जाने का भी क्या समय चुना यार? अलविदा इरफ़ान!
लॉकडाउन घोषित होने से तक़रीबन बारह पंद्रह दिन पहले निर्माता दिनेश विजान की फ़िल्म ‘अंग्रेजी मीडियम’ की स्पेशल स्क्रीनिंग में मैं बतौर गेस्ट मौजूद था लेकिन वहाँ मौजूद हिंदी फ़िल्म जगत के तमाम... Read more
मौत और मोहब्बत की संगत में एक विकट सफ़र
फ़रवरी के आख़िरी दिन थे. मौसम को उदास और झाड़ रूख को झंखाड कर देने वाली हवा चलने लगी थी जिसे हमारे यहाँ लोकभाषा में फगुनहटा कहते हैं. बोकारो के सर्किट हाउस से हम थके उदास और टूटे अपनी अपनी स... Read more
हम सब उम्र के उस दौर में थे जिसे वय:संधि कहते हैं और जिसके वर्णन के बहाने पुराने कवियों ने शृंगार रस का जम कर मसाला छाना है. मन पर सरसों के पीले खेत में तिरछा हो कर भुजा पसारे सारूक खान अभिन... Read more
साधो हम बासी उस देस के – 5 -ब्रजभूषण पाण्डेय (पिछली कड़ी : बार्क मतलब खाली भौंकना नहीं होता उर्फ़ कैस्केडिंग इफ़ेक्ट की बारीकियां) जमुना परसाद उन दोनों को फ़ुल इग्नोर मारते हुए अपनी चेयर पर रूल... Read more
साधो हम बासी उस देस के – 4 -ब्रजभूषण पाण्डेय पिछली कड़ी : यह क्रांतिकारी दिन था मेला बीत चुका था. परेवा झमटहवा पीपर की ओर, किसान गेहूँ बुआई के लिए सिवान की और और हम मस्ती भरी अनियमित जीवन शैल... Read more
ज़रा सोचें सच की तस्वीरों को आईने में हम उतारने चलें और तस्वीरें ही बोलने लगें, तो कैसा महसूस होगा हमें? चौंकेंगे? धक्का लगेगा? बिल्कुल लगेगा क्योंकि हमें बोलती तस्वीरों की और आंखों में झाँक... Read more
यह क्रांतिकारी दिन था
साधो हम बासी उस देस के – 3 -ब्रजभूषण पाण्डेय टुच्ची और हमारी सारी उम्मीदें तो बस ग्रू के करम पर टिकी थीं. सो उसकी ख़ुशी में ख़ुश होने का सफल दिखावा करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई दूसरा चारा... Read more
बारह मास विलास
साधो हम बासी उस देस के – 2 -ब्रजभूषण पाण्डेय मेला गाँव का पहले से लेकर तीसरे तक सबसे प्रमुख त्योहार था. होली दशहरा चौथे पाँचवे पर आते. त्योहार के साथ साथ सिंगार पटार उखल मूसल और पटरे वाली चौ... Read more
वह एक आधा कच्चा बचा गाँव था
साधो हम बासी उस देस के – 1 -ब्रजभूषण पाण्डेय हजरात हजरात हजरात! ये एक गांव की कहानी है. गंगा के निर्मल और सोन के विस्तृत पाटों वाले प्रवाह के मध्य जो जीवनदायिनी छोटी नदियाँ बहतीं... Read more
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