उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में लिखे गए यात्रा-वृतांत भारत के सामाजिक, प्रशासनिक और भौगोलिक इतिहास को समझने के महत्त्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं. रेजिनाल्ड हेबर द्वारा रचित ‘नैरेटिव ऑफ़ ए जर्नी थ्रू द अपर प्रोविन्सेज़ ऑफ़ इंडिया’ इसी परंपरा का एक ग्रंथ है. यह पुस्तक 1826–27 के दौरान की गई यात्राओं पर आधारित है और 1828 में लंदन से प्रकाशित हुई. लेखक उस समय कलकत्ता के बिशप थे; इसलिए उनका दृष्टिकोण केवल एक यात्री का नहीं, बल्कि एक औपनिवेशिक प्रशासकीय और धार्मिक अधिकारी का भी है. यह तथ्य इस ग्रंथ को विश्लेषण के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाता है.
यह यात्रा-वृतांत केवल मार्गों और स्थानों का विवरण नहीं देता; यह तत्कालीन उत्तर भारत की ग्रामीण संरचना, कस्बों की दशा, कृषि व्यवस्था, कर प्रणाली, सैन्य उपस्थिति और प्रशासनिक व्यवहार पर निरंतर टिप्पणी करता है. इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, बरेली, अल्मोड़ा और आगे हिमालयी क्षेत्रों तक फैली यात्रा के दौरान लेखक जिस सूक्ष्मता से लोगों के रहन-सहन, भाषा, भोजन और धार्मिक आचरण को दर्ज करता है, उससे यह ग्रंथ एक प्रकार के सामाजिक दस्तावेज़ का रूप ले लेता है. हेबर की टिप्पणियां प्रायः वर्णनात्मक हैं; वे भावनात्मक भाषा से बचते हुए जो देखते हैं, उसे क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करते हैं.
इस पुस्तक का ऐतिहासिक संदर्भ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सुदृढ़ होते शासन से जुड़ा है. मराठा शक्ति के पतन और अवध तथा दोआब क्षेत्र में कंपनी के प्रभाव विस्तार के बाद का यह काल प्रशासनिक पुनर्गठन का समय था. हेबर के विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार सैन्य टुकड़ियां, कर वसूली की प्रणाली और स्थानीय ज़मींदारों की भूमिका ग्रामीण जीवन को प्रभावित कर रही थी. वे कई स्थानों पर ब्रिटिश शासन और पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं के बीच तुलना करते हैं; यह तुलना प्रशंसात्मक या आलोचनात्मक होने के बजाय पर्यवेक्षणात्मक है, जिससे पाठक को तत्कालीन बदलावों की प्रकृति समझने में सहायता मिलती है.
सामाजिक दृष्टि से यह ग्रंथ जाति, पेशा और धार्मिक पहचान की जटिल संरचना को सामने लाता है. हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के बीच अंतःक्रियाओं का उल्लेख, तीर्थयात्रियों, साधुओं, सैनिकों और किसानों के जीवन का विवरण तथा यात्रियों के लिए बने सरायों और मार्गों की स्थिति, सब मिलकर उस समय के सामाजिक ताने-बाने की एक समग्र तस्वीर प्रस्तुत करते हैं. लेखक कई बार स्थानीय लोगों की भाषा और व्यवहार पर ध्यान देते हैं; इससे यह स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक अधिकारी स्थानीय समाज को किस दृष्टि से समझने का प्रयास कर रहे थे.
पर्यावरण और भूगोल का वर्णन भी इस यात्रा-वृतांत का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है. दोआब के मैदानों से लेकर तराई और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों तक, जलवायु, वनस्पति, वर्षा और नदियों की भूमिका का विस्तृत उल्लेख मिलता है. विशेष रूप से वर्षा की अनिश्चितता, जंगलों की स्थिति और बीमारियों का प्रसार, उस समय की जीवन स्थितियों को समझने के लिए उपयोगी संकेत प्रदान करते हैं. यह विवरण किसी रोमांचक प्रकृति-चित्रण के बजाय संसाधनों और जीवन-यापन की वास्तविकताओं से जुड़ा हुआ है.
