पलायन ने राज्य के पहाड़ी गाँवों के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है. सैंकड़ों गाँव वीरान हो चुके हैं. रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन भीषण हो चुका है. ऐसे वक़्त में पौड़ी के दुर्गम पहाड़ी गाँव से उम्मीद की किरण दिखाई दी है. पहाड़ की जीवनरेखा मानी जाने वाली महिलाओं ने पलायन से निबटने के लिए एक मॉडल तैयार किया है. महिलाओं की इस मजबूत उपस्थिति ने सरकार के भी कान खड़े करने में कामयाबी हासिल करने के अलावा देश-विदेश का ध्यान भी आकर्षित किया है.
पौड़ी जनपद मुख्यालय से 9 किमी की दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत वजली के गौरीकोट गाँव की 18 महिलाओं के एक समूह द्वारा वर्ष-2014 में गौरी स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया. सहकारिता विभाग की एकीकृत सहकारी विकास योजना के अंतर्गत एक ही स्थान पर विभिन्न कृषि व सम्बद्ध कार्यों को करने के लिए इसका गठन हुआ. योजनान्तर्गत एक ही स्थान पर विभिन्न कार्य किये गए. बेमौसमी सब्जी उत्पादन, मुर्गी पालन, मछली पालन, दलहन व फूलों का उत्पादन किया जाना था. समूह को 1 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और 200 नाली बंजर भूमि की व्यवस्था दी गयी.
फोटो साभार: www.jagran.com
इसके अलावा समूह को विभिन्न विभागों द्वारा अन्य सहायताएँ भी उपलब्ध करवाई गयीं. स्रोत से खेत तक पानी ले जाने के लिए लघु सिंचाई विभाग द्वारा 1 किमी गूल का निर्माण किया गया. कृषि विभाग द्वारा 12 वर्मी कम्पोस्ट पिट, 5 लकड़ी की वर्मी पिट, वाटर पावर ट्रेलर. उद्यान विभाग द्वारा बीज, कीटनाशक इत्यादि दिए गए. एक गैर सरकारी संगठन द्वारा पॉली हाउसों का निर्माण किया गया. समूह द्वारा मछली पालन के लिए बनाये गए तालाब के लिए मतस्य विभाग द्वारा बीज व अन्य तकनीकी सहायता उपलब्ध करवाई गयी.
इसके बाद संस्था सदस्यों के एकीकृत प्रयास से 40 नाली भूमि पर बेमौसमी सब्जियां जैसे हरी मटर, गाजर, बीन्स. गोभी आदि की खेती की गयी. यह प्रयास काफी सफल रहा, सहकारिता विभाग से 5 लाख का ऋण लेकर ‘वन विलेज-वन फार्म’ की परिकल्पना साकार करने की शुरुआत आगे बढ़ी.
वर्तमान समय में 200 नाली (4 हेक्टेयर) भूमि को उपजाऊ बना लिया गया है. एकीकृत कृषि के इस मॉडल में बेमौसमी सब्जी उत्पादन, मुर्गी पालन, दलहन उत्पादन, फूल उत्पादन आदि किया जा रहा है.
बेमिसाल कार्यों ने इस समूह को ‘यूथ आइकन अवार्ड’. ‘सर्वश्रेठ कृषक अवार्ड’, ‘सर्वश्रेठ मतस्य पुरस्कार’, आदि दिए जा चुके हैं. गौरी स्वयं सहायता समूह गौरीकोट के इस सफल प्रयास को पर्वतीय क्षेत्र के लिए आदर्श की तरह देखा जा रहा है. संस्था अब इको टूरिस्म की तरफ अपने कदम बढ़ने को प्रतिबद्ध है. इस प्रोजेक्ट को राज्य से पलायन रोकने के सशक्त मॉडल के रूप में देखा जा रहा है.
(उत्तराखण्ड सरकार की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट – 2017-18 के आधार पर)
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