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कुतर्की समय में कुछ तार्किक बातें

यह 2011 साल का सितम्बर महीना था जब जबलपुर से निकलने वाली प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ ने दो दिन की सिनेमा कार्यशाला ‘प्रतिरोध का सिनेमा अभियान’ के साथ मिलकर आयोजित की थी. प्रतिरोध का सिनेमा की तरफ से मैंने और दस्तावेज़ी फ़िल्मकार संजय काक ने पांच सत्रों की कार्यशाला लगभग 100 प्रतिभागियों के साथ संपन्न की. इसमें सबसे रोचक और उत्तेजक सत्र वह था जब संजय काक ने कश्मीर में आजादी के मायनों की पड़ताल करती अपनी दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘जश्ने-आज़ादी’ दिखाई. हिन्दुस्तानी सरकारी दस्तावेज़ी सिनेमा के विपरीत यह फ़िल्म सच के कई पहलुओं को दर्शकों के सामने रखती है और उन्हंद कश्मीर में आजादी के बारे में स्वयं निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती है.

दस्तावेज़ी फ़िल्मकार संजय काक भारत में लोकतान्त्रिक आन्दोलनों पर इस फ़िल्म से पहले एक और दस्तावेजी फ़िल्म ‘पानी पर लिखा’ के नाम से नर्मदा आन्दोलन पर बना चुके थे. 2007 में रिलीज़ हुई 138 मिनट की फ़िल्म ‘जश्ने आज़ादी’ कश्मीर के मुद्ददे पर बनी भारत सरकार की सरकारी फिल्मों और विदेशी नजर से बनी बनावटी फिल्मों की बजाय संभवतया पहली फ़िल्म है जो कश्मीर में आजादी के मायनों को समझने की कोशिश खासे आजाद तरीके से करती है. जब हम जबलपुर में यह फ़िल्म दिखा चुके और बहस की शुरुआत की तो धीरे–धीरे माहौल गर्माता गया. सभागार में उपस्थित युवा प्रतिभागियों का एक समूह संजय काक द्वारा प्रस्तुत कश्मीर की आजादी की विभिन्न अवधारणाओं को सुनने के लिये भी राजी न था. जाहिर था कि उनमे से अधिकाँश युवाओं के पास कश्मीर के बारे में सूचनाओं का स्रोत मुख्यधारा के हिंदी अखबार थे जो भारत सरकार की लाइन को ही अक्षरशः अपनी लाइन मानते थे. बहस बढ़ने पर युवाओं ने ऐतिहासिक सच्चाइयों को भी स्वीकारने से इनकार कर दिया. एक चुनौती की तरह संजय काक ने उन्हें समझाने की कोशिश की. उनका सबसे ज्यादा जोर इस बात पर था कि आप अपने एकमात्र सूचना स्त्रोतों पर अंधभक्ति की बजाय दूसरी बातों को भी तवज्जो दें.

समझाने और बहस करने का यह सिलसिला फ़िल्म की लम्बाई जितना ही खिंचा जो एक तरह से हमारी सिनेमा कार्यशाला की कामयाबी की तरफ ही इशारा कर रहा था . किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचे बिना ही समय की कमी के कारण दूसरे सत्र की घोषणा के साथ एक छोटा ब्रेक लिया गया.

ब्रेक के दौरान मैं भी सभागार से सटे पेशाबघर में फारिग होने के लिए पहुंचा. एक सुखद आश्चर्य के रूप में मैंने वहां जब उन युवाओं को यह कहते सुना कि ‘वैसे इस आदमी की बात में भी दम है, हम वाकई कुछ अखबारों के निष्कर्ष को ही क्यों अंतिम मानें’ और यह भी कि ‘हमें वाकई में सच को जानने के लिए कुछ और तर्कों को सुनना चाहिए’ तब मुझे गहरी आश्वस्ति हुई कि ठन्डे दिमाग से बहस को प्रस्तुत करना और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखना ही हमारी समूची मानवता को बचा सकेगा.

संजय जोशी पिछले तकरीबन दो दशकों से बेहतर सिनेमा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयत्नरत हैं. उनकी संस्था ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ पारम्परिक सिनेमाई कुलीनता के विरोध में उठने वाली एक अनूठी आवाज़ है जिसने फिल्म समारोहों को महानगरों की चकाचौंध से दूर छोटे-छोटे कस्बों तक पहुंचा दिया है. इसके अलावा संजय साहित्यिक प्रकाशन नवारुण के भी कर्ताधर्ता हैं.

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Sudhir Kumar

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