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पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल

पिछली कड़ी : कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे का बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व : इतिहास से जनआंदोलन तक

कुमाऊं गढ़वाल के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था व प्रथक पहाड़ी राज्य की संकल्पना को वैचारिक आधार देने वाले आरंभिक बुद्धिजीवियों व अधिवक्ताओं में इन्द्र सिंह नयाल सर्वोपरि रहे. उन्होंने कानूनी दांव-पेंच का सार्थक उपयोग स्वाधीनता की लड़ाई लड़ रहे आंदोलनकारियों के हित में किया. वह विज्ञान के विद्यार्थी रहे इसलिए उनके प्रशासनिक तर्क औपनिवेशिक सत्ता के लिए नासूर बन गये. कुमाऊं परिषद के मंच के माध्यम से प्रशासन से संवाद कर आम जन के हक में पहाड़ी समाज के लिए उनकी आवाज हमेशा बुलंद रही.

इन्द्र सिंह नयाल (1902-1984) का जन्म अल्मोड़ा जिले के बिसौद घाट गांव में हुआ. बालपन पहाड़ में बीता और आरंभिक शिक्षा अल्मोड़ा से आरम्भ हुई जो जन चेतना व संस्कृति के उन्नयन के केंद्र के रूप में विकसित हो चुका था. बालपन से ही अपने संगी साथियों से घुलमिल जाना और अपने आस-पड़ोस में हो रही गतिविधियों व गड़बड़ी के प्रति संवेदनशील रहना उनका स्वभाव बना. खोजबीन कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना और उस पर अडिग रह अपने साथियों की मदद से उसे पूरा करना उनकी आदत रही.

विज्ञान में स्नातक व एल एल बी की पढ़ाई उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की जो उस समय बौद्धिक चेतना का बड़ा केंद्र था. बुद्धिजीवी से ले कारोबारी व आम मजदूर तक देश में हो रही राजनीतिक उथल पुथल के प्रति जागरूक था और ब्रिटिश सरकार से प्रताड़ित भी. इस परिवेश से इन्द्र सिंह नयाल ने दो बातें सीखी. पहली तो यह कि शासन की कठोरता और गड़बड़ियों से आम जनता जो कष्ट व तिरस्कार भोग रही है उसका समाधान करना और दूसरा आम आदमी के हित में कानून के अस्त्र का प्रयोग करना.1920 में ही उन्होंने इलाहाबाद में विदेशी आयातित वस्तुओं के बहिष्कार आंदोलन में भाग लिया और विदेशी कपड़ों का होलिका दहन कर तब से जीवन भर खादी के कपड़े पहने.

इन्द्र सिंह नयाल प्रबल इच्छा शक्ति से भरे दूसरों की मदद को तत्पर अपनी मिट्टी की कद्र करने वाले संघर्षशील व्यक्तित्व थे. वह सीधी सहज साफ बात करते थे. उनके कुछ आदर्श थे,मान्यताएं थीं जिन पर वह जीवन भर चले. उनका जीवन नैतिकता व सादगी के गुण लिए था. अन्याय सहना उनके स्वभाव में न था. जीवन भर भृष्टाचार के विरुद्ध उन्होंने अपनी आवाज उठाई. कानून के अपने विषद ज्ञान से दिख रही कुरीतियों और भ्रष्ट आचरण का विरोध किया. ब्रिटिश राज में स्वतंत्रता सेनानियों को हुए कारावास व दंड के मामलों की मुफ्त पैरवी की. समाज सुधार के लिए उन्होंने शिक्षा को सबसे बड़ी नेमत माना. उन्होंने न केवल स्कूली पढ़ाई के गुणात्मक विकास हेतु प्रबल प्रयास किए बल्कि काफी स्कूल भी खुलवाए. नेताओं की भावुकता भरी राजनीति से वह दूर रहे. उन्हें  संस्थागत सुधारों के द्वारा हुए विकास पर विश्वास था. उनका जीवन सामाजिक कार्यों, शिक्षा संस्थानों के प्रसार, आमजन की परेशानियों को दूर करने व जन संपर्क में बीता.वह उच्च स्तर के पेशेवर व समाज सेवा हेतु प्रतिबद्ध व्यक्तित्व थे जहाँ सेवा, न्याय व समाज सुधार की त्रिवेणी प्रवाहित होती थी.

