पहाड़ और मेरा बचपन – 6
(पिछली क़िस्त से आगे. पिछली क़िस्त का लिंक – पहाड़ और मेरा बचपन दिल्ली की कुछ और यादें मेरे स्मृतिपटल पर इतनी साफ अंकित हैं कि उनका ब्योरा दिए बिना आगे बढ़ना अनुचित होगा. सिर्फ इसलिए नहीं... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 5
पिछली क़िस्त – पहाड़ और मेरा बचपन – 4 गांव में उन बहुत बचपन के दिनों के बाद मुझे दिल्ली के दिन याद आते हैं. पर दिल्ली का बचपन विषय से बाहर का मामला हो गया. लेकिन अगर उस बचपन के बारे में... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 4
पिछली क़िस्त पहाड़ और मेरा बचपन – 3 गांव की और भी कई धुंधली यादें हैं. मसलन यह कि मैं ज्यादातर अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ खेलता था. दो के नाम मां आज भी लेती है. एक कल्यूरी और दूसरी आशा. दोनो... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 3
पिछली क़िस्त पहाड़ और मेरा बचपन – 2 मां आस-पास की ऐसी औरतों को जानती थी, जिन्होंने खुद भी गाय पाली हुई थीं. ये सभी महिलाएं आपस में मिलकर घास का कोई पहाड़ खरीद लेतीं और फिर मिलकर घास काटने जात... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 2
(पिछली क़िस्त का लिंक: पहाड़ और मेरा बचपन – सुंदर चंद ठाकुर का नया कॉलम) मेरी दूसरी स्मृति एक सांप की उलटी पड़ी लाश से जुड़ी हुई है. हमारे अहाते से एक रास्ता ऊपर जंगल से सटकर जाती मुख्य... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – सुंदर चंद ठाकुर का नया कॉलम
[देश के प्रमुख पत्रकार-संपादकों व लेखकों में गिने जाने वाले सुन्दर चंद ठाकुर मूलतः जिला पिथौरागढ़ के एक छोटे से गाँव खड़कू भल्या के रहने वाले हैं. सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत कुछ वर्ष न... Read more
यथार्थ के दलदल में डूब जाएगा उनका गृहविज्ञान
गृहविज्ञान -सुन्दर चंद ठाकुर वे कौन सी तब्दीलियां थीं परंपराओं में कैसी थीं वे जरूरतें सभ्यता के पास कोई पुख्ता जवाब नहीं गृहविज्ञान आखिर पाठ्यक्रम में क्यों शामिल हुआ. ऐसा कौन सा था घर का व... Read more
अकेलेपन का दर्द बूढ़े होकर ही जानेंगे हम
सुन्दर चन्द ठाकुर कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में ज... Read more
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