कहो देबी, कथा कहो – 15
किलै, मैं देबी उस दिन कमरे में अकेला था. कमरे का दरवाजा भी बंद था. गहरे सोच में डूबा था कि सहसा लगा, कमरे में कोई है. कुछ समझता, इससे पहले ही अचानक खम्म से वह सामने आ खड़ा हुआ. मैंने चौंक कर... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 14
डांस ब्वाइज डांस छुट्टी के दिन कई बार मैं अपने साथी बिष्ट के कमरे में भी मिलने चला जाता था. वह मुझे अक्सर एक पुराना गढ़वाली गीत सुनाया करता था- ‘नौ रूपायाक मोत्या बल्द, दस रूपायाक सींग!’ एक... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 13
एक वह दोस्त उन्हीं दिनों एक दिन मेरा वह एक दोस्त आ गया. बोला, इलाहाबाद जा रहा था लेकिन देवेन तुम्हारी याद आई तो पहले दिल्ली चला आया. चलो यार खूब बातें करेंगे, साहित्य की, कला की. मैंने पूसा... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 12
लेखकों की संगत भूखी पीढ़ी आंदोलन 1965 के आसपास शांत हुआ तो दिल्ली में अकविता के स्वर मुखर हो उठे. हिंदी के अकवि एक लघु पत्रिका ‘अकविता’ प्रकाशित कर रहे थे जिसमें प्रायः सौमित्र मोहन, मणिका मो... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 11
साहित्य की दुनिया पूसा इंस्टिट्यूट के भीतर अनुसंधान की दुनिया थी. उसके बाहर एक और दुनिया थी जिसमें मुझे जल्द से जल्द जाना था. वह थी, साहित्य और साहित्यकारों की दुनिया. उस दुनिया के कई स्वप्न... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 10
पिछली कड़ी सायोनारा…सायोनारा सिकंदराबाद स्टेशन पर मैंने एलिस से पूछा, “काफी पिएं?” वह बोली, “जरूर.” मैंने काफी मंगाई. हम बस काफी पी ही रहे थे कि बगल के जनरल डिब्बे से हमारा अधेड़ फील्डमै... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 9
पिछली कड़ी अहा, वह हैदराबाद अहा, उन दिनों का वह हैदराबाद! अंबरपेट फार्म से शाम को थका-मांदा होटल में लौटता. नहा-धोकर एबिड रोड की ओर निकल जाता. लौटते हुए कई बार ताजमहल होटल में खाना खा लेता. आ... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 8
पिछली कड़ी उस दिल्ली में वे दिन मन में कृषि वैज्ञानिक और एक साहित्यकार बनने का सपना बुनते-बुनते पहाड़ से दिन भर की लंबी यात्रा के बाद तपती दिल्ली पहुंचा. साथी कैलाश पंत यानी के. सी. साथ था. दो... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 7
पिछली कड़ी अलविदा नैनीताल हां, नैनीताल ही याद आता रहा और मैं जैसे कहीं दूर खड़ा होकर मन ही मन उसे देखता रहा… पानी से डबाडब भरा विशाल ताल और हरे-भरे जंगलों से घिरा मेरा शहर नैनीताल. बांज,... Read more
कहो देबी, कथा कहो – 6
पिछली कड़ी वे कहानियां ओ हो, वह आंगन में घुघुते-घुघतियों का दाने चुगना! टोकरी के भीतर उन्हें पकड़ने की कोशिश… ‘और, अनायास ही मैंने अतीत की ओर दौड़ काट दी है. टोपी सिर से निकाल कर हाथ में... Read more
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