लोक कथा : श्राद्ध की बिल्ली
किसी जमाने की बात है. एक गांव में सास-बहू रहा करते थे. जैसा की पहाड़ों के हर घर में होता है कि लोग पालतू जानवर रखा करते हैं. सास-बहू ने भी एक बिल्ली पाल रखी थी. वह बिल्ली हमेशा कभी सास तो कभ... Read more
लोककथा : शेरू और श्याम
सावित्री ने आज घर पर ही रहने का फैसला किया. थकाऊ खेती के काम से आज उसे फुरसत मिली थी. हफ्ते दस दिन से वह इतनी व्यस्त हो गयी थी कि अपने बेटे को समय नहीं दे पा रही थी. चाहती थी कि आज वह अपने ब... Read more
बड़ी पुरानी बात है, जाड़ों के दिन थे. पहाड़ पार जंगल में चरने गयी बकरियों में एक गर्भवती बकरी जंगल में ही छुट गयी. जंगल में एक बाघिन भी रहती थी. गर्भावस्था के चलते बाघिन इन दिनों शिकार पकड़न... Read more
Popular Posts
- पहाड़ो में भूस्खलन
- जर्मन की लड़ाई और रुद्रनाथ की चढाई
- हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी
- हैप्पी बर्थडे कॉर्बेट साहब
- 28 साल के युवा से जब टिहरी रियासत डर गई
- दुनिया में शांतिपूर्ण आंदोलनों का संक्षिप्त इतिहास
- गांधीजी ने दुनिया के सबसे बड़े अहिंसक आंदोलन का संचालन कैसे किया?
- भारत में आँसू गैस के गोले सबसे पहले अंग्रेज़ लाए थे
- कुमाऊं का सबसे बड़ा सामाजिक समूह “खस” रहा : आर. डी. सनवाल
- हरेला: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम
- हरेले के रंग में पहाड़ : फोटो निबन्ध
- अब हल्द्वानी में पहाड़ी उत्पादों के सबसे विश्वसनीय ब्रांड ‘मुनस्यारी हाउस’ की शुरुआत
- खड़कमाफी के जीवन में एक दशक से विचरते एकदंत गजराज
- क्या उत्तराखंड, पारिस्थितिक वहन क्षमता को लागू कर सकता है?
- रिंगाल आधारित शिल्प : उत्तराखण्ड का एक परम्परागत कुटीर उद्योग
- कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा
- चीड़ की छाल को कलाकृतियों का रूप दे रहा एक कलाकार
- मेरी यादों का पहाड़ : एक बहुआयामी किताब
- पहाड़ की पुकार जो खींच ले गई मुझे
- ‘मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है
- सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन
- मानव और प्रकृति का संबंध प्राचीन, गहरा और अविभाज्य है
- न रुकदि छै, न थकदि छै, नयार जन बगदि छै : संकट में है नयार
- कर्ज पर युधिष्ठिर का जवाब : लोककथा
- दिव्य आम का स्वाद जीभ पर नहीं पेट के सबसे चोर हिस्से पर कब्ज़ा जमाता है
