फोटो http://agriculturecircle.com से साभार
उत्तराखंड जिले के सीमांतवर्ती क्षेत्र उपला टकनौर पट्टी के अंतर्गत जसपुर, हर्षिल, झाला, धराली, पुराली, बगोरी, मुखवा और सूखी, के एक दर्जन से अधिक गांव आते हैं. यहाँ की 90 प्रतिशत आबादी सेब की फसलों पर निर्भर रहते हैं और सेब की पैदावार होने से यहां के किसानों की रोज-रोटी चलती है. मौसमी बर्फबारी होने से सेब की फसल को इसका लाभ पहुंचता है. इस क्षेत्र में चार दशकों में 90 फीसदी तक कम हो गई है.
गोल्डन डिलिशियस’ और रेड डिलिशियस प्रजाति के सेबों का उत्पादन भी होता है. दुनिया भर में सेब की 7500 प्रजातियां पाई जाती हैं जिसमें, रेड डिलीसियस और गोल्डन डिलीसियस सबसे स्वादिष्ट प्रजाति होती है. हालिया शोध के मुताबिक, स्नो लाइन (हिमरेखा) पीछे खिसकने और बढ़ती गर्मी से बर्फबारी कम होने से दुनिया के यह दो सबसे मीठे और स्वादिष्ट सेब की प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं.
गोल्डन और रेड डिलिशियस सेब को लगभग 45 दिनों तक शून्य से तीन डिग्री तक के तापमान जरूरत होती है, लेकिन वर्तमान में इसका आधा बर्फीला मौसम भी इन फसलों को नहीं मिल रहा. उत्तराखंड ही नहीं, जम्मू कश्मीर, हिमाचल, सिक्कम और अरुणाचल प्रदेश में स्नोलाइन औसतन लगभग 40 से 50 मीटर तक पीछे चली गई है.
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