इन्द्र सिंह नयाल ने व्यक्तिगत सफलता से अधिक सामाजिक उपयोगिता पर केंद्रित दिनचर्या अपनाई. वह गाँधी वादी विचारधारा की ओर झुके जबकि उस समय के अन्य नेता या तो समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे या वामपंथी विचारधारा की ओर झुके थे. उनके लिए गांधीवाद मात्र कोरी आस्था न था, यह तो उस समय-काल, शिक्षा, पेशा व स्थानीय समाज के कारकों का संगम था. उनके युवा काल की समय अवधि में महात्मा गाँधी भारतीय राजनीति के दिशा निर्देशक थे. 1920 के दशक में असहयोग आंदोलन, 1930 के दशक में सविनय अवज्ञा व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने राजनीति की भाषा बदल दी थी. अब कानूनी लड़ाई नैतिक जन संघर्ष में बदल गई थी. एक युवा संघर्षशील वकील बन कर नयाल इस नवीन राजनय से प्रभावित हुए. उन्होंने वकालत पढ़ी, उन्हें आभास हो गया कि ब्रिटिश कानून औपनिवेशिक सत्ता का औजार है एवम गांधीवाद अन्यायपूर्ण कानून का नैतिक प्रतिरोध. इस द्वन्द में उनके सामने यह विकल्प था कि या तो वह औपनिवेशिक कानून का पालन कर पेशेवर सफलता हासिल करें या गांधीवादी प्रतिरोध से सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन संभव बनाएं. उन्होंने दूसरा विकल्प चुना. वह मात्र वकील नहीं बल्कि “कार्यकर्त्ता वकील” बने जिसकी दृष्टि कानून के अभ्यास के साथ सामाजिक न्याय व मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहने की थी. वह मात्र आंदोलनकारी न थे. वकालत का पेशा, राजनीतिक समझ व गांधीवादी मूल्यों को मिला कर उन्होंने रचनात्मक सत्याग्रह का पथ चुना.

1919 में उन्होंने अल्मोड़ा से हाई स्कूल व 1921 में इंटरमीडिएट किया. फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1923 में बीएससी व 1926 में एलएलबी किया. इलाहाबाद रहते राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए किए जाने वाले संघर्ष में वह पूरी तरह संलग्न हो गए. विदेशी वस्त्र न पहनने की शपथ उन्होंने अठारह वर्ष की उम्र में ही ले ली थी जिसका जीवन भर निर्वाह किया. अल्मोड़ा लौटने पर स्वामी सत्यदेव का सानिध्य प्राप्त होने पर उनकी वैचारिक प्रखरता और निखरी व स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भागीदारी बढ़ती गई.

1929 में कुमाऊं में गाँधी जी के आगमन पर वह स्वागत समिति के कोषाध्यक्ष रहे.1930 में उन्होंने नमक सत्याग्रह में भाग लिया जिसमें उन्हें छह महीने की सजा हुई. 1932 में वह अल्मोड़ा में आयोजित कुमाऊं युवक सम्मेलन के अध्यक्ष बने. इसी वर्ष उच्यूर, सालम, विसोद क्षेत्र से जिला परिषद अल्मोड़ा के सदस्य बने. अल्मोड़ा में अस्पृश्यता उन्मूलन हेतु आयोजित कुमाऊं समाज सुधार सम्मेलन का सफल आयोजन करने में उनकी सार्थक भूमिका रही वह केवल वकील नहीं थे बल्कि स्वाधीनता संग्राम सेनानी, ग्रामीण विकास को प्रतिबद्ध व समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने में मनोयोग से जुटे व्यक्ति रहे.लोगों में उनकी छवि लेखक, समाजसेवी गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी व राजनेता की बनी. पहाड़ के जीवन को उन्होंने बालपन से देखा, युवा होने तक वह समझ गये कि जिस तरीके से नीतियाँ तय की जा रहीं हैं वह पहाड़ी व्यक्ति व उसके परिवार, समुदाय व समाज के लिए हितकारी नहीं.पहाड़ को वह स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था के रूप में देखना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने गांधीजी के दर्शन को अपनाया.

औपनिवेशिक सत्ता द्वारा संसाधनों के दोहन व लोगों पर कर व लगान बढ़ा किए जा रहे अन्याय की कसक उन्होंने महसूस की. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय नैनीताल के नौजवानों पर आरोपित राजद्रोह के मुक़दमों की उन्होंने मुफ्त पैरवी की, इस कारण उन्हें “आंदोलनकारी वकील” की संज्ञा दी गई. उस समय के अधिकांश वकील ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जाने वाले मुक़दमों की पैरवी से बचते थे पर उनकी सोच भिन्न थी. कानून को उन्होंने सत्ता का औजार नहीं बल्कि जनप्रतिरोध का माध्यम बनाया. वह ऐसे जननेता बने जिसके लिए न्याय व समाज सुधार ही जीवन था. अपने युवा काल में उन्होंने महात्मा गाँधी के द्वारा ब्रिटिश शासन के विरोध के अहिंसात्मक प्रयोग देखे.1916 में कुमाऊं परिषद की स्थापना में हरगोविंद पंत ने सराहनीय योगदान दिया. यह बाद में स्वाधीनता संग्राम का मुख्य मंच रहा जिसे कुमाऊँ कांग्रेस की रीढ़ माना गया. वह हरगोविंद पंत ही थे जिन्होंने पहाड़ों में ब्राह्मणों द्वारा हल न चलाने व ठुल धोती, पितली व नान धोती जैसे स्तरीकरण का विरोध स्वयं खेत में हल चला कर किया.

