150 साल पुराना अल्मोड़ा
दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है. (Smriti Yatra Poem by Sindhuja)
शायद हर पीढ़ी, नई पीढ़ी से यही कहती है.
हमारे जमाने के रिवाज, फ़िल्में, पहनावा
वगैरह-वगैरह.
पर सचमुच पहाड़ों में एक ठहराव
अभी भी मिलता है.
बदला तो बहुत कुछ है.
बड़ी इमारतों से पटी मॉल रोड में
मुझे घुटन होती है.
शहर बदल गया है.
पुराने पशु चिकित्सालय की जगह अभी
एक नई बिल्डिंग है, हम उसे
हेमा मौसी के ससुराल वाली
जगह के नाम से जानते थे.
बगल में एक बंगला है, जहाँ
रोजगार (अभियोजन) का ऑफिस हुआ करता था
और नीचे के फ्लोर पर एक सुन्दर सा घर,
जहाँ अंग्रेजी सीखने के लिए बच्चे जाया करते थे.
अब वहां एक हेरिटेज होटल है.
रघुनाथ माल की जगह भी
देवदार से ढका एक पुराना बंगला था.
बदलते समाज और अर्थव्यवस्था में ये बहस सही है ये गलत, ये मैं पाठकों पर छोड़ देना बेहतर बेहतर समझती हूँ.
मेरी दिलचस्पी पुरानी कहानी
सुनाने में है.
ये मानना अविश्वसनीय लगता है,
पर पाँचवीं कक्षा में,
मैं हर सुबह
ऑफिसर्स कॉलोनी से नीचे उतर कर्बला होते हुए चौघानबाटा से हुक्का क्लब की गली से घर वापस जाया करती.
बड़ा गर्व होता है अब भी.
तब मैराथन का नाम तो नहीं सुना था.
पर औसतन पहाड़ी अपने कई किलोमीटर पैदल
चलने के किस्से गर्व से सुना सकता.
इंसान की क्षमता असीमित है.
मुझे लगता है अति सुविधा व्यक्ति की क्षमता दबा देती है.
शायद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कुटज की प्रशंसा बढ़-चढ़
कर इसीलिए की है.
मेरे लिए कुटज, प्रत्येक पहाड़ी
व्यक्ति है जो दुरूहता में भी
प्रतिभा को विकसित कर लेता है,
स्वप्न पाल भी लेता है और
यत्न भी करता है.
अंधेरी गलियों में टॉर्च ले कर
ट्यूशन के लिए भागना.
समाज की स्क्रूटनी, परीक्षा की
स्क्रूटनी को हर्डल रेस की तरह पार कर आगे
बढ़ते जाना.
जीवन दुरूह था, साधन सीमित
और एक छोटा सा घर.
पीछे मुड़ कर देखने पर
अपनी पीठ थपथपाने का
मन करता है.
पर उन सबके बीच साहस और
जिजीविषा के स्रोत थे,
ऊँचे-ऊँचे हिमाच्छादित
पहाड़, जिसे एकटक देखने से
इच्छा शक्ति मजबूत होती थी.
मैं अक्सर सुबह ट्यूशन से
आते वक्त रोड के किनारे
रुक कर एकटक हिमाच्छादित पर्वत
देखती थी.
मेरे स्कूल के हर
परिणाम के बाद देवदार के
पेड़ों को देखकर कृतज्ञता होती है.
उसने मुझे संघर्ष के
हर पड़ाव पर सांत्वना दी.
और मुझे विनम्रता सिखाई.
जीवन के उत्सव, शोक, सुख ,दुख को मैंने
छोटे-छोटे क़दमों से पैदल चलकर उदासीन किया.
मेरे पिताजी हमेशा कहते है,
“सुख दुखे समे कृत्वा”
कितने सावन बीते,
पर पिताजी की वह बात और उन दिनों की स्मृति
आज भी जीवंत है. (Smriti Yatra Poem by Sindhuja)
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तपोवन, देहरादून की रहने वाली सिंधुजा चौधरी कर्नाटक इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन से बी-टेक हैं. सिंधुजा ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ ट्वेंटे, नीदरलैंड से जियो इंफ़ॉर्मैटिक्स में मास्टर्स डिप्लोमा किया है. साहित्यिक अध्ययन, लेखन में विशेष रुचि रखती हैं.
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