उम्मीद-भरी प्रतीक्षा के बाद निराशा की जो अथाह थकान होती है, उसी को लेकर टूटी डाल की मानिंद-थकी-माँदी काकी लौट गई थीं. उनका जाना निश्चित था. हम कोशिश करते तब भी वे रुकनेवाली नहीं थीं. किसी ने... Read more
न जाने कितने पहाड़ी दंपत्तियों के जीवन की हकीकत है क्षितिज शर्मा की कहानी ‘लौटने के बाद’
वह सोचती है, एक महीने का समय इतना कम नहीं होता. पूरे तीस दिन होते हैं. बल्कि, तीस दिन और तीस रातें होती हैं. बहुत कुछ बदल जाता है तीस दिनों में. पराए अपने हो जाते हैं और अपने पराए तक हो जाते... Read more
भविष्य: एक पहाड़ी लोहार की कहानी
रतखाल की दुकानों से लौटे हरकराम गुमसुम से बैठे हैं. वहाँ से आते वक्त ही पैर टूटने लगे थे. दो मील का सफर ही अंतहीन हो गया था, जबकि सारा रास्ता ढलान का था. चढ़ाई होती तो घर पहुँचना मुश्किल ही... Read more
न जाने पहाड़ के कितने परिवारों की हकीकत है क्षितिज शर्मा की कहानी झोल खाई बल्ली
सर्दी ने थोड़ी राहत दे दी थी. चार दिन से रुक-रुककर बर्फ गिरने के बाद आज कुछ देर को धूप निकल आई थी. एकदम मरियल, पीली-पीली. उसमें हल्की-सी तपन तो थी, पर बर्फ पिघलाने की ताकत बिलकुल नहीं थी.(Jh... Read more
रेवती रोई नहीं : एक सशक्त पहाड़ी महिला की कहानी
रानीखेत रोड से होती हुई रेवती लकड़ियों की गढ़ोई (बंडल) लेकर जैसे तंबाकू वाली गली से गुजरी, जमनसिंह की आँखों में चमक-सी आ गई. आलस में सुस्ता रहे शरीर में करंट-सा दौड़ गया. उसने अध लेटे शरीर क... Read more
जिस वक्त हम गाँव पहुँचे, धूप चोटियों पर फैलने के बाद उतरते-उतरते पहाड़ियों के खोलों में बैठने लगी थी. हवा अभी तपी नहीं थी, ठंडक थी उसमें- बल्कि, हल्का-सा जाड़ा था उसकी तासीर में.(Story by Ks... Read more
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