फोटो https://navinsamachar.com से साभार
मुजफ्फरनगर काण्ड को 25 बरस बीत गये हैं. अगले महीने उत्तराखण्ड पूरे 19 साल का जायेगा लेकिन वह उसी तरह न्याय के लिये के खड़ा मिलेगा जैसे 25 साल पहले था. प्रदेश के शहीदों को इन 25 सालों में न तो कभी न्याय मिला है और न ही अब इसकी कोई उम्मीद ही बची है. न्यायालय में एक-एक कर सभी मुकदमे समाप्त होते गये सभी आरोपी बरी होते गए. इसका मुख्य कारण आंदोलकारियों के पक्ष में कोई मजबूत पैरोकार का न होना था. हालत इतने ख़राब हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के तमाम नेता और इन मामलों के लिए नियुक्त किये गए वकीलों तक को यह जानकारी नहीं है कि आंदोलनकारियों के कितने मामले अभी लंबित हैं.
दो अक्टूबर 1994 के दिन उत्तराखंड के हजारों आंदोलनकारी पृथक राज्य की शांतिपूर्ण मांग के लिए दिल्ली जा रहे थे. एक अक्टूबर की रात को इन आंदोलनकारियों की सैकड़ों गाडि़यों को मुज़फ्फरनगर के रामपुर तिराहे के पास रोक लिया गया और तलाशी शुरू की गयी. जिसका विरोध करने पर आंदोलनकारियों का उत्पीड़न शुरू हुआ. लाठीचार्ज आंसू गैस के गोलों के साथ गोली से आंदोलकारियों को मौत के घाट उतारा गया. पुलिस ने कई आंदोलनकारी महिलाओं के साथ बलात्कार किया और कई लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी. दो अक्टूबर को हुए इस ‘रामपुर तिराहा कांड’ को देश में पुलिसिया बर्बरता की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक माना जाता है.
इलाहबाद हाईकोर्ट के आदेश पर जब इसकी सीबीआई जांच की गयी. 2 जनवरी 1995 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के समुख रिपोर्ट पढ़ी गयी. रिपोर्ट में सात महिलाओं के साथ पुलिस द्वारा सामूहिक बलात्कार की पुष्टि की गयी. सीबीआई ने अन्य 17 महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की पुष्टि की. सीबीआई ने कहा कि पुलिस और प्रशासन की मिलीभगत से महिलाओं की इज्जत पर हाथ डाला गया. सीबीआई ने बलात्कार के मामले में कई पुलिस अफसरों को दोषी ठहराया. रिपोर्ट में तीन महिलाओं के साथ बस में और बाक़ी चार के साथ खेतों में बलात्कार की पुष्टि हुई थी.
सांसदों के जांच दल को छोड़ दिया जाय तो सभी जांच रिपोर्टों में इस बात को खुल कर स्वीकार किया गया है कि पीएसी के साथ पुलिस के सिर पर हिंसा का भूत सवार था और राजनैतिक तौर पर बदला लेने के और मासूम स्त्रियों और निहत्थे आदनोलानकारियों पर बेरहमी से अत्याचार करने हेतु उन्हें उकसाया गया था.
उत्तराखंड को बनाने के लिए जिन