कहो देबी, कथा कहो – 8
पिछली कड़ी उस दिल्ली में वे दिन मन में कृषि वैज्ञानिक और एक साहित्यकार बनने का सपना बुनते-बुनते पहाड़ से दिन भर की लंबी यात्रा के बाद तपती दिल्ली पहुंचा. साथी कैलाश पंत यानी के. सी. साथ था. दो... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 7
पिछली कड़ी अलविदा नैनीताल हां, नैनीताल ही याद आता रहा और मैं जैसे कहीं दूर खड़ा होकर मन ही मन उसे देखता रहा… पानी से डबाडब भरा विशाल ताल और हरे-भरे जंगलों से घिरा मेरा शहर नैनीताल. बांज,... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 6
पिछली कड़ी वे कहानियां ओ हो, वह आंगन में घुघुते-घुघतियों का दाने चुगना! टोकरी के भीतर उन्हें पकड़ने की कोशिश… ‘और, अनायास ही मैंने अतीत की ओर दौड़ काट दी है. टोपी सिर से निकाल कर हाथ में... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 5
पिछली कड़ी साहित्य की प्रयोगशाला नैनीताल मेरे लिए साहित्य की प्रयोगशाला भी रहा जहां मैंने साहित्य की बारहखड़ी लिखी और पढ़ी. गांव से दूर सपनों के शहर में पढ़ने के लिए जरूर चला आया था लेकिन पढ़ते-ल... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 4
पिछली कड़ी नवीन और मैंने एन सी सी भी ले ली. एन सी सी की अपनी प्लाटून की परेड के दौरान एक दिन सावधान!…विश्राम! के बाद सुस्ताते समय एक कैडेट ने धीरे से पूछा, “तुम देवेन एकाकी हो?” मैंने उ... Read more
आम के नाम
आम तो बस आम है. इसका कोई जवाब नहीं. खास ही नहीं, आम आदमी का भी मनपसंद फल. देश भर में उगता है और बहुतायत से फलता है. आम हमारे देश का राष्ट्रीय फल है, हमारी पहचान है. यहां इसे सदियों से उगाया... Read more
कहां से आती हैं परियां?
अच्छा दोस्तो, पहले यह बताओ- क्या तुमने कभी कोई परी देखी? नहीं? लेकिन, मैंने देखी है! चौंक गए ना? जब मैं भी तुम्हारी तरह बच्चा था तो मैंने परी देखी थी. उससे खूब बातें की थीं. और हां, मैं उसके... Read more
बारह बरस बाद कुरिंजी की बहार
दक्षिण भारत में बारह वर्ष बाद फिर बहार के दिन आ गए हैं. पश्चिमी घाट की ऊंची पहाड़ियों पर प्रकृति अपनी कूंची से नीला रंग भरने लगी है. रंगो-बू की यह बेशकीमती बहार वहां खिल रहे नीला कुरिंजी के फ... Read more
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