं बल्कि एग्रो आधारित जोनिंग व कम्पैक्ट विलेज क्लस्टर पर आधारित है. इसके अधीन जैविक खेती के संरक्षण क्षेत्र तय होंगे व निर्माण के लिए न्यूनतम दूरी के नियम लागू रहेंगे. यह नीति खेती और भूमि रूपान्तरण के बिना होम स्टे पर आधारित है जिससे कृषि के साथ पर्यटन व हस्तशिल्प क्लस्टर को बढ़ावा मिलेगा.
इस नीति की आलोचना मुख्यतः इस पक्ष को लेकर है कि कृषि भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण उत्तराखंड के लिए जोखिम पूर्ण और दीर्घकाल में आत्मघाती है क्योंकि इससे जैविक खेती कमजोर होगी, धारक क्षमता पर बोझ पड़ेगा व खाद्य व जल प्राप्ति कम होने लगेगी. यदि इसे संशोधित, सीमित व क्षेत्र : विशिष्ट नहीं किया गया तो यह पलायन, आपदा और आयात निर्भरता को और बढ़ाएगी. यह आपत्ति कि कृषि भूमि पर निर्माण रोकने से आम आदमी को घर बनाने में कठिनाई होगी. इसके जवाब में यह तर्क दिया गया कि उचित नीति पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं, बल्कि अनियंत्रित फैलाव पर रोक लगाती है. खेती की जमीन पर बिखरा निर्माण रोक कर पानी, बिजली, सिंचाई सुविधा व सड़क बनाने की लागत कम होगी. कम्पैक्ट रेजिडेंशियल क्लस्टर -सीआरसी मॉडल के अंतर्गत गाँव के भीतर सघन आवास बनेंगे व बुनियादी सुविधाओं की बेहतर आपूर्ति की जानी सम्भव होगी. इस आधार पर यह नीति ग्रामीण हित के विरोध में नहीं बल्कि दीर्घकालिक हित में है.
दूसरी आपत्ति यह है कि इस नीति से विनियोग व पर्यटन प्रभावित होगा जिसका उत्तर यह है कि स्टे होम की अनुमति से यह विनियोग को स्पष्ट दिशा देगी, अराजक निर्माण न होने से भूमि विवाद व कानूनी जोखिम कम होंगे व दीर्घकालीन व टिकाऊ विनियोग क्रिया संभव होगी. जहाँ तक पहले से बने निर्माणों का प्रश्न है उसके लिए चरण बद्ध नियमितीकरण/पुनर्संरेखण के प्राविधान रखने होंगे. पहले से ही कृषि भूमि पर निर्माण होते रहे जिनके विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं हुईं. कृषि भूमि बेची गई जिस पर आलीशान कोठियाँ, भवन, रिसोर्ट बने. किसान “अपनी भूमि पर जो चाहे करे यह उसका अधिकार है” वाली सोच बलवती हुई. पहाड़ों में जो जमींनें रसूख वालों ने खरीदी उन्होंने इस जमीन पर निर्माण कार्य कराए, भव्य संरचनाएं बनी और प्राइवेट प्रॉपर्टी के बोर्ड भी लगे और जिन्होंने बेची उनमें से कितनों ने प्राप्त आगम से अपने जीवनस्तर में सुधार किया इस पर कोई व्यापक अध्ययन तो उपलब्ध नहीं है बस यह अनुमान हैं कि अपने कुछ दायित्वों को पूरा करने के साथ यह रकम खाने पीने में उड़ा दी गई. ऐसे में कृषि भूमि पर होम स्टे बनाने की नीति आजीविका का आधार तय करती है और इससे पलायन को रोकने का संरचनात्मक आधार विकसित हो सकता है. कारण वही कि पलायन का मुख्य कारण आजीविका का अभाव व खेती की अवहेलना है.