1920 के दशक में असहयोग आंदोलन हुआ. 1930 के दशक में सविनय अवज्ञा आंदोलन व 1942 के दौर में भारत छोड़ो आंदोलन ने राजनीति की भाषा बदल दी थी. उन्होंने भी नैतिक जनसंघर्ष के लिए कानूनी लड़ाई को अस्त्र के रूप में लिया. यह उनके समय, शिक्षा, व्यवसाय व क्षेत्रीय समाज के कारकों का परिणाम रहा. वकालत और गांधीवाद का एक स्वाभाविक संबंध भी रहा. ब्रिटिश कानून जहाँ औपनिवेशिक सत्ता का औजार था तो गांधीवाद अन्यायपूर्ण कानून का नैतिक प्रतिरोध. इस कारण औपनिवेशिक कानून के पालन से पेशेवर सफलता के सापेक्ष उन्होंने गाँधीवादी प्रतिरोध से सामाजिक राजनीतिक समस्याओं का हल निकालने का विकल्प चुना.

मूल चित्र से एआई द्वारा डिजिटल रूप से संवर्धित फोटो

कुमाऊं के समाज में पहले से ही शिक्षा की अभिरूचि थी. इससे जागरूकता बढ़ी. समाज सुधार की दृढ़ इच्छा व मध्य वर्ग में चेतना के लिए बद्री दत्त पांडे अख़बार को जनता के साथ संवाद का माध्यम बना चुके थे. तब गांधीवाद आकर्षक था क्योंकि यह हिंसा के बिना परिवर्तन की राह सुझाता था. ग्रामीण समाज से जुड़ता था तथा नैतिक वैधता प्रदान करता था. नयाल जब अपने वकालत के पेशे से संलग्न हुए तो उन्होंने पाया कि ग्रामीण समाज शोषित भी है और निर्धन भी. अधिकांश दशाओं में कानून भी उनके लिए सहायक नहीं होता क्योंकि उनकी ऐसी हैसियत नहीं होती कि अपने मामले को कोर्ट तक ले जाएं. वहां वकील की फीस, मामले का लम्बा खिंचना व सरकार के विरुद्ध जाने की चेष्टा आम जन को असहाय बना देती है. कई स्थितियों में कानून भी उन्हें न्याय नहीं देता. ऐसी स्थिति को देख गाँधी जी का यह वैचारिक आधार कि “अन्यायपूर्ण कानून का विरोध करना भी न्याय है”, उनकी सोच व पेशे के अनुरूप रहा जिसका उन्होंने हर परिस्थिति में पालन किया.

गाँधी जी देश के विकास की सोच को ग्राम स्वराज्य, कुटीर उद्योग व स्वावलम्बन का आधार देते थे. यह हिमालय की अर्थव्यवस्था के भी अनुकूल था जहाँ संसाधनों का सीमित प्रयोग, खेती की छोटी जोत और स्थानीय आंचलिक व्यवस्था की परंपराएं थीं. इसलिए अधिवक्ता नयाल के लिए गाँधी दर्शन केवल राजनीति नहीं बल्कि व्यवहारिक आर्थिक प्रारूप बना. उन्होंने गाँधी की विचारधारा में सेवा, त्याग और नैतिकता का समन्वय पाया. गांधीवाद नैतिक व अहिंसक था ग्रामकेंद्रित व स्थानीय समाज से जुड़ा था जो कुमाऊं -गढ़वाल जैसे समाज के अनुकूल था. दूसरी तरफ वामपंथ वर्ग संघर्ष आधारित, औद्योगिक व वर्गीय तथा अधिक वैचारिक वैश्विक धरातल के अनुकूल था.

अधिवक्ता नयाल ने समाज सुधार का व्यावहारिक पक्ष चुना जो शिक्षा के स्तर के विस्तार, निर्धनों को मुफ्त कानूनी मदद व गांव वालों से जुड़ाव को महत्त्व देता था. गांधीवाद उनके समय की राजनीतिक चेतना, उनके पेशे की नैतिक चुनौती और उनके पहाड़ी समाज की सामाजिक -आर्थिक वास्तविकता का समुचित समन्वय बना. उनका गांधीवाद रोमांटिक आईडिया नहीं बल्कि हिमालय के लिए परिस्थिति आधारित आर्थिक तर्क था.नयाल पर गांधीजी का प्रभाव विचारधारा के प्रभाव से आया जिसे “अप्रत्यक्ष वैचारिक संचरण” कहा जा सकता है.

