नाम को तोड़-मरोड़ कर बोलना प्रत्येक लोकसंस्कृति की खूबी रही है. राम या रमेश को रमुवा, हरीश को हरूवा, सुरेश को सुरिया. ये नाम केवल लोकव्यवहार में प्रचलित थे, इनमें एक स्नेह एवं अपनत्व की भावना रहती थी. दस्तावेजी नाम शुद्ध ही लिखा जाता था. इसके विपरीत महिलाओं का नाम जो बोला जाता था, वही दस्तावेजों में भी दर्ज किया जाता था.
आज से छः -सात दशक पूर्व तक लछुली, सरूली, दुर्गुली और परूली जैसे नाम दस्तावेजों में भी दर्ज होते, जो लक्ष्मी,सरस्वती, दुर्गा व पार्वती का ही लोक के अनुसार ही परिवर्तित रूप था. कहने का आशय यह है कि सारे नाम चाहे स्त्री के हों अथवा पुरूष के देवी-देवताओं के नाम से रखे जाते थे. लेकिन मूल नाम के बाद ’देवी’ शब्द की अनिवार्यता थी. जाति का उल्लेख अन्तिम नाम में भले ही न हो, लेकिन मध्य का नाम ’देवी’ के बिना अधूरा समझा जाता और ’देवी’ लिखे जाने के पीछे कोई जातिगत विभेद नहीं था, चारों वर्णों की स्त्रियों के मूल नाम के साथ ’देवी’ शब्द जोड़ा जाता था.
कालान्तर में लछुली, लक्ष्मी हो गयी और परूली- पुष्पा या प्रेमा लेकिन नाम के बाद ’देवी’ शब्द का प्रयोग अवश्य होता.महिला विवाहित हो अथवा अविवाहित बीच का नाम ’देवी’ अवश्य प्रयुक्त होता और प्रायः देवियों के नाम पर ही लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती, भवानी, गंगा, भागीरथी जैसे नाम रखे जाते. महिला को समाज में देवी का स्वरूप माना जाता था और यह बीच का नाम उनको दिये जाने वाले सम्मान का प्रतीक था. फिर दौर आया ऐसे नामों का जब देवियों के नामों के साथ ही चम्पा, विमला, मंजू, भावना, ललिता, दीपा, ज्योति, शान्ति जैसे नाम चलन में आये, जो कर्णप्रिय अथवा किसी विशेष गुण की ओर ईशारा करते. लेकिन तब भी नाम के साथ देवी बीच का नाम जोड़ा जाता था.
समय प्रवाह में महिलाओं के बीच का नाम ’देवी’ कब लुप्त हुआ, पता ही नहीं चला। ’देवी’ के सम्मानजनक शब्द में न मालूम तथाकथित आधुनिकीकरण की दौड़ में इसे गंवई अन्दाज समझकर अथवा नाम संक्षिप्तीकरण की ललक अथवा मुखसुख की दृष्टि से मध्य नाम ’देवी’ गुम होता गया. बिना किसी मुहिम चलाये ’देवी’ शब्द चलन से हट गया और आज बस कुछ वृद्ध महिलाओं में बीच का ’देवी’ नाम शेष बचा है. जाहिर है कि आने वाली एक-दो दशाब्दी के बाद यह अतीत की बात बनकर रह जायेगी.
आज तो ऐसे-ऐसे नाम चलन में आ चुके हैं, जिनका अर्थ जानने के लिए आपको गूगल अथवा शब्दकोश का सहारा लेना पड़ेगा. एक बार किसी पर्यटक युगल को जब मैंने दिवंगत नाम से पुकारना सुना तो मैं आश्चर्यचकित हो गया. आखिर अपनी प्रिय संतान को यह नाम देना क्या मजबूरी रही होगी. यदि इस नाम के अर्थ से वे स्वयं वाकिफ न भी थे तो क्या नाते-रिश्तेदार ने भी कभी उन्हें टोका नहीं होगा. आज तो चिन्टू, मिन्टू, पिन्टू ऐसे नाम चलन में आ गये हैं, जिनका कोई शब्दिक अर्थ ही नहीं है. कहा गया गया है – यथा नाम तथो गुणाः. हमारे नाम का आंशिक प्रभाव ही सही हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है. इसीलिए पहले पुरूष व महिलाओं के नाम देवी-देवताओं के नाम से रखे जाते थे।
यही नहीं आज तो विवाहित व अविवाहित की स्थिति दर्शाने वाले कुमारी व श्रीमती जैसे शब्द भी अब दस्तावेजों तक सिमट चुके हैं। सामान्य बोलचाल में यह अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है कि अमुक महिला विवाहित है अथवा अविवाहित, इसके लिए जानकारी के अभाव में सुश्री का उपयोग करना बाध्यता हो जाती है.
