200 साल पहले कैसा था उत्तराखंड

‘ट्रैवल्स इन द हिमालयन प्रोविन्सेज़ ऑफ़ हिंदुस्तान एंड द पंजाब’ उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक हिमालयी समाज, भूगोल और राजनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ है. इसके लेखक विलियम मूरक्रॉफ्ट और जॉर्ज ट्रेबेक, ईस्ट इंडिया कंपनी से संबद्ध यात्री और अन्वेषक थे, जिन्होंने 1819 से 1825 के बीच हिमालय, गढ़वाल, कुमाऊँ, लद्दाख, कश्मीर और मध्य एशिया के अनेक क्षेत्रों की यात्राएँ कीं. यह पुस्तक उनके निधन के बाद 1841 में प्रकाशित हुई; इसका संपादन एच. एच. विल्सन ने किया.

इस यात्रा-वृत्तांत में तत्कालीन पर्वतीय समाज की आर्थिक स्थिति, कृषि, व्यापार, धार्मिक आचार, लोक-विश्वास, राजनीतिक परिवर्तन और प्राकृतिक परिस्थितियों का सूक्ष्म विवरण मिलता है. गढ़वाल के संदर्भ में यह पुस्तक विशेष महत्व रखती है; क्योंकि इसमें गोरखा शासन के प्रभाव, जनसंख्या में गिरावट, खेती का स्वरूप, स्थानीय शासकों की स्थिति और ब्रिटिश प्रशासन की भूमिका का प्रत्यक्ष वर्णन मिलता है. श्रीनगर गढ़वाल, अलकनंदा घाटी, टिहरी क्षेत्र और दून घाटी के विवरण आज भी ऐतिहासिक स्रोत के रूप में उपयोगी हैं.

मूरक्रॉफ्ट का दृष्टिकोण एक औपनिवेशिक अधिकारी का अवश्य है; फिर भी उनके विवरण में प्रेक्षण की स्पष्टता और तथ्यात्मकता दिखाई देती है. इस पुस्तक के माध्यम से उत्तराखंड के सामाजिक इतिहास, यातायात मार्गों और सांस्कृतिक जीवन को उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल में समझा जा सकता है; इसलिए यह ग्रंथ इतिहास, भूगोल और मानवशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विश्वसनीय आधार प्रदान करता है.

चैप्टर-1

जोशीमठ में विलंब; श्रीनगर की यात्रा; अलकनंदा में ट्राउट; स्वर्ण-कण; नदी पर झूला; पर्वतीय यात्राओं में घोड़ों का उपयोग; टिहरी; विरल जनसंख्या; राजा सुदर्शन शाह; बरात की प्रथा; बाघ-फंदा; भेड़िये; नलापानी; कालंगा; देहरा; यमुना पार कर सिरमौर में प्रवेश; कारदा दून; मार्कंडा नदी; नाहन; सिख प्रदेश; रायपुर; मधुमक्खियाँ; पिंजौर; घिरा हुआ उद्यान; हिन्दूर; पर्वतों की पुनः चढ़ाई; मलाऊँ; कहलूर; बिलासपुर; उसकी राजधानी; चमड़ी की नौकाओं पर सतलुज पार करने की विधि; सुकेत घाटी; मंडी का राज्य; सिख हस्तक्षेप से यात्रा की प्रगति में बाधा; लाहौर के लिए प्रस्थान.

हिमालय पार करने की अपनी यात्रा की प्रारम्भिक तैयारियाँ पूरी हो जाने पर, मैं अक्टूबर 1819 के अंत में बरेली से चला. मेरे दल के प्रमुख व्यक्ति श्री जॉर्ज ट्रेबेक थे, जो एक पुराने मित्र के पुत्र थे; उन्होंने स्वयं मेरे साथ चलने की इच्छा प्रकट की थी और विशेषतः चित्रकार तथा सर्वेक्षक के रूप में जो भी सेवा संभव हो, करने को तत्पर थे; श्री गथरी, जो भारत में ही जन्मे व्यक्ति थे और कंपनी की चिकित्सीय सेवा से जुड़े थे; मीर इज़्ज़त उल्लाह, प्रतिभा और सूचना-सम्पन्न एक स्थानीय सज्जन, जो कुछ वर्ष पूर्व उसी मार्ग से जा चुके थे जिस पर मैं जाने का विचार कर रहा था; तथा गुलाम हैदर ख़ान, बरेली के निवासी, एक सुदृढ़ सिपाही और विश्वसनीय सेवक. मुझे आशा थी कि मेरे साथ एक ऐसे सज्जन भी होंगे जो भूविज्ञान और खनिजविज्ञान में प्रतिष्ठित थे; वे यात्रा के आरम्भ में हमसे जुड़े भी; किंतु स्थानीय लोगों के प्रति उनका व्यवहार इतना आपत्तिजनक था कि मुझे बहुत प्रारम्भिक चरण में ही उनकी सहायता छोड़नी पड़ी.