गांधीजी 1929 में कुमाऊं आए जहां कौसानी रह उन्होंने अनासक्ति योग की भूमिका लिखी. खादी वस्त्र, स्वदेशी ग्रामस्वराज व नैतिक राजनीति सत्याग्रह के साथ अहिंसा का सन्देश दिया जो जीवन पद्धति का प्रस्ताव था. अल्मोड़ा में बद्रीदत्त पांडे ने उनके विचारों को स्थानीय पत्रकारिता से प्रसारित किया. ऐसे लेख लिखे जिससे आमजन उनकी विचारधारा को समझें. कुमाऊं की समस्याऐं अपने अख़बार में निरन्तर छापीं. पहले से ही कुमाऊं परिषद व स्थानीय स्तर पर स्वदेशी का प्रयोग, शिक्षा का महत्त्व व सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के अभियान चलाए जा चुके थे इसलिए गांधीजी के विचार सामाजिक कार्यक्रम बनने लगे. 1930-40 के दशक में कुमाऊं में खादी पहनने के साथ शराबबंदी अभियान, शिक्षा प्रसार व छुआ छूत का विरोध तीव्र हुआ ऐसे में गांधीवाद आदर्श नहीं बल्कि दैनिक व्यवहार बन गया. शिक्षा प्राप्त कर वकालत में आने पर नयाल ने गांधीजी के विचारों को समाज में घटित होते पाया. उन्होंने न्याय को नैतिक रूप से देखा. स्वाधीनता सैनानियों पर लगे राज द्रोह के मामलों की पैरवी की. उसके बाद कुमाऊं में स्कूलों के विस्तार, सामाजिक सुधार व ग्रामकेंद्रित सोच में उन्होंने स्थानीय विकास व स्वावलम्बन पर जोर दिया.पहाड़ में गांधीजी जैसे राष्ट्रीय नेता, बद्रीदत्त पांडे जैसे पत्रकार, सामाजिक संस्थाओं की निरंतर कार्य शीलता व नयाल जैसे वकीलों की एक बौद्धिक श्रृंखला तैयार हुई जो “अप्रत्यक्ष विचारधारा हस्तान्तरण” थी.

गांधीजी ने माना कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का आधार है. स्वावलम्बन हिमालयी विकास के वैकल्पिक प्रारूप का बीज बन सकता है जो प्रकृति, समुदाय व आजीविका के संतुलन का आधार पाता है.गांधीजी के कुमाऊं दौरे के बाद खादी, स्वदेशी व आश्रम आधारित गतिविधियां तेजी से फैली. पच्चिस से अधिक स्थानों में गाँधी आश्रम व कुटीर स्थापित हुए. गांधीजी के विचार गांव की राजनीति का आदर्श पक्ष बनने लगे. चनौदा का खादी आश्रम 1930 के दशक में विकसित हुआ. स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा विकसित ग्रामीण संगठनात्मक इकाईयां भी फैलने लगीं. गांधीवाद बड़े आश्रमों तक सीमित न रह गांव – गांव में आम जन तक पहुँचने लगा था. 1929 में जब गांधीजी कुमाऊं आए तो इंद्र सिंह नयाल स्वागत समिति के कोषाध्यक्ष रहे. उन्होंने गांधीजी की पूरी यात्रा के प्रबंध का कुशलता से निर्वाह किया जिससे उनकी संगठनात्मक क्षमता पर लोगों का भरोसा बढ़ता गया.

नयाल जी 1932 में उच्यूर-सालम-विसौद क्षेत्र से जिला परिषद अल्मोड़ा के सदस्य रहे. 1935 में जिला परिषद के सदस्य रहे. स्वतंत्रता के बाद वह 1948 से 1952 तक नैनीताल जिला परिषद के अध्यक्ष रहे. इस अवधि में उन्होंने जिले में जूनियर हाईस्कूलों की संख्या 4 से बढ़ा कर 32 कर दी.1955 में खटीमा में थारू जनजाति के बच्चों के लिए हाई स्कूल की स्थापना की जिसके वह संस्थापक रहे. जिला भ्रष्टाचार विरोधी समिति के अध्यक्ष रहे. 1962 के बाद वह सामाजिक कार्यों में व्यस्त हो चले. 1952 से वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे,तब उन्हें स्पष्ट हुआ कि पहाड़ की समस्याएं तो अलग हैं पर नीतियाँ मैदानों के अनुसार बन रही हैं.उनका यही अनुभव बाद में प्रथक राज्य की सोच का आधार बना. यहाँ उनकी भूमिका प्रत्यक्ष आंदोलनकारी की कम और “वैचारिक प्रारंभिक” की अधिक रही.

अपनी पुस्तक “स्वतंत्रता संग्राम में कुमाऊं का योगदान” में उन्होंने ऐसे कई क्रांतिकारियों का परिचय दिया जिन्होंने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी. ऐसे विशेष क्रांतिकारियों में कालू सिंह मेहरा थे जिन्हें उत्तराखंड का प्रथम स्वाधीनता सेनानी कहा जाता है. 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने काली कुमाऊं में अंग्रेजों की दमनकारी नीति का प्रबल विरोध किया. क्रांतिवीर नाम का एक गुप्त संगठन बना जिसने ब्रिटिश ठिकानों पर हमले किए.

