फिर चांद के लिए इतनी चाहत क्यों?
50 वर्ष पहले 20 जुलाई 1969 को चांद की सतह पर मानव के वे पहले कदम पड़े थे. 8 बज कर 26 मिनट (कोआर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम) पर अपना बांया कदम चांद पर रखते हुए प्रथम चंद्रयात्री नील आर्मस्ट्रांग... Read more
उसके चारों ओर एक शून्य विस्तार पाता जा रहा है
कहानी की कहानी-5 आज जब करीब पचपन वर्ष बाद ‘कहानी’ कथा-पत्रिका में देवेन नाम से छपी अपनी इस कहानी ‘अलगाव’ का पुनर्पाठ कर रहा हूं तो याद कर रहा हूं कि आखिर आदमी के अकेलेपन की यह कहानी मेरे मन... Read more
क्या विशाल ब्रह्मांड में हम अकेले हैं
न जाने नक्षत्रों में है कौन! हां, कौन जाने अंतरिक्ष में जगमगाते असंख्य नक्षत्रों के किस अनजाने लोक में न जाने कौन है? किसे पता? यही किसे पता कि विशाल ब्रह्मांड में नक्षत्र यानी तारे आखिर कित... Read more
खड़कदा – देवेंद्र मेवाड़ी की कहानी
कहानी की कहानी – 4 बखतऽ तेरि बलै ल्यूंल. तेरी बलिहारी जाऊं बखत (वक्त). कितना कुछ चला जाता है बखत के साथ. अब बताइए, आज कौन जानता है कि खड़कदा भी थे कभी? लेकिन, खड़कदा थे और खूब थे. आते-... Read more
बलि का बकरा – देवेन मेवाड़ी की कहानी
कहानी की कहानी उर्फ़ बकरा बलि का ईजा (मां) बीमार थी. उसका बहुत मन था कि देबी खूब पढ़े हालांकि वह कभी स्कूल नहीं गई थी. उसने प्रकृति की किताब पढ़ी थी और मुझे अपनी भाषा में पेड़-पौधों और प्राणि... Read more
दाड़िम के फूल – इस कहानी की एक कहानी है
मेरी कहानी ‘दाड़िम के फूल’ की भी एक मजेदार कहानी है. आनंद तब आए जब इससे पहले मेरे दोस्त बटरोही की कहानी ‘बुरांश का फूल’ पाठकों को पठने को मिले. तब यानी सन् 60 के दशक में हम नैनीताल के डीएसबी... Read more
उस दिन शिकार पर गया मैं पछेटिया बन कर
एक दिन मुझे पछेटिया बन कर सचमुच शिकार पर जाने का मौका मिल गया. पछेटिया मतलब शिकारी के पीछे-पीछे चलने वाला आदमी. शिकारी थे नयाल मास्साब, जिन्हें शिकार मारने का बेहद शौक था. शिकार तो बस नाम भर... Read more
फिर कि भौ उर्फ उत्तरकथा
“पूरी कथा सुना दी हो देबी तुमने तो.” “पूरी कथा? अभी कहां पूरी हुई?” “क्यों रिटायरमेंट तो हो गया?” “रिटायमेंट हो गया तो क्या हुआ? वह तो नौकरी से रिटायरमेंट हुआ, जिंदगी की कथा तो चल ही रही ठैर... Read more
ओ ईजा! ओ मां! – पहाड़ की एक भीगी याद
बचपन से आज तक ईजा (मां) को कभी नहीं भूला. वह 1956 में विदा हो गई थी, जब मैं छठी कक्षा में पढ़ रहा था और ग्यारह साल का था. वह मेरी यादों में सदैव जीवित है. जब भी कठिन समय आया तो मुझे लगा मां म... Read more
मुक्त आकाश का पंछी
कहो देबी, कथा कहो – 46 पिछली कड़ी – कुमारस्वामी और काम के वे दिन वह दिन था 2 जून 2003, जब मैंने दिल्ली अंचल में नौकरी की नई पारी शुरू की. बैठने के लिए तीसरी मंजिल पर एक अलग केबिन मिल गया. पहल... Read more
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