अपने निजी सामान के अतिरिक्त, मेरे साथ अंग्रेज़ी सामान की भी एक बड़ी मात्रा थी; मुख्यतः सूती कपड़े, ब्रॉडक्लॉथ और हार्डवेयर; जिनका मूल्य तीन से चार हज़ार पाउंड के बीच था; और जो अधिकांशतः मेसर्स पामर एंड कंपनी तथा मैकिलॉप एंड कंपनी, कलकत्ता, की थीं; जिन्होंने एशिया वालों के दिल में ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं की माँग पैदा होने की आशा में, यह जोखिम उठाने पर सहमति दी थी. हमारे भारी पैकेजों के परिवहन के लिए, पहाड़ों की शुरुवात तक, सरकारी हाथियों और ऊँटों की व्यवस्था मेरे लिए की गई थी. पर्वतों के भीतर, वस्तुएँ मुख्यतः कुलियों द्वारा ढोई गईं; जिनकी व्यवस्था में कुमाऊँ के आयुक्त श्री ट्रेल ने अपनी क्षमता के अनुसार मुझे हर प्रकार की सुविधा प्रदान की. यहाँ हमने अपने दल में बारह गोरखा सिपाहियों का एक अंगरक्षक दल भी जोड़ा. इन सबका सारा खर्च मेरे ऊपर था.

मेरा उद्देश्य, सर्दियों की बर्फबारी से रास्ता (दर्रा) बंद होने से पहले ही नीती दर्रे से हिमालय पार करने का था. वस्तुओं के आगमन में विलंब के कारण हमारी यात्रा अपेक्षा से कुछ देर से आरम्भ हुई; फिर भी हमारे पास पर्याप्त समय था. अल्मोड़ा पहुँचने पर, स्थानीय एजेंट ने, जिसे सामान ढोने के लिए कुली और पशु उपलब्ध कराने का दायित्व दिया गया था, हमें आश्वस्त किया कि जोशीमठ पहुँचने तक सब कुछ तैयार रहेगा. हम 17 दिसंबर को वहाँ पहुँचे; और जब तक यह घोषणा हुई कि घाट अब पार करने लायक नहीं रहा, तब तक हमें पर्याप्त संख्या में न तो कुली मिले और न ही याक. निस्संदेह परिवहन-साधन जुटाना कठिन था; और यह खेदजनक था कि हम कम से कम पखवाड़ा भर पहले, जोशीमठ नहीं पहुँचे. फिर भी, जिम्मेदार व्यक्तियों में अधिक तत्परता और कम लालच होता, तो सम्भवतः हमारा पारगमन सुनिश्चित हो जाता; क्योंकि प्रतीक्षा के दौरान भोटिया दल दर्रे से नीचे आते रहे; और 21 दिसंबर तक भी हुनियाओं का एक समूह उसी दर्रे से अपने देश लौट गया था.

यह जानते हुए कि समय नष्ट नहीं किया जा सकता, मैंने प्रस्ताव रखा कि सामान छोड़ दिया जाए और कुछ अनुयायियों के साथ दर्रा पार करने का प्रयास किया जाए. परन्तु मार्गदर्शकों ने साथ चलने से इंकार कर दिया; उन्होंने न केवल भीषण शीत और गहरी बर्फ़ से, बल्कि शीत ऋतु में हिमालय की खाइयों में प्रचलित उग्र बवंडरों से होने वाले भयानक संकट का तर्क दिया. अतः इस योजना का त्याग करना आवश्यक हो गया; और या तो अगली ग्रीष्म ऋतु तक वहीं ठहरना था, या लद्दाख की यात्रा के लिए कोई अलग मार्ग अपनाना था.

मैंने नीती दर्रे को सबसे सीधा और व्यवहार्य मार्ग मानकर चुना था; क्योंकि इससे हुनिया और ल्हासा के लोगों से वाणिज्यिक संबंध स्थापित करने का अवसर मिलता; और लद्दाख की दिशा को मेरी पूर्व यात्रा, घेरटोप, से जोड़ने की सुविधा होती. परन्तु जोशीमठ में ठहरने से होने वाली समय-हानि पर विचार कर, मैंने राजा रणजीत सिंह की सहमति प्राप्त करने का प्रयास करने का निश्चय किया कि मैं कुल्लू मार्ग से आगे बढ़ूँ; और इसी उद्देश्य से अपना शिविर श्रीनगर ले गया.