1930 में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने निहत्थे पठान प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से साफ इंकार कर दिया. नयाल जी ने अपनी पुस्तक में उत्तराखंड की पहली महिला स्वाधीनता संग्राम सेनानी बिशनी देवी साह का इतिवृत लिखा जिन्होने जंगलों में जा व सार्वजनिक स्थानों में तिरंगा फहरा कर ब्रिटिश अधिकारियो को चुनौती दी व औरतों को आंदोलन से जोड़ा. इसी प्रकार हरिप्रसाद टम्टा शिल्पकार आंदोलन व दलितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले थे. नयाल जी की पुस्तक में उनका योगदान रेखांकित है जिसमें उन्होने लिखा कि टम्टा जी ने कैसे समाज के वंचित वर्गों को मुख्य धारा की राजनीति से जोड़ा.इस पुस्तक से नयाल जी की राष्ट्र वादी सोच व अपने इलाके के प्रति भावनात्मक स्पर्श का अनुभव होता है.

उन्नीसवी सदी के उत्तरार्ध से ही यह बहस आरम्भ हो गई थी कि हिमालय की समस्याएं मैदानों से भिन्न हैं. इसे गजेटियर, कुमाऊं परिषद जैसे स्थानीय संगठनों के बनने व गढ़वाल-कुमाऊं के बुद्धिजीवीयों, पत्रकारों व वकीलों का समर्थन मिला. इस वातावरण में इंद्र सिंह नयाल अपने विद्यार्थी जीवन से ही अनुभव करने लगे थे कि पहाड़ की आर्थिक सामाजिक संरचना, भूमि व्यवस्था, वन अधिकार व भौगोलिक दुरूहता ऐसी हैं जिसे मैदान केंद्रित प्रशासन समझ ही नहीं सकता.

1916 से “कुमाऊं परिषद” पहाड़ वासियों का मुख्य राजनीतिक सामाजिक व सांस्कृतिक मंच बन चुकी थी. इससे जुड़ कर नयाल जी ने सबसे पहले तो कानूनी ढांचे से पहाड़ की समस्याओं का समाधान पाना चाहा. ब्रिटिश प्रशासन के सम्मुख उन्होंने तर्क रखा कि पहाड़ की खसरा -खतौनी व बंदोबस्त जैसी भूमिव्यवस्था मैदान से भिन्न है. दूसरा वन कानूनों ने गांव वालों की रोजी रोटी और दिनचर्या पर विपरीत प्रभाव डाला है. सुदूर गाँवों से प्रशासनिक दूरी बनी रहती है. यातायात के साधन सीमित हैं. इसलिए अलग प्रशासनिक इकाई का विचार प्रस्तुत कर उन्होंने स्पष्ट कहा कि कुमाऊं गढ़वाल को संयुक्त प्रान्त से भिन्न प्रशासनिक ढांचे में रखा जाए. स्थानीय अधिकारियों को अधिक प्रशासनिक अधिकार दिए जाएँ. सबसे जरुरी तो यह है कि पर्वतीय क्षेत्र के लिए अलग नीति बने. यही विचार आगे चल कर प्रथक राज्य की वैचारिक नींव बना. उन्होंने वकालत व सार्वजनिक जीवन के माध्यम से शिक्षित वर्ग, स्थानीय नेताओं व सामाजिक जिम्मेदारी समझने वाले लोगों से स्पष्ट कहा कि पहाड़ की समस्याएं प्रशासनिक है इसे मात्र प्रशासनिक उपेक्षा कहना समस्या का एकपक्षीय चित्रण है.

पहाड़ी राज्य की वैचारिक नींव रखते उनके तर्क तीन मुख्य पक्षों, भौगोलिक विशिष्टता या पहाड़ के भूगोल, संसाधन बनाम स्थानीय हित अर्थात जल -जंगल और जमीन जैसे संसाधनों पर वाहय नियंत्रण और प्रशासनिक विकेंन्द्रीकरण पर आधारित रहे जिनका हल केवल तब संभव होता जब स्थानीय समस्याओं का निराकरण स्थानीय ढांचे के आधार पर हो.

1932 में कुमाऊं युवा सम्मेलन के अध्यक्ष रहते वैचारिक रूप से वह पहाड़ की उन्नति की स्पष्ट रुपरेखा बना चुके थे. यह समय अवधि 1930-32 के नमक सत्याग्रह के बाद की थी. गांधीजी को जेल हो गई थी और देश भर में युवा शक्ति को संगठित करने का अभियान चल रहा था. कुमाऊं में भी ऐसे ही सबल संगठन कर्ता की जरुरत थी. 1932 में युवा सम्मेलन के अध्यक्ष निर्वाचित होते ही उन्होंने कुमाऊं के युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना आरम्भ किया. गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों को गांव- गांव पहुँचाया. तीस वर्ष के इस वकील के आह्वान पर अल्मोड़ा के सुदूर इलाकों बिसोद, सालम, उच्यूर के साथ गाँव -गांव के नौजवान युवा कांग्रेस और सेवा दल से जुड़ते चले गये. 