लेखक का धार्मिक पद उनके लेखन को एक विशिष्ट स्वर देता है, किंतु यह ग्रंथ किसी प्रचारात्मक धार्मिक उद्देश्य से संचालित नहीं दिखता. ईसाई मिशनरी गतिविधियों, स्थानीय आस्थाओं और धार्मिक संवादों का उल्लेख एक पर्यवेक्षक के रूप में किया गया है. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि औपनिवेशिक काल में धर्म, प्रशासन और समाज के बीच किस प्रकार के संबंध विकसित हो रहे थे.
समकालीन संदर्भ में इस यात्रा-वृतांत का महत्त्व इसके ऐतिहासिक साक्ष्य मूल्य में निहित है. आज जब उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में सामाजिक और पर्यावरणीय परिवर्तन तेज़ हो चुके हैं, तब हेबर के विवरण अतीत की स्थितियों का तुलनात्मक आधार प्रदान करते हैं. यह पुस्तक किसी निष्कर्षात्मक निर्णय के बजाय अध्ययन और विश्लेषण का अवसर देती है; इसी कारण यह इतिहास, समाजशास्त्र और पर्यावरण अध्ययन के पाठकों के लिए एक उपयोगी स्रोत बनी रहती है.
इस पुस्तक में रेजिनाल्ड हेबर ने कुमाऊँ क्षेत्र के ‘खस’ अथवा ‘खसिया’ समुदाय पर एक पूरा पृष्ठ समर्पित किया है, जिसमें उन्होंने उनके सामाजिक आचरण, खान–पान संबंधी नियमों, भाषा और आत्म-परिचय से जुड़ी धारणाओं का वर्णन किया है. नीचे प्रस्तुत पाठ उसी मूल अंग्रेज़ी अंश का हिंदी अनुवाद है, जिसे शब्दशः रखा गया है, ताकि पाठक लेखक के मूल दृष्टिकोण और भाषा-प्रयोग को सीधे समझ सकें.
सभी खसिया जाति के लोग अपने आप को उच्चतम श्रेणी के राजपूत मानते हैं और भोजन तथा पेय के विषय में अत्यंत कठोर नियमों का पालन करते हैं. वे अपनी छोटी पहाड़ी गायों में से एक को भी किसी परदेसी को बेचने के लिए तब तक तैयार नहीं होते, जब तक वह यह शपथ न ले कि वह न तो स्वयं उस गाय को मारेगा और न ही उसे किसी अन्य को मारने के उद्देश्य से सौंपेगा. चूंकि ये गायें बहुत कम दूध देती हैं, और चिड़िया के पंखों में इनकी रुचि न होने के कारण इनके गांवों में मुर्गीपालन नहीं किया जाता, इसलिए जो कोई परदेसी उनके प्रदेश से होकर गुजरता है और जो स्वयं शिकार नहीं कर सकता, या जिसके पास श्री बोल्डरसन जैसे कोई मित्र न हों जो उसके लिए यह काम कर सकें, उसके लिए भोजन की व्यवस्था अत्यंत कठिन हो जाती है. ऐसे व्यक्ति को आमतौर पर बहुत सूखी काली रोटी और पानी से ही संतोष करना पड़ता है; कभी-कभी थोड़ा-सा शहद मिल सकता है.
वे स्वभाव से संकोची, कोमल और आदरपूर्ण लोग हैं; अपने व्यवहार में ईमानदार हैं और सत्य से प्रेम के लिए उतने ही प्रसिद्ध हैं, जितने राजमहल और बोगलीपुर के पहाड़ी लोग (शायद यह आधुनिक झारखंड-बिहार के राजमहल और भागलपुर के बारे में कहा है). चूंकि उनकी भाषा हिंदोस्तान की भाषा से भिन्न है, इसलिए मुझे यह जानने की उत्सुकता थी कि क्या यह अन्य पर्वतीय लोगों की भाषा से मिलती-जुलती है; किंतु मुझे पता लगा कि एक अवसर पर श्री ट्रेल के साथ बंगाल गए इस समुदाय के लोग, दक्षिणी पहाड़ी निवासियों के लिए पूरी तरह असमझ थे. वास्तव में उनका वास्तविक या कथित राजपूत वंश स्वयं ही यह प्रमाणित करता है कि वे एक भिन्न जाति के लोग हैं.