लोक हित में संतुलन बनाये रखने के लिए यह संकल्पना ध्यान में रखनी होगी कि भूमि निजी संपत्ति के साथ साथ सार्वजनिक पारिस्थितिक संसाधन भी है. सुप्रीम कोर्ट व नीति सिद्धांत के अनुरूप माना जाता है कि निजी अधिकार सार्वजनिक जोखिम की बराबरी नहीं करते. हिमाचल में कृषि भूमि का दर्शन आजीविका+सांस्कृतिक संपत्ति से है. कृषि भूमि का स्थानांतरण(सेक्शन 118) जैसे कि बिक्री, उपहार, लेन देन व प्रबंध मात्र कृषि-व्यवसायी को ही किया जा सकता है जिससे खेती की जमीन सिर्फ स्थानीय किसान के पास रहे इससे छोटी जोत वाले किसानों के हित सुरक्षित रहें. ऐसे में बाहरी समूह व गैर कृषि व्यवसायी खेती की जमीन खरीद कर भूमि की कीमत नहीं बढ़ा सकते. सरकार की अनुमति जरुरी है. निर्माण/खरीद से पहले किसान कौन है का प्रश्न मुख्य है. हिमाचल प्रदेश के उच्च न्यायालय ने गैर-हिमाचली व्यवसायियों द्वारा भूमि के बड़े टुकड़े खरीदने से सम्बंधित नियमों में संशोधन करने का आदेश सरकार को दिया है जिससे मूल उद्देश्य बना रहे. हिमाचल में भूमि उपयोग व भूमि रूपान्तरण पर 1977 के एक्ट के अनुसार कोई भी किसी स्थानीय योजना का उल्लंघन करके भूमि उपयोग में परिवर्तन नहीं कर सकता हालांकि 2025 में गैर कृषि भूमि के लिए कुछ छूट की प्रस्तावना दी गयीं हैं पर भूमि उपयोग परिवर्तन को स्थानीय योजनाओं के अनुरूप रखने व अदालत व विधायिका द्वारा सुरक्षा को और कठोर करने पर जोर है. इस प्रकार भूमि को बाजार की वस्तु नहीं बनने दिया है.
जम्मू कश्मीर में भी नई भूमि कानून व्यवस्था के प्रावधान में किसी बाहरी व्यक्ति को कृषि भूमि बेची नहीं जा सकती सिर्फ जम्मू-कश्मीर के कृषि व्यवसायी को ही कृषि भूमि बेची/खरीदी जा सकती है. कृषि व्यवसायी में खेती बागवानी व सहायक कृषि गतिविधियां शामिल हैं. इस तरह 90% से अधिक कृषि भूमि को स्थानीय हाथों में रखने का लक्ष्य है. इस प्रकार कृषि भूमि को खाद्य सुरक्षा संसाधन माना गया है. गैर-कृषि उद्देश्यों में बदलने के भी उचित नियम व अनुमति प्रक्रिया है. वहीं सिक्किम “छोटा राज्य, नाजुक पारिस्थितिकी” को स्वीकार करता है. उसके पास कृषि भूमि सीलिंग व सुधार एक्ट 1977 है जिसके हिसाब से सीलिंग सीमा से अधिक की भूमि सरकारी कर दी जाती है.बड़े विनियोगियों की रोक के लिए लैंड सीलिंग कानून हैं. उत्तर पूर्वी राज्यों में भूमि उद्योगों को देने या क्रय करने पर क्षेत्रीय नियंत्रण हैं जो जमीनी अधिकार संरक्षण का हिस्सा हैं. खास अल्पसंख्यक व अनुसूचित क्षेत्रों मेंभी कृषि भूमि सीलिंग व भूमि उपयोग नियंत्रण है. यहां भूमि समुदाय की सामूहिक संपत्ति है जिसमें बाहरी हस्तक्षेप न्यूनतम है. यह परंपरागत धारक क्षमता का मॉडल है.
उत्तराखंड में भूमि को विनियोग/पर्यटन संसाधन के रूप में देखा गया है जहां अब कृषि भूमि पर निर्माण से भूमि के विखंडन, जैविक खेती के क्षरण व जल/अपशिष्ट संकट का खतरा है. यह भूमि कानूनों से विचलन की सम्भावना भी देती है. प्रश्न यह भी है कि नीति आयोग के अध्ययन के हिसाब से राज्य का एसडीजी स्कोर अच्छा है. पर यह स्कोर सूचक आधारित है जो इस हकीकत को भुला देता है कि पहाड़ में खेती की जमीन का क्षरण हो रहा है और पीने के साफ पानी का संकट गहरा रहा है. अन्य हिमालयी/पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसे निर्माण की सीमाएं – जोनिंग आधारित नियंत्रण है तो उत्तराखंड में आपदा की संवेदन शीलता अधिक है ऐसे में “वन-साइज-फिट्स ऑल” की नीति उपयुक्त नहीं.
हिमालय सहित उत्तराखंड में भूमि उपयोग पर कई पक्ष प्रासंगिक हो जाते हैं जिससे सबसे पहले यह पता चले कि क्या भूमि उपयोग की वर्तमान नीतियाँ यहां की धारक क्षमता के अनुकूल हैं? दूसरा, कृषि भूमि पर निर्माण की अनुमति जैसे निर्णय एसडीजी लक्ष्यों से किस प्रकार टकराते हैं. तीसरा, यह जानना कि क्या एस डी जी सूचक में स्थानिक/जीआईएस आधारित सूचक शामिल किया जाना चाहिए? चौथा, यह प्रश्न कि क्या हिमालयी राज्यों के लिए “वन-साइज-फिट्स-ऑल” भूमि नीति उपयुक्त है? तथा राज्यों की भिन्न स्थितियों के प्रसंग में नीति आयोग को पर्वतीय राज्यों हेतु अलग लेंड गवरंनेंस एडवाईजरी जारी करनी चाहिए?