कुमाऊं युवा सम्मेलन 1932 का आयोजन तब हुआ जब नमक सत्याग्रह समाप्त हो चुका था, गाँधी-इरविन समझौता टूट चुका था. जनवरी 1932 में गांधीजी फिर गिरफ्तार हो चुके थे. अंग्रेजों ने कांग्रेस को गैरकानूनी घोषित कर दिया था. इन परिस्थितियों में अल्मोड़ा में कुमाऊं युवक सम्मेलन आहूत किया गया जिसका उद्देश्य था प्रतिबन्ध के बावजूद नौजवानों को संगठित करना और इसके साथ ही स्वदेशी, खादी,शराबबंदी जैसे रचनात्मक काम जारी रखना. यह अंग्रेजों के दमन के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध की नीति थी. 30 वर्षीय युवा वकील इन्द्र सिंह नयाल को इसका अध्यक्ष चुना गया. इनका एल एल बी होना तथा इलाहाबाद से शिक्षित होना युवाओं के लिए प्रबल आकर्षण था. सम्मलेन की अध्यक्षता करना ही सरकार ने अपराध माना. उन पर पुलिस निगरानी बढ़ी. सम्मेलन के बाद अध्यक्ष होने के नाते वह सी आई डी की सूची में आ गये. हर सभा के बोल वचन पर रपट बन शासन को भेजी जाने लगी. 1932 से 1934 की अवधि में दमन के केस बहुत अधिक बढ़ गये. सम्मलेन में भाग लेने वाले कई युवा बाद तक धारा 144 तोड़ने, तहसील पर तिरंगा फहराने, प्रभात फेरी निकालने पर गिरफ्तार कर लिए गये. धारा 124 ए लगी.नयाल जी ने इनकी पैरवी की. सम्मलेन में सहभागिता करने वाले युवा ही 10 वर्ष बाद 1942 में “भारत छोड़ो आंदोलन” में तोड़फोड़ करने वाले विध्वंसकारी बने जिन पर राजद्रोह का मुकदमा चला. राजद्रोह के आरोपी का बचाव करने वाले वकील का लाइसेंस रद्द हो सकता था, पर नयाल डटे रहे. कुमाऊं युवा सम्मेलन 1932 ने नौजवानों की ऐसी पीढ़ी तैयार हुई जिसे नयाल जी ने 1942 में कानूनी ढाल दी. उनका मंतव्य था कि पहले युवाओं को जगाओ, यदि देश हित में वह जेल जाएं तो उन्हें बचाओ और स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात उनके बेहतर भविष्य के लिए शिक्षा संस्थाओं का विस्तार करो.

अगस्त-सितंबर 1942 में सरकार के विरुद्ध जो गतिविधियां हुईं जिनमें नवयुवकों पर राजद्रोह का मुकदमा चला वह निम्न थीं :

हल्द्वानी-काठगोदाम रेल लाइन की पटरी उखाड़ना, स्लीपर जलाना जिन पर दस वर्ष की सजा हो सकती थी.1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में पहाड़ के युवक जोश से भर आगे आए. 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के आरम्भ से नैनीताल, हल्द्वानी, रामनगर के साथ अन्य कई कसबों से आए युवा छात्रों ने रेल पटरियां उखाड़ डाली. टेलीफोन की लाइन काट दीं और सरकारी दफ़्तरों में प्रदर्शन किया. यह ब्रिटिश हुकूमत की नजर में विध्वंसात्मक अपराध थे अतः इन युवकों पर राजद्रोह अर्थात सेक्शन 124 A के अंतर्गत मुक़दमे चले. राजद्रोह में उम्र कैद तक की सजा थी. 

नैनीताल तहसील, कलेक्टर के ऑफिस में तिरंगा लहराना, अंग्रेजो भारत छोड़ो के नारे लगाना, सरकारी काम में बाधा खड़ी करना जिन सबमें 3 से 7 साल का सश्रम कारावास होता.

रामनगर – काशीपुर के बीच टेलीग्राफ के तार काटना, डाकघर पर धरना देना जिस पर आरोप साबित होने पर 5 साल की सजा.

भवाली, गरम पानी के सरकारी स्कूलों का बहिष्कार, छात्रों को भड़का कर हड़ताल पर 6 माह से 2 वर्ष की जेल.

इन्द्र सिंह नयाल ने ऐसे प्रकरणों में निशुल्क पैरवी की. उस समय राजद्रोह के आरोपी का केस लड़ना स्वयं को अंग्रेजों की नजर में देशद्रोही का साथी घोषित करना था. कई वकील इसी भय से ऐसे केस नहीं लेते थे पर नयाल का दृष्टिकोण मात्र कानूनी सहायता प्रदान करना नहीं था. वह तो नौजवानों को संदेश देना चाहते थे कि आंदोलन में आगे बढ़ो, कानूनी मदद मैं करूँगा. उन्होंने अपने पेशे को कमाई का स्त्रोत नहीं देश के लिए अस्त्र बनाया. 1930 में स्वयं जेल गये तो 1942 में युवाओं को जेल जाने से बचाया. हिंसक गतिविधि करने वालों का भी बचाव किया क्योंकि वह गांधीजी की इस सोच को पूरी तरह मानते थे कि वकील का धर्म है सबको न्याय दिलाना.

