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चुपचाप समय काट लो

“तो हुआ यूँ कि प्रभु दत्तात्रेय के निर्देश पर चित्रगुप्त भगवान् ने श्रीमदभागवत में अमेंडमेंट कर चौबीस गुरुओं में पच्चीसवें गुरु ‘गर्दभ’ को जोड़ेने का प्रस्ताव इंद्र की सभा में प्रस्तुत कर दिया.
(Satire by Priy Abhishek)

इंद्र ने लार्ज वोदका टिकाते हुए कहा – नियमानुसार भगवान् विष्णु की पूर्व अनुमति आवश्यक है. तो लक्ष्मी मैया से अपॉइंटमेंट ले सभी क्षीरसागर में हाज़िर हो गए.

प्रभु ने प्रस्ताव पढ़ा, मुस्कुराये और कहा- चलिये कम से कम अब माँ कालरात्रि का समर्थन तो पक्का हुआ. हर आपदा- विपदा में वहीँ भागते थे आप लोग. और इस बहाने महादेव का भी आशीर्वाद बना रहेगा. तो घोषणा हो गई कि प्रभु दत्तात्रेय के निर्देशानुसार प्रभु विष्णु के अनुमोदन से श्रीमदभागवत के एकादश स्कंध में श्रीमान गर्दभ को पच्चीसवें गुरु के रूप में मान्यता प्रदान की जाती है. कॉपी टू माँ कालरात्रि.”

“अच्छा! फिर क्या हुआ ?”

“फिर जैसे ही ये खबर आई तो पश्चिम के कच्छ कानन और उत्तर के इटावा लायन सफारी कृत्रिम कानन में हर्ष व्याप्त हो गया. कच्छ कानन में सभी प्राणियों ने शेर के सामने गर्दभ को वन का राजा घोषित कर दिया. शेर बोला -‘ये साला हो क्या रा है बे ? हम शेर हैं. केसरी. हम हैं वन के राजा!’

चुप बे! तभी लकड़बग्घा बोला.”

“हैं..! फिर ?”

“फिर लोमड़ी, सियार, गीदड़, लकड़बग्घे सब ने मिल के शेर को अच्छे से कूटा.”

“फिर?”

“फिर मद भरी चाल से गधा आया और बोला- दिस इज़ कलयुग, एंड कलयुग बिलोंग्स टू द आसेस एंड द आस हो..”

“होल्स?”

“होल्स नहीं!….ह्युमंस यार,आस ह्युमंस. फिर शेर जंगल छोड़ के जाने लगा. तभी उसे दूर से दो बछड़े आते दिखे.”
(Satire by Priy Abhishek)

“‘बछड़े?”

“पास आकर देखा वो बछड़े नहीं , शेर के भाई थे जो इटावा लायन सफारी में रहने गए थे. शेर ने कहा- आप तो कृत्रिम कानन में सुखपूर्वक रहने गए थे?

उन्होंने बताया- हमारा ट्रेवल एजेंट हमें छोड़ कर, सामान- सट्टा समेट कर लखनऊ द्रुतमार्ग पर भाग लिया. भयावह यमुना-चम्बल के उप-आद्र प्रदेश में भूखे प्यासे भटके. वहां हिरन, बकरी जैसों ने भी हमें पीटा. कोई सुनने वाला नहीं था. चम्बल के बाग़ी मिल गए. हमने कहा हमारे पास कुछ नहीं है. हम तो शेर हैं. उन्होंने कहा- जो तू सेर है तो हमउ सवा सेर हैं. कालिया, सांभा जाके बाल काट लेओ!  बासे झाड़ू बनाएंगे. भैया फिर उन्होंने अपने ओष्ठमुच्छ पर ताव देते हुए हमारी गलमुच्छ तक उड़ा डाली. जैसे तैसे यहाँ पहुंचे. शेर ने कहा- तो अब क्या करें? वे बोले- भैया, पक्ष, विपक्ष, संपक्ष सब जगह गर्दभ राज है. कहीं किसी कोने में चुपचाप समय काट लो. उसके बाद सभी जानवर उनपर पिल पड़े.”
(Satire by Priy Abhishek)

“फिर?”

“फिर क्या! पिताजी लातें मार रहे थे कि उठ, भोगी उठ! दस बज गए. ऑफिस नहीं जाना क्या.”

“बड़ा ही भयावह सपना था यार भोगीलाल.”

“हां प्रिय! सो तो है.”
(Satire by Priy Abhishek)

यां. पहले दो-चार बस में एक-आध कवि निकलता था. अब तो बसें की बसें कविओं से भर के आ रईं.”
(Satire by Priy Abhishek)

प्रिय अभिषेक
मूलतः ग्वालियर से वास्ता रखने वाले प्रिय अभिषेक सोशल मीडिया पर अपने चुटीले लेखों और सुन्दर भाषा के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में भोपाल में कार्यरत हैं.

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