भागवत पुराण में अजामिल नाम के ब्राह्मण का उल्लेख आता है, जो पापी व दुराचारी था, लेकिन अन्त समय पर अपने पुत्र का नाम नारायण पुकारकर परोक्षरूप से ही सही भगवान के नामोच्चार से उसको भगवान की शरणागति मिली. किसी महिला या पुरूष के नाम देवी-देवताओं के नाम पर रखे जाने के पीछे यही कारण रहा कि अनजाने में ही सही उनके नाम पुकारकर भगवान का स्मरण हो जाये.
महिलाओं की तरह ही पुरूषों के नाम भी देवताओं के नामों पर रखे जाते थे और मूल नाम के बाद ब्राह्मण वर्ग में दत्त (लक्ष्मीदत्त, हरिदत्त, गंगादत्त, प्रयागदत्त) बल्लभ, कान्त अथवा पति (राधाबल्लभ, हीराबल्लभ, रमाकान्त, उमाकान्त, लक्ष्मीकान्त, रमापति, उमापति, कमलापति), देव (नरदेव, जयदेव, हरदेव,), मणि (लालमणि, लोकमणि, चिन्तामणि). इस बीच के नाम के पीछे भी एक पवित्र भावना हुआ करती थी. दत्त का अभिप्राय प्रदत्त या दिया हुआ मानकर किसी को राम का आशीर्वाद स्वरूप माना तो रामदत्त इसी तरह अपनी सन्तान को देवी-देवताओं व तीर्थों द्वारा प्रदत्त भेंट मानकर लक्ष्मीदत्त, शिवदत्त, ब्रह्मदत्त, विष्णुदत्त , हरिदत्त, गंगादत्त, प्रयागदत्त, केदारदत्त, बद्रीदत्त आदि नाम रखे जाते थे.
बीच का नाम प्रसाद जैसे गंगाप्रसाद, बद्रीप्रसाद, रामप्रसाद और हरि प्रसाद नाम भी कुछ इसी तरह ईशारा करते हैं. ये वो नाम हैं जो पांच-छः दशक पूर्व तक थे, आज इस नाम वाले गिने चुने लोग समाज में मौजूद हैं, जो कुछ साल बाद पूर्णतः लुप्त हो जायेंगे. विशेषरूप से ब्राह्मणों तथा अन्य वर्णों में भी पांच-छः दशक पूर्व बीच के नाम के रूप ’चन्द्र’ व ’कुमार’ बड़े शौक से चलन में आया. वास्तव में चन्द्र शब्द का प्रयोग भगवान राम के साथ सबसे पहले जोड़ा गया था. यद्यपि भगवान राम सूर्यवंशी थे, लेकिन उनमें चन्द्रमा की तरह शीतलता, सौम्यता, गम्भीरता तथा सहनशीलता के कारण उनके नाम के साथ ’चन्द्र’ शब्द जोड़ा गया. लेकिन आज कुमार और चन्द्र जैसे बीच के नाम भी प्रायः लुप्त होते जा रहे हैं. लेकिन आज ये सारे मध्य के नाम लगभग गायब हो रहे हैं, केवल प्रथम नाम तथा जातिसूचक नाम ही अस्तित्व में हैं. वह भी केवल दस्तावेजों तक अन्यथा केवल प्रथम नाम के ही प्रयोग की ओर हम आगे बढ़ रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि आने वाले एक-दो दशक बाद सरकारी दस्तावेजों में मध्य नाम के कॉलम की आवश्यकता होगी.
इसी तरह वैश्य समाज द्वारा ’लाल’ और बाद में ’कुमार’ शब्द बीच के नाम में प्रयुक्त होता था. दोनों का अभिप्राय पुत्र से हैं, जिस प्रकार राजा के पुत्र को राजकुमार तथा कभी कभी हम अपने पुत्र को मेरा लाल कहकर संबोधित कर देते हैं.’कुमार’ तो एक ऐसा मध्य नाम हुआ करता था, जो हर जाति के लोगों द्वारा शौकिया अपना लिया गया. लेकिन आज वैश्य समाज में भी ये बीच के नाम लगभग लुप्त होता जा रहा हैं.