ऐसे मामलों की पैरवी करते नयाल जी ने उनके वकील की जिम्मेदारी ली और ज्यादातर मामले सजा कम करने व जुर्माने पर छुड़ा लेने में वह सफल रहे. इन्द्र सिंह नयाल ने उत्तराखंड के इतिहास व स्वाधीनता आंदोलन के दस्तावेजों को सहेजा. 1857 से 1947 तक कुमाऊं में हुए आंदोलनों, मुख्य घटनाओं, नेतृत्व करने वाले क्रांतिकारियों का विवरण अपनी पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम में कुमाऊं का योगदान पर दिया. उन्होंने क्षेत्रीय विसंगतियों, सामाजिक कुरीतियों व किए गये सुधारों पर लेख लिखे जो समकालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए. उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पैन और पैर दोनों का बखूबी इस्तेमाल किया अर्थात इतिहास भी लिखा और जमीन में उतर कर संघर्ष भी किया. अपनी पुस्तक में उन्होंने ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया जहाँ कानून और सक्रियता के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी गई थी. इसमें सल्ट का बारदोली कांड जिसे सल्ट की क्रांति कहा गया महत्वपूर्ण थी.

विधान परिषद के सदस्य के रूप में इन्द्र सिंह नयाल ने किसानों के अधिकारों के लिए लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी व जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण के विरुद्ध अदालतों में पैरवी की.उन्होंने कुमाऊं की नायक जाति की व्यथा जो विशेष रूप से बालिकाओं से जुड़ी थी की कुप्रथाओं के विरुद्ध सामाजिक सुधार की मुहिम चलाई. इसके लिए विशेष कानून बनाने पर जोर दिया. 1954 में तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत से पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक अलग योजना व पहचान की मांग रखी, तब वह उत्तरप्रदेश विधान परिषद के सदस्य थे.

इंद्र सिंह नयाल का वैचारिक आधार कुमाऊं की सामाजिक संरचना, औपनिवेशिक अन्याय के अनुभव व गांधीवाद से प्रभावित रहा. वह ग्रामीण विकास के समर्थक थे. समाज में व्याप्त कुरीतियों के बुरे प्रभावों से आम जन को परिचित करा उन्होंने सुधारवादी दृष्टिकोण से संरचनात्मक परिवर्तन की आस जगाई. औपनिवेशिक नीतियों का विरोध कर उन्होंने स्वाधीनता के हर संभव प्रयास को अपने कानून के ज्ञान से पुष्ट किया. आंदोलनों में सम्मिलित रहे और आंदोलनकारियों पर लगे आरोपों पर चल रहे मुक़दमों की मुफ्त पैरवी की, इस कारण उन्हें “आंदोलनकारी वकील” कहा गया. कानून को उन्होंने सत्ता का औजार नहीं बल्कि जनप्रतिरोध का माध्यम बनाया.

प्रथक पहाड़ी राज्य की अवधारणा में उनकी भूमिका प्रत्यक्ष आंदोलनकारी की कम व वैचारिक प्रारंभिक अधिक रही. उनका मानना था कि राज्य निर्माण का आधार मानव पूंजी है न कि केवल राजनीति. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में वह कुटीर उद्योग व स्थानीय संसाधनों के उपयोग को बेहतर व कारगर तरीका समझते थे जो गाँधीवादी स्वावलम्बन मॉडल का समर्थन था. यह विचार तदन्तर विकसित हुए और हिमालयी विकास प्रारूप में प्रमुखता से उभरे.

इन्द्र सिंह नयाल ने अपने जीवन में जो सृजनात्मक कार्य किए उनके पीछे उनका वकालत का अनुभव था जिससे उन्होंने स्वाधीनता संग्राम सेनानियों की पैरवी की. प्रशासनिक अन्याय के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाई. दूसरी ओर उनका संस्थागत संघर्ष था जिसमें 1948 से 1952 के मध्य जिला परिषद अध्यक्ष व विधान परिषद का सदस्य रहते उन्होंने सत्ता व शासन प्रणाली की कमियों के निराकरण पर जोर दिया. तीसरा पक्ष शिक्षा के विस्तार, अस्पृश्यता का उन्मूलन व ग्रामीण सुधार के प्रति संवेदनशील रह उन्होंने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया.आजादी से पहले औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ, तो आजादी के बाद संरचनात्मक परिवर्तन के जिस आंदोलन का उन्होंने पथ प्रशस्त किया वह राजनीतिक से अधिक सामाजिक आर्थिक पक्ष से संबंधित रहा. अपनी पुस्तक में उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में पहाड़ के सक्रिय योगदान का वर्णन किया. स्थानीय विकास की समस्याओं पर उनके विचार उनके भाषणों व विधान परिषद में दिए वक्तव्यों के साथ पत्र पत्रिकाओं में छपते रहे जिनका सम्बन्ध मुख्यतः ग्राम आधारित विकास की गांधीवादी अर्थव्यवस्था, पहाड़ के लिए अलग प्रशासन, स्थानीय स्वशासन व भ्रष्टाचार विरोध की नैतिक राजनीति से प्रकट हुआ.