उपर्युक्त से संबंधित विमर्श हेतु पर्वतीय भूमि उपयोग sustainability ढांचा (एमएलयूएसएफ)उपयुक्त है जिसके मुख्य घटक निम्न हैं :
ये सभी संकेतक एसडीजी+आपदा जोखिम अवधारणा+जलवायु प्रतिक्रिया को एक साथ जोड़ते हैं. एसडीजी के ढांचे में भी सुधार किये जाने होंगे जिनसे जमीनी स्तर पर विमर्श संभव हो जैसे वर्तमान एसडीजी सूचक उत्पादन आधारित है जिसमें स्थानिक थात+प्राप्त प्रतिफल शामिल रहता है. इसी तरह राज्य औसत के साथ ब्लॉक व जलागम स्तर को शामिल किया जाए. क्षेत्रीय के साथ भूमि-जल-आजीविका को एकीकृत किया जाए. इससे एसडीजी सूचक जमीनी स्तर की वास्तविकता दशा को बताएगा. हमें यह ध्यान में रखना होगा कि हिमालयी राज्यों में भूमि उपयोग नीति केवल विकास का प्रश्न नहीं बल्कि राष्ट्रीय जोखिम प्रबंधन का विषय है यदि आज भूमि उपयोग दशाओं को एसडीजी के केंद्र में नहीं रखा गया तो आने वाले दशक में आपदा की लागत, खाद्य निर्भरता व जल संकट राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेंगे.
अन्य हिमालयी राज्यों में कृषि भूमि संरक्षित संसाधन है तो उत्तराखंड में विकास योग्य भूमि जो हिमालय की पारिस्थितिकी के विरुद्ध है. अन्य राज्यों में भूमि रूपान्तरण अंतिम विकल्प है तो उत्तराखंड में प्राथमिक उपकरण. इसी तरह अन्य राज्यों में धारक क्षमता निहित व स्पष्ट है तो उत्तराखंड में इसके अनुमान अनुपस्थित हैं. यहां की नीति में अधिकतम बिल्ड सीमा अस्पष्ट है तो इसी प्रकार जल उपलब्धता बनाम मांग, अपशिष्ट सहनशीलता व ढलान पर बसाव व भूस्खलन सीमा भी नियत नहीं. धारक क्षमता के बिना निर्माण अनुमति अंधा निर्णय है. अन्य राज्यों में जहां एसडीजी अलाइनमेंट मजबूत हैं तो उत्तराखंड में इसमें विरोधाभास है.अन्य राज्यों में आपदा जोखिम नीति का आधार है तो उत्तराखंड में घटना घटने के बाद का विषय.
उत्तराखंड जैविक/प्राकृतिक खेती वाले राज्य के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करता है पर जोतों का आकार छोटा होने, विखंडित होने, जल मल व रासायनिक खाद व कीट नाशक के बढ़ते प्रयोग से मिट्टी में इसकी घुलनशीलता व प्रमापीकरण का अभाव जैविक नीति की बेहतर सम्भावनाओं को कम कर देती है. अन्य हिमालयी राज्यों में जहां कृषि भूमि संरक्षित है वहीँ उत्तराखंड में इसका उपयोग लचीला है. अन्य राज्यों में बाहरी दबाव नियंत्रित हैं तो उत्तराखंड में अपेक्षा कृत खुला. अन्य राज्य में निर्माण अपवाद है तो उत्तराखंड में प्रोत्साहन मूलक. अन्य में नीति का आधार पारिस्थितिकी आधारित है तो उत्तराखंड में आर्थिकी आधारित. आपदा व जोखिम हेतु अन्य हिमालयी राज्य पूर्व नियोजित तैयारी करते हैं तो उत्तराखंड में प्रतिक्रियात्मक. इन आधारों पर उत्तराखंड हिमालयी नीति सहमति से हट रहा है.
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
इसे भी पढ़ें : उत्तराखंड विकास नीतियों का असमंजस
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
पिछली कड़ी : उत्तराखंड विकास नीतियों का असमंजस उत्तराखंड में पलायन मात्र रोजगार का ही संकट…
पुराने समय की बात है. हिमालय की तराइयों और पहाड़ी रास्तों से होकर जाने वाले…
तिब्बत और उससे जुड़े पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों का समाज लंबे समय तक भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक…
हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों और कस्बों में जब कोई आगंतुक किसी…
नाम को तोड़-मरोड़ कर बोलना प्रत्येक लोकसंस्कृति की खूबी रही है. राम या रमेश को रमुवा, हरीश…
विश्व के लगभग हर महाद्वीप में ऐसे व्यक्ति पाए जाते हैं जिन्हें बीमारी, संकट और…