दलित वर्ग द्वारा पहाड़ों में बीच के नाम में ’राम’ शब्द आम चलन में था. इसके पीछे मनसा यही थी कि किसी न किसी बहाने भगवान के नाम का उल्लेख उनके नाम के साथ हो. मसलन किसी का नाम चनी, पनी, मनी, रतन आदि हो, जिसमें कहीं भी भगवान का नाम शामिल नहीं है तो पनीराम, चनीराम, मनीराम व रतनराम नाम रखकर राम का नाम उच्चरित हो सके. हालांकि ’राम’ शब्द कुछ दशक पूर्व तक ब्राह्मण वर्ग द्वारा भी बीच के नाम में प्रयुक्त किया जाता था. अब किसी ब्राह्मण वर्ग में पैदा हुए बच्चे का बच्ची पड़ा तो राम का नाम साथ जोड़ने के लिए बच्चीराम रख दिया गया, लेकिन आज की पीढ़ी में बीच के नाम में ’राम’ का प्रयोग लगभग विलुप्त होता प्रतीत होता है.
क्षत्रिय वर्ग में मध्य नाम में कोई विकल्प की गुंजाईश नहीं है. हर क्षत्रिय अपने नाम के आगे ’सिंह’ शब्द का प्रयोग करता है. आमतौर पर हर क्षत्रिय स्वयं को राजपूत कहता है. जबकि राजपूत शब्द स्वयं ही परिभाषित है, जो राजा का पुत्र वही राजपूत. जाहिर है कि भारत में जितने भी राजा हुए अमूमन क्षत्रिय वंश के थे, उनकी सन्तति स्वयं को राजपूत कहने लगी.लेकिन आज क्षत्रिय व राजपूत समानार्थी बन गये हैं.
यहां पर एक रोचक बात ध्यान देने की है, पिछले पांच-छः सौ साल पूर्व तक जितने भी क्षत्रिय राजा हुए उन्होंने अपने नाम के आगे ’सिंह’ शब्द का प्रयोग नहीं किया. त्रेता में रघुवंश के किसी भी राजा ने दशरथ सिंह , रामसिंह, लक्ष्मणसिंह आदि अथवा द्वापर में कौरव एवं पाण्डवों में युधिष्ठिर सिंह और अर्जुन सिंह जैसे नाम नहीं हुआ करते थे. यहाँ तक की वर्तमान युग के क्षत्रिय राजा पृथ्वीराज चौहान ने भी ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग मध्य नाम में नहीं किया.
जाहिर है कि यह ’सिंह’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सिक्खों के दसवें गुरू, गुरूगोबिन्द सिंह से शुरू हुआ. यह कोई वंशानुगत मध्यनाम न होकर शौर्य के प्रतीक स्वरूप पदवी के दौर पर दिया गया नाम है. जब कि सिक्ख महिलाओं में नाम के आगे ‘कौर’ लिखा जाने लगा. ये बात अलग है कि बाद में कुछ ने वंशानुगत रूप से इस मध्य नाम को अपनाया और क्षत्रिय होने के नाते इस ’मिडिल नेम’ का उपयोग कर लिया. लेकिन आज स्थिति ये है कि सिक्खों से इतर ब्राह्मण वर्ग को छोड़कर किसी भी वर्ण द्वारा इस नाम को मध्य नाम के रूप में प्रयोग करने में किसी को कोई परहेज नहीं है. यहां तक की महिलाऐं जो मध्य नाम देवी का प्रयोग तो लगभग भूल चुके हैं, जबकि अपने नाम के आगे बड़ी ठसक के साथ सिंह शब्द का खूब इस्तेमाल करने लगी हैं, जबकि भाषायी दृष्टि से सिंह शब्द पुल्लिंग का द्योतक है. महिला शेर नहीं हो सकती वे शेरनी ही कहलायेंगी, तब क्या महिलाओं द्वारा मध्य नाम ’सिंह’ के बजाय ’सिंहनी’ लिखना भाषाविज्ञान की दृष्टि से अधिक उपयुक्त नहीं होता?
– भुवन चन्द्र पन्त
भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं. काफल ट्री में प्रकाशित लेखक की अन्य रचनाएं:
कुमाऊनी रामलीला के तबला उस्ताद: मास्साब मनोहर लाल
भवाली में रामलीला की परम्परा
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बहुत सुंदर और विचारणीय लेख। लेकिन एक चीज़ खटकी। आप कहते हैं "जाहिर है कि भारत में जितने भी राजा हुए अमूमन क्षत्रिय वंश के थे"। यह एक आम भ्रांति है। वास्तव में भारत के इतिहास में ज़्यादातर शूद्र राजा रहे हैं। ये अलग बात है कि राजा बनने के बाद वह क्षत्रिय या राजपूत कहलाए। अभी भी हमारे राजे महाराजे जैसे सिंधिया गायकवाड़ होलकर भांजदेव आदि जाति से क्षत्रिय नहीं हैं कर्म से हैं।