श्रीनगर नगर, जो गढ़वाल की प्राचीन राजधानी है, अलकनंदा नदी के बाएँ तट पर स्थित है. कैप्टन हार्डविक के आगमन के समय की तुलना में इसका बहुत पतन हो चुका था. प्रांत 1803 में गोरखों द्वारा जीत लिया गया था; और लगभग उसी समय राजधानी को भूकम्प और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा. हमारी यात्रा के समय तक यह नगर उन आपदाओं से उबर नहीं पाया था; और नगर का आधे से अधिक भाग खंडहर में था. राजमहल, जो एक विस्तृत और कुछ हद तक अलंकृत संरचना है, लगभग तीन शताब्दियों पूर्व निर्मित हुआ था; परन्तु भुरभुरे पत्थर से बना होने के कारण समय और दुर्घटनाओं से क्षतिग्रस्त होकर जीर्ण-शीर्ण और अनुपयोगी हो गया था.

नगर में दो हिंदू मंदिर थे; परन्तु प्रमुख और सबसे अच्छी अवस्था में स्थित भवन धर्मशाला था; अर्थात यात्रियों और तीर्थयात्रियों के लिए निवास-स्थान. श्रीनगर की एकमात्र सड़क बाज़ार थी; जो लगभग एक चौथाई मील लंबी, चौड़ी और पक्की थी. अधिकांश घर पत्थर के थे; ढलवाँ, स्लेट की छतों वाले; और दो मंज़िला; निचली मंज़िल दुकान के रूप में प्रयुक्त होती थी. व्यापार बहुत कम प्रतीत होता था; और केवल घरेलू उपयोग के लिए मोटे सूती और ऊनी वस्त्रों का निर्माण होता था.

अलकनंदा नदी में ट्राउट की एक ऐसी प्रजाति पाई जाती है, जो ग्रेट ब्रिटेन में ज्ञात किसी भी किस्म से भिन्न है. इसे पकड़ने की डोरियाँ यहाँ ‘मुरवा’ नामक रेंगने वाले पौधे के रेशों से बनाई जाती हैं (Sansetiera zeylanica); और अपनी बारीकी तथा दृढ़ता के लिए उल्लेखनीय हैं. मछली पकड़ते समय, डोरी के खुले सिरे पर एक छोटा पीला फूल बाँधा जाता है; और उसके चारों ओर सफ़ेद घोड़े के बाल के कई फंदे लगाए जाते हैं; बीच से सीसे का वज़न डाला जाता है, जिससे डोरी डूब जाती है. इस नई वस्तु से आकृष्ट होकर ट्राउट उसके चारों ओर तैरती हैं; और फंदों में उलझकर, श्रीनगर के मछुआरों द्वारा बड़ी निपुणता से सतह तक खींच ली जाती हैं.

अलकनंदा नदी के तट पर थोड़ी मात्रा में सोना पाया जाता है; जिसे नाहन क्षेत्र से आने वाले लोग धोकर निकालते हैं. यह कार्य अत्यधिक परिश्रमसाध्य है; और इससे प्राप्त मात्रा इतनी कम होती है कि इसे लाभदायक नहीं कहा जा सकता; फिर भी यह कुछ व्यक्तियों के लिए जीविका का साधन है. सोने के कण प्रायः अत्यंत सूक्ष्म होते हैं; और उन्हें मोटे बालों या ऊनी कपड़े की सहायता से छाना जाता है; जिनमें भारी कण अटक जाते हैं.

4 फरवरी को हमने श्रीनगर छोड़ा; और अलकनंदा को एक झूला पुल द्वारा पार किया; जो रस्सियों और लकड़ी के तख्तों से बना था; और नदी के ऊपर पर्याप्त ऊँचाई पर लटका हुआ था. इस प्रकार के पुल हिमालयी क्षेत्रों में सामान्य हैं; और यद्यपि प्रथम दृष्टि में वे असुरक्षित प्रतीत होते हैं; व्यवहार में वे अपेक्षाकृत सुरक्षित होते हैं; यद्यपि तेज़ हवा में उनका दोलन अत्यधिक असुविधाजनक हो जाता है.

