फोटो: अशोक पाण्डे
दारमा इलाके में फाफ़र और उगल को भकार के साथ कुंग में भी जमा किया जाता. दारमा के दुमंजिले मकानों में नीचे की मंजिल से दुमंजिले की ओर चढ़ने वाली आखिरी पत्थर की सीढ़ी से नीचे फर्श तक खोखल छोड़ दिया जाता. इसकी दीवारें पाथर की चिनाई वाली होतीं. इस गड्ढे या खोखल के फर्श और चारों ओर कांटेदार पत्तियों वाली झाड़ी जिसे छछै कहते की टहनियों को रख दिया जाता. Traditional houses and utensils of Darma Valley
छछै मोरपंखी की तरह दिखता जिसकी टहनियों के ऊपर भोजपत्र की तह लगा दी जाती. अब यह उगल, फाफर, चावल को जमा करने के लिए तैयार हो जाता. जिसमें अनाज ऊपर तक भर लकड़ी के ढक्कन से ढांप उस पर चिकनी मिट्टी से पोत दिया जाता. ढक्कन के ऊपर फिर से छछै की टहनियां रख दी जातीं. इससे अनाज को चूहा भी नहीं कुतरता और अनाज कई तरह से खराबी भी नहीं होता. छुरीमुस भी अनाज चट करते. पर जहां गोठ में छुरीमुस आता तो चूहे या मुस भाग जाते.
शौका लोग सामूहिक रूप से पके हुए अनाज को रखने की टंकी को झम कहते जो लकड़ी का बना होता. तो अकेले परिवार के लिए पके अनाज या सं-सतानी के बर्तन को कलिंचे कहा जाता. तो सामूहिक रूप से बने भोजन का पात्र या टंकी, झम कहलाती.
शौका लोगों में लकड़ी से बने पात्र व बर्तनों में तम्बाकू पीने की पारम्परिक वस्तु नारली साज कही जाती. रोटी बनाने के लिए गुलोकोसी, चूल्हे में चढ़ाने उतारने के लिए काचे, नमकीन चाय बनाने के लिए या मट्ठा फेंटने के लिए दोंगबू भी लकड़ी से बनाया जाता.
बरछयं पीने के लिए कांसे से बना पात्र करया कहलाता. चाय पीने का बर्तन लकड़ी पर चांदी की परत वाला होता, मर्दों के लिए बना पात्र लिंचै तो औरतों के लिए बना पात्र मुल कचें कहलाता.
भात खाने का परंपरागत बर्तन कांसे का होता, मर्दों के लिए बने बर्तन को तली तो औरतों के लिए बना बर्तन खोरयं होता. इसका आकार कटोरे -बेले सा होता. जम्बू और गंधरेणी जैसे सुगन्धित मसालों के अलावा कूट, कुटकी, बालछड़, जटामासी जैसी भेषजों को ऊनी थैलों में रख गांठ बांध कर लटका दिया जाता.
भाँग, भेकुला या अल्ले के रेशों से बने कुथलों में भी खाद्य सामग्री रखी जाती. इन्हें कुथव भी कहा जाता जो सबसे मजबूत भाँग के रेशों से बनते. इससे बनी चददर या टाट बुदल या बुदव कही जाती. थैले व छोटी थैली भी बनती.
गड्ढों में अनेक फसलों को गाड़ कर रखने कर लम्बे समय तक बचाने के कई तरीके अपनाये जाते. शौका लोग अनाज या सं रखने के लिए मिट्टी से बना सा घरी बनाते. मल्ला दारमा में ऊंचाई वाले खेत में पांच-सात बोरी के लायक बने गड्ढों में आलू मूली रखी जाती. फिर पत्थर से ढक ऊपर मिट्टी का पहाड़ या मंदिर जैसा बना देते . ऊपर से फिर पत्थर रख देते. बाहर से आने वाला पानी किनारों से निकल जाता.
हल्दी, अदरख, मूली को पुवाल के ढेर के बीच बांध कर भी रखा जाता. इसे धुचका कहा जाता. बोक्सा लोगों में यह तरीका काफ़ी प्रचलित था. पहाड़ में अन्य जगहों में हल्दी, अदरख, मूली, पिनालू गड्डों में खड़ियाए जाते.
खड्डे में रखे पिनालू वहीँ सड़ जाएं तो इसे कूप मण्डूकता माना जाता, खाड़ा का पिनालू खाड़े सड़ा. इसलिए बड़े जतन किये जाते. गड्डे की निचली सतह पर पत्थर या पटाल रख दिये जाते.
कई जगह मडुए के छिक्कले डाले जाते तो कई स्थानों में ढाँटि कौंण डाले जाते जो धान कूटने से निकले छिक्कल होते. इनमें बड़े निम्बू या चूक लम्बे समय तक सुरक्षित बने रहते. बीजों को सूखी लौकी के खोखल में रख दिया जाता.
ऐसे ही सूखे तुमड़े भी काम आते. तुमड़ों में निम्बू, दाड़िम व जामिर का चूक भी रखा जाता. लकड़ी से बनी कुमली में घी और चूक रखा जाता. Traditional houses and utensils of Darma Valley
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जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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