श्री बोल्डरसन से, जो स्वयं भी उस दल में सम्मिलित थे, मुझे यह ज्ञात हुआ कि श्री ट्रेल के साथ गए इन लोगों ने राजमहल की पहाड़ियों की ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया, यहां तक कि उनके ऊपर से गुजरते समय भी नहीं. श्री बोल्डरसन ने उनसे कहा, “क्या आपको फिर से पहाड़ देखकर प्रसन्नता नहीं हो रही है?” उनका उत्तर था, “कौन-से पहाड़?” उन्होंने कहा, “ये पहाड़, निश्चय ही.” इस पर उनका उत्तर था, “ये पहाड़ नहीं हैं; ये तो खिलौने हैं.”
इसी वृतांत में रेजिनाल्ड हेबर ने खस लोगों के पहनावे, शारीरिक बनावट और श्रमशील जीवन के दृश्य का भी वर्णन किया है. यह विवरण उनके द्वारा यात्रा के दौरान प्रत्यक्ष रूप से देखे गए समूहों पर आधारित है और इसमें हेबर का ध्यान विशेष रूप से वेशभूषा, आभूषण तथा बाह्य रूप और वास्तविक आर्थिक स्थिति के बीच दिखाई देने वाले विरोधाभास पर केंद्रित है. प्रस्तुत है उस मूल अंग्रेज़ी अंश का हिंदी अनुवाद –
हमने खसिया कृषक समुदाय के दो या तीन दलों को जंगल में अपनी वार्षिक खेती के लिए नीचे की ओर जाते हुए देखा. पुरुष सभी मध्यम कद के, दुबले और फुर्तीले थे; उनका रंग बहुत गहरा नहीं था, किंतु उनका पहनावा अत्यंत गरीब और अपर्याप्त था. बड़े डंडों के अतिरिक्त उनके पास कोई हथियार नहीं था. स्त्रियां देखने में सुंदर हो सकती थीं, अगर वे धूप से इतनी झुलसी हुई और श्रम से इतनी थकी हुई न होतीं, या अगर उनकी नाक और कान इतने अधिक लटके हुए न होते, जो उन भारी धातु के छल्लों के कारण ऐसे थे, जिनसे वे सजी हुई थीं. उनका पहनावा एक मोटे कपड़े का था, जिसे वे कमर के चारों ओर लपेटती थीं; सिर और कंधों पर एक काला कम्बल रखा था.
सभी के पास चांदी की चूड़ियां और पायलें थीं; यह ऐसी बात थी, जो एक यूरोपीय नज़र को, उनके अत्यधिक गरीब रूप के कारण विरोधाभासी प्रतीत होती थी. उनकी परिश्रमशीलता अत्यंत अधिक प्रतीत होती है. जहां कहीं ढलान इतनी कम होती थी कि वहां हल या फावड़े का प्रयोग संभव न हो, वहां भी हमें भूमि के छोटे-छोटे टुकड़े मिले, जो कभी केवल चार फुट चौड़े और दस या बारह फुट लंबे होते थे, और जिन्हें अत्यंत सावधानी और सुघड़ता से जोता गया था. इनमें से कुछ खेत छोटे-छोटे सीढ़ियों के रूप में एक-दूसरे के ऊपर बने थे, जिन्हें ढीले पत्थरों की दीवारों का सहारा दिया गया था; और मेहनत और जनसंख्या के ये संकेत इसलिए और अधिक ध्यान खींचने वाले थे, क्योंकि वास्तव में हमें एक भी स्थायी निवास दिखाई नहीं दिया. यहां तक कि भीमताल (तत्कालीन अंग्रेजी में Beemthaal) में भी, कंपनी के पहरेदार कक्ष और गोदामों के अलावा, केवल एक अत्यंत दयनीय झोपड़ी ही नज़र आई.
मंजुल
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