इस स्थान से आगे मार्ग अत्यंत संकरा और कठिन हो गया. कई स्थानों पर केवल एक व्यक्ति ही एक समय में चल सकता था; और नीचे गहरी खाइयाँ थीं; जिनमें गिरने की स्थिति में बचाव की कोई संभावना नहीं रहती. इस कारण पर्वतीय यात्राओं में घोड़ों का प्रयोग बहुत सीमित होता है; और अधिकांश बोझ मनुष्यों द्वारा ढोया जाता है. जहाँ घोड़ों का उपयोग किया जाता भी है; वहाँ उनके खुरों में विशेष प्रकार के लोहे लगाए जाते हैं; ताकि वे पथरीले मार्ग पर फिसलें नहीं.

मार्ग में हमें टकोली, मुलैठा और देउल जैसे गाँव मिले; जिनमें सीढ़ीनुमा खेतों में गेहूँ, जौ, गन्ना और तंबाकू की खेती होती थी. कई स्थानों पर खेत लंबे समय से परित्यक्त प्रतीत होते थे; और गाँव आंशिक रूप से उजड़े हुए थे. यह स्थिति गोरखा शासन के दौरान हुए अत्याचारों का परिणाम बताई गई; जिसके कारण बड़ी संख्या में निवासी अपने गाँव छोड़ने को विवश हुए थे.

टिहरी पहुँचने पर हमारी राजा सुदर्शन शाह से भेंट हुई; जो गढ़वाल के वैध शासक थे; किंतु गोरखाओं द्वारा राज्य से निष्कासित किए जाने के बाद सीमित क्षेत्र में निवास कर रहे थे. उनका वर्तमान निवास अल्प साधनों वाला था; और उनकी आय अत्यंत कम थी. उन्होंने मुझे बताया कि गोरखा शासन के दौरान जनसंख्या में अत्यधिक गिरावट आई; जिसका मुख्य कारण बलपूर्वक श्रम, भारी कर और दासत्व था.

राजा ने ‘बरात’ नामक एक धार्मिक प्रथा का भी उल्लेख किया; जो संकट, रोग या प्राकृतिक आपदा के समय की जाती है. इसमें गाँव के लोग एकत्र होकर देवता को प्रसन्न करने के लिए अनुष्ठान करते हैं; और विश्वास किया जाता है कि इससे विपत्ति टल जाती है. इस प्रथा का पालन आज भी कई पर्वतीय क्षेत्रों में किया जाता है.

टिहरी के आसपास के वनों में बाघ और तेंदुए प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. इन्हें पकड़ने के लिए गहरे गड्ढे खोदे जाते हैं; जिन्हें ऊपर से ढँक दिया जाता है; और उनके भीतर पशु का मांस रख दिया जाता है. भेड़िये भी इस क्षेत्र में बहुतायत से हैं; और वे प्रायः झुंड में आक्रमण करते हैं; विशेषकर सर्दियों में; जब भोजन की कमी होती है.

टिहरी से आगे बढ़ते हुए हमने नलापानी और कालंगा की ओर यात्रा की. ये दोनों स्थान हाल के युद्धों के कारण प्रसिद्ध थे; जहाँ गोरखों और ब्रिटिश सेनाओं के बीच भीषण संघर्ष हुआ था. किले अब खंडहर में परिवर्तित हो चुके थे; किंतु उनके अवशेष अभी भी दृश्यमान थे; और स्थानीय लोग उन घटनाओं को जीवित स्मृति की भाँति वर्णित करते थे.

देहरा घाटी में प्रवेश करते ही परिदृश्य में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई दिया. भूमि समतल; उपजाऊ और घनी वनस्पति से आच्छादित थी. यह क्षेत्र कभी घने जंगलों से ढका हुआ था; और जंगली पशुओं का निवास-स्थल था; किंतु धीरे-धीरे इसे कृषि योग्य बनाया गया. यहाँ की जलवायु अपेक्षाकृत सौम्य है; और खेती के लिए अनुकूल है.

इसके पश्चात हमने यमुना नदी पार की; और सिरमौर राज्य की सीमा में प्रवेश किया. कारदा दून नामक क्षेत्र अपनी उर्वरता और घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध है. यहाँ पशुपालन बड़े पैमाने पर किया जाता है; और गायों तथा भैंसों की संख्या बहुत अधिक है.

मार्कंडा नदी के निकट भूमि फिर से पर्वतीय स्वरूप धारण करने लगती है. नाहन नगर एक पहाड़ी पर स्थित है; और सिरमौर के शासक का निवास-स्थान है. नगर सुव्यवस्थित और स्वच्छ प्रतीत हुआ; और यहाँ व्यापार की कुछ गतिविधि भी देखी गई. सिख प्रदेश की निकटता के कारण यहाँ राजनीतिक सतर्कता स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी.

