आज शैलेश मटियानी जी को गए उन्नीस साल बीत गए
उनके पास बहुत सारी भाषाएँ थीं जिन्हें वे जीवन भर तराशते रहे. उनके यहाँ असंख्य ठेठ गंवई पात्र हैं तो अभिजात्य से भरपूर स्त्रियाँ भी. वे रमौल-बफौलों की कहानी को किसी अनुभवी जगरिये की सी साध के... Read more
आज चार्ली चैपलिन की जयन्ती है
आज यह हिसाब लगाना मुश्किल है कि चार्ली चैपलिन किस कदर लोकप्रिय थे. दुनिया के सबसे बड़े कलाकार, चित्रकार, कवि, राजनेता और खूबसूरत स्त्रियाँ उनके नजदीकी दोस्तों के दायरे में आते थे. तुर्की के... Read more
कोई बीस बरस पहले धरमसिंह लकड़ी काटने जंगल गए थे जब भालू ने उन पर हमला बोल दिया. उनका छोटा सा पोता उनके साथ था. उन्होंने एक हाथ से बच्चे को सम्हाला और दूसरे में थमी दरांती से भालू पर तब तक वा... Read more
यस्य गृहे चहा नास्ति, बिन चहा चहचहायते
नैनीताल में मेरे क्लासफैलो थे कामरेड दीनबंधु पन्त. विचारधारा से वामपंथी इन जनाब की खासियत यह थी कि वे पारिवारिक पेशे से पुरोहित थे. जाहिर है संस्कृत पर उनकी गहरी पैठ थी. कबाड़ के निर्माण में... Read more
तुम से माफी माँगता हूं सतपुली की विजेश्वरी!
नदी की तरफ उतरते समय वह किनारे पर कपड़े धोती नजर आती है. हम नदी के तट पर दो-एक घंटे घूमते रहते हैं. वापस आते हैं तो वह काम से फारिग हो पुल की बगल में फुरसत में बैठी घाम तापती दिखती है. (Stor... Read more
कुछ तो करना है पहाड़ के लिए
बीस साल तक दुनिया-जहान में तमाम धकापेल कारपोरेट नौकरियां करने के बाद मार्च की एक रात सिड कपूर को उसकी अंतरात्मा का टेलीफोन आया. सिड यानी सिद्धार्थ कपूर हर रात की तरह उस रात भी एक बड़ी पार्टी... Read more
भारत में फैन की मूल डिजाइनिंग इस तरह की गयी है कि कांच के नन्हे गिलास के साथ उसका ज्यामितीय व्याकरण सही बैठ सके. उसे तनिक संकरे पैरेलैलोग्राम की आकृति में बनाया जाता है. प्रैक्टिकल बर्ताव की... Read more
हर साल फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार घोषित होता है. हर साल कलेजे पर लम्बे समय से चस्पां पुराना नासूर दुखने लगता है. विज्ञान और ख़ास तौर पर फिजिक्स को लेकर मेरे मन में बचपन से ही बड़ा उत्साह था ल... Read more
शैलेश मटियानी एक ही था
छुरी की धार तेज करता हुआ एक किशोर ग्राहक का इन्तजार कर रहा है. अभी अभी काटा गया बकरा लोहे की खूंटी से टांगा जा चुका है. भुनी हुई उसकी खाल के रोओं की दुर्गन्ध में ताजे रक्त और मांस की आदिम गं... Read more
हर घर की डिब्बा कथा
दशहरे के बाद घर में कई-कई दिन चलने वाली सालाना सफाई बताती है कि मनुष्य मूलतः डिब्बाप्रेमी प्रजाति है. गोपन-अगोपन अलमारियों, दराजों, दुछत्तियों और खाने-तहखानों से डिब्बों का निकलना शुरू होता... Read more
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