हिंदी में लुगदी, पेशेवर और श्रेष्ठ साहित्य का विभाजन थोड़ा-सा चर्चित हो जाने के बाद हिंदी का लेखक बहुत तेजी-से अपने खोल में घुस जाता है. उसकी दुनिया बन जाती है: वो खुद, उसके हमप्याला दोस्त... Read more
फूलन और मनोहरश्याम की जुबान के बगैर कोई लेखक बन ही कैसे सकता है जैसे पराई धरती पर पौधा नहीं रोपा जा सकता, इसी तरह परायी भाषा से रचना का पौधा नहीं जमाया जा सकता. आजादी के बाद हिंदी में आंचलिक... Read more
पंडित प्रतापनारायण मिश्र के ‘ब्राह्मण’ और डकैत फूलन देवी के ‘ठाकुर’ पिछली बार हमारा किस्सा इस बात के जिक्र पर ख़त्म हुआ था कि साहित्य और भाषा की चाल में कोई यूटर्न नहीं होता. इसका मतलब यह है... Read more
हिंदी की नई पौध के लिए एक चिट्ठी : नसीहत नहीं, ‘हलो’ मेरे नए रचनाकार दोस्तो! आज से करीब पचपन साल पहले मैंने हिंदी लेखकों की दुनिया में प्रवेश किया था. वो पिछली सदी के साठ के दशक का आरंभिक दौ... Read more
अल्मोड़ा से बम्बई चले डेढ़ यार – तीसरी क़िस्त कठोपनिषद की तीसरी वल्ली (अध्याय) का पहला मंत्र है: ऊर्ध्व्मूलोSवक्शाख एशोSश्वत्थः सनातनः ! तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ! तस्मिंल्लोकाःश्... Read more
अल्मोड़िया राइटर डेढ़ यार: पहुंचे टेसन अंधेरी-खार
अल्मोड़ा से बम्बई चले डेढ़ यार – दूसरी क़िस्त पिछली क़िस्त में उत्तराखंड से हिंदी साहित्य में कूद पड़े हमारे किस्सागो-पुरखों का जिक्र हुआ ही था कि चारों ओर से शिकायती आवाजें उठने लगी … मालू... Read more
अल्मोड़ा से बम्बई चले डेढ़ यार – पहली क़िस्त पहले अल्मोड़ा से अपनी मीट की दुकान से भागकर मुंबई पहुंचे आधे यार रमेश मटियानी उर्फ़ शैलेश का किस्सा. आधा यार इसलिए कि सोलह साल की उम्र में भावुकता में... Read more
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