मार्कंडा नदी पार करने के पश्चात मार्ग पुनः ऊँचाई की ओर बढ़ने लगा. भूमि अधिक पथरीली हो गई; और खेती केवल सीमित स्थानों पर ही संभव थी. नाहन से आगे रायपुर की ओर जाते समय हमें मधुमक्खियों के अनेक छत्ते दिखाई दिए; जिन्हें स्थानीय लोग बड़े कौशल से काटकर शहद निकालते हैं. यह शहद न केवल घरेलू उपयोग में लाया जाता है; बल्कि आसपास के क्षेत्रों में व्यापार की वस्तु भी है.

पिंजौर पहुँचने पर परिदृश्य में फिर परिवर्तन दिखाई दिया. यहाँ एक विशाल और चारों ओर से घिरा हुआ उद्यान है; जिसे स्थानीय शासकों द्वारा निर्मित कराया गया था. इसमें जल-प्रणालियाँ, फव्वारे और छायादार वृक्ष हैं; और यह स्थान पर्वतीय क्षेत्रों में असामान्य रूप से समतल और सुव्यवस्थित प्रतीत होता है. इस उद्यान की स्थिति ऐसी है कि यह चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है; और प्राकृतिक रूप से संरक्षित जान पड़ता है.

पिंजौर से आगे हम हिन्दूर राज्य की सीमा में प्रविष्ट हुए. यह एक छोटा पर्वतीय राज्य है; जिसकी भूमि सीमित और जनसंख्या अल्प है. यहाँ से मार्ग पुनः कठिन हो जाता है; और चढ़ाई लगातार बनी रहती है. मलाऊँ का किला एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है; और हाल के वर्षों में यह सैन्य गतिविधियों का केंद्र रहा है. यहाँ की स्थिति सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है; क्योंकि यह आसपास की घाटियों पर नियंत्रण रखता है.

कहलूर राज्य में प्रवेश करते ही सतलुज नदी की घाटी दिखाई देने लगती है. कहलूर की राजधानी बिलासपुर है; जो नदी के निकट स्थित है. यह नगर आकार में छोटा है; किंतु आसपास के क्षेत्रों के लिए व्यापार का केंद्र है. यहाँ के निवासी मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर निर्भर हैं; और पहाड़ी मार्गों से होने वाले आवागमन से भी कुछ आय प्राप्त करते हैं.

सतलुज नदी को पार करने की विधि उल्लेखनीय है. यहाँ लकड़ी की नावों का प्रयोग नहीं किया जाता; बल्कि फुलाए हुए पशु-चर्मों को बाँधकर उन पर तख्ते रख दिए जाते हैं; और इस प्रकार एक अस्थायी नौका बनाई जाती है. इस पर यात्री और सामान रखा जाता है; और नाविक रस्सियों की सहायता से इसे धारा के आर-पार ले जाते हैं. यह प्रक्रिया देखने में जोखिमपूर्ण प्रतीत होती है; किंतु अभ्यास के कारण स्थानीय लोग इसे सहजता से सम्पन्न कर लेते हैं.

सतलुज पार करने के बाद हम सुकेत घाटी में पहुँचे. यह क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक उपजाऊ है; और यहाँ धान तथा अन्य अनाजों की खेती होती है. मंडी राज्य इसी घाटी में स्थित है; और इसका शासक आसपास के छोटे राज्यों पर प्रभाव रखता है. मंडी नगर में कुछ व्यापारिक गतिविधियाँ दिखाई देती हैं; विशेषकर ऊन, नमक और स्थानीय उत्पादों का लेन-देन होता है.

यात्रा के इस चरण में सिख अधिकारियों के हस्तक्षेप के कारण हमें कुछ विलंब का सामना करना पड़ा. मार्गों पर नियंत्रण और अनुमति-पत्रों की आवश्यकता के कारण हमारी गति बाधित हुई; और हमें कई स्थानों पर प्रतीक्षा करनी पड़ी. इन कठिनाइयों के बावजूद यात्रा को आगे बढ़ाना आवश्यक था; क्योंकि समय अधिक खर्च होने पर आगे के मार्ग दुर्गम हो सकते थे. अंत में हमने लाहौर की ओर प्रस्थान किया; मन में यह आशा रखते हुए कि वहाँ से आवश्यक स्वीकृतियाँ प्राप्त कर आगे की यात्रा निर्बाध रूप से की जा सकेगी.

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