हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पास एक गाँव में बसा है संभावना संस्थान . संभावना एक शैक्षणिक संस्थान है. पालमपुर नगर से संभावना परिसर की दूरी 8 किमी है. पिछले पांच सालों से हर साल संभावना संस्थान के परिसर में हिमालय जमा होता है, हिमालय एक पर्वत शृंखला नहीं एक जीवित युवा हिमालय.
भारत के सभी हिमालयी राज्यों के युवाओं के साथ ‘पहाड़ और हम’ कार्यशाला आयोजित करता है. इस कार्यशाला में भारत ही नहीं अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान के युवा भी भाग लेते हैं.
हिमालय जो कि विश्व की सबसे युवा पर्वत शृंखला है, उसके पहाड़ों में एक कहावत है कि ‘पहाड़ का पानी और जवानी कभी पहाड़ के काम नहीं’ आते. सुनने पर इसका सरल और सीधा मतलब लगता है कि पहाड़ों के युवा नौकरी के अवसर लिए और पहाड़ों का पानी नदियों के रास्ते यहां से मैदानी इलाकों चला जाता है – दोनों की ऊर्जा और उर्वरकता का फायदा किसी और को होता है. पर इस एक वाक्य में एक कहानी छुपी है – कुछ अपना खो जाने की. एक प्राकृतिक संसाधन और दूसरा मानव संसाधन.
एक तरफ तो यह हिमालयी इलाका अनोखी जैव विविधता ,संस्कृति और राजनीति की जन्म स्थली रहा है, वहीं दूसरी तरफ आज के दौर में यहां के युवाओं का अपनी भूमि से अलगाव बढ़ रहा है.
क्या हिमालय का इतिहास आज के पहाड़ी युवाओं द्वारा पूरी तरह से समझा गया है ? या वे भी आर्थिक दौड में फंस कर इस इलाके के स्वरूप के बदल जाने से अलग थलग हो जाते हैं ? संभावना, ‘पहाड़ और हम’ कार्यशाला के द्वारा पिछ्ले पांच सालों से इसी प्रयास में है कि अपनी सांझी और अनोखी सांस्कृतिक, सामाजिक और पारिस्थितिकीय ‘पहाड़ी’ विरासत को फिर से तलाशा जाये.
‘पहाड़ और हम’ कार्यशाला में 22 से 35 साल का हिमालय क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान ) में रहने वाला व्यक्ति जो सामाजिक कार्यों में जुड़ा है या ज़मीनी स्तर पर हिमालय से जुड़ना चाहता है, वह भाग ले सकता है.
‘पहाड़ और हम’ कार्यशाला में भाग लेने वाले उत्तराखंड के गौरव बिष्ट बताते हैं कि “पहाड़ और हम एक ऐसी सोच डेवलप करने की वर्कशाप है कि जिसमें अलग-अलग लोग जो पहाड़ो के मुद्दों के बारे में जानते तो हैं पर उसकी गहराई के बारे में उनको उस हिसाब से नहीं पता है. संभावना एक ऐसा मंच है जो सारे पहाड़ के मुद्दे और उनपे काम करने वाले जो अनुभवी लोग और समाजसेवी हैं उनके और युवा के बीच एक ब्रिज का काम करता है”
उत्तराखंड की ही रजनी बिष्ट कार्यशाला के अपने अनुभव के बारे में बताती हैं कि “ हमने यहां आकर सिखा की असली विकास क्या है? इसमें आकर जाना कि कैसे जंगल पेड़ नदी और हम सब कुछ कैसे एक साथ जुड़े हैं “
हिमांचल की पूजा बताती हैं कि “ संभावना में आकर मुझे पता चला आज दुनिया में लड़कियों की हालत क्या है? हमने जाना कि साथ में रहकर कैसे महिला और पुरुष एक मजबूत समाज खड़ा कर सकते हैं.”
2019 में भी फरवरी 16 से फरवरी 23 के बीच में पालमपुर में ‘पहाड़ और हम’ कार्यशाला का आयोजन होना है. इस वर्ष अनिकेत आलम, मानशी आशर, अमित कुमार, विमला विश्वप्रेमी और सुखदेव विश्वप्रेमी व प्रकाश भंडारी एक बार फिर से हिमालय के युवाओं को एक धागे में बांधने का प्रयास कर रहे हैं.
अनिकेत आलम एक इतिहासकार हैं और IIT हैदराबाद में पढ़ाते भी हैं. “बिकमिंग इंडिया : वेस्ट्रन हिमालय अंडर ब्रिटिश रूल” पुस्तक भी अनिकेत आलम ने लिखी है. मानशी आशर एक सामजिक कार्यकर्ता हैं जो जल, जंगल और जमीन के मुद्दों पर 2 दशक से काम कर रही हैं. अमित कुमार श्रीनगर के अमर सिंह कालेज में इतिहास विभाग में पढ़ाते हैं. विमला विश्वप्रेमी और सुखदेव विशवप्रेमी दलित अधिकारों, भूमि अधिकार, महिला सशक्तिकरण वह राजनितिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर हिमाचल प्रदेश में कार्य कर रहे हैं. प्रकाश भंडारी पर्यावरणीय न्याय के मुद्दों पर कार्य कर रहे हैं.
-काफल ट्री डेस्क
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