उत्तराखंड आंदोलन में उन्होंने प्रारंभिक वैचारिक आधार दिया. वह स्वयं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे व स्वतंत्रता मिलने के बाद अपने पहाड़ी समाज की सामाजिक गतिशीलता व राजनीतिक जागरूकता के प्रति मनोयोग से लगे रहे. कमी यह रह गई कि उनका कार्य व्यवस्थित रूप से संकलित नहीं हो पाया और न ही वह बड़े स्तर पर कोई आंदोलन खड़ा कर पाए उनका प्रभाव अधिकांशत: कुमाऊं क्षेत्र तक सीमित रहा. वह उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रत्यक्ष नेता नहीं बल्कि प्रथक राज्य की अवधारणा के जनक रहे. अपनी वकालत की जानकारी को उन्होंने सामाजिक न्याय का माध्यम बनाया. प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की प्रारंभिक सोच व समझ विकसित की.शिक्षा व ग्राम्य विकास को प्राथमिकता दी.

इन्द्र सिंह नयाल ने पहाड़ के विकास की केंद्रीय प्राथमिकता ग्रामीण स्वराज व सामाजिक सुधार निर्दिष्ट की, प्रथक पहाड़ी राज्य की अवधारणा द्वितीयक थी. इस सोच के परिणाम स्वरूप वह ग्रामीण आत्मनिर्भरता को आधार भूत मानते थे. इस प्रकार विकेंद्रित नीति, नैतिक राजनीति व स्वावलम्बी गांव उनका आदर्श थे तो सामाजिक कुरीतियों का निराकरण, छुआ छूत विरोध और शराब बंदी उनका व्यावहारिक लक्ष्य रहा.उनका मानना था कि अनुकूलतम सामाजिक उपयोगिता तब प्राप्त होगी जब शिक्षा को उच्च प्रतिमान मिले. गाँधी जी के प्रभाव से उनकी सोच स्पष्ट हुई कि समाज सुधार के बिना राजनीतिक बदलाव अधूरा है. मात्र सत्ता परिवर्तन पर्याप्त नहीं असली लक्ष्य तो समाज और गांव का पुनर्निमाण है.नयाल के कार्यों में शिक्षा संस्थानों का विस्तार, ग्रामीण समाज से सीधे जुड़ाव व सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लड़ना रहा जो स्पष्ट करता है कि वह समाज बदलने को राज्य बनाने से अधिक वरीयता देते थे. पृथक राज्य की अवधारणा उनका आरंभिक लक्ष्य नहीं था. यह तब विकसित हुआ जब उन्होंने पाया कि पहाड़ की समस्याएं भिन्न हैं. प्रशासन मैदानी दृष्टिकोण से चलता है तब उनकी यह सोच बनी कि यदि ग्रामीण स्वराज्य चाहिये तो अलग प्रशासनिक ढांचा आवश्यक है.

नयाल की प्राथमिकताओं में समाज सुधार केंद्र में था जिसकी दृष्टि गांधीवादी थी व जो विकेन्द्रीकरण या नीचे से नियोजन  की बात करता था. बाद में पहाड़ के समुचित विकास के लिए राज्य निर्माण का पक्ष मजबूत हुआ जो राजनीतिक मांग थी व जिसमें प्रशासनिक अलगाव की बात उठाई गई.वस्तुतः नयाल राज्य वादी नहीं सामाजिक पुर्नर्निमाण की सोच के थे. उनके लिए राज्य केवल सत्ता प्राप्ति नहीं बल्कि एक साधन था जिसमें स्थानीय शासन, ग्रामीण विकास व सामाजिक सुधार महत्वपूर्ण थे. इस प्रकार नयाल के लिए अलग राज्य लक्ष्य नहीं बल्कि साधन था. वास्तव में वह गांधीवादी आदर्शो पर आधारित एक न्याय पूर्ण, स्वावलम्बी व कुरीतियों से मुक्त समाज की रुपरेखा चाहते थे.उन्होंने कहा पहले समाज बदलो राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा. उनकी सोच में राज्य समाज का साधन था जबकि बाद के आंदोलन में राज्य ही लक्ष्य बन गया. विकेंद्रीयकरण, स्थानीय उत्पादन व बाजार की उपलब्धता -यह आज की व्यवहारिक रूप रेखा है. यदि गांव में शक्ति, उत्पाद के मूल्य और बाजार की पूर्णताएं हों तो यही वह संयोजन है जिससे इन्द्र सिंह नयाल की सोच पहाड़ की धरती पर उतारी जा सकती है.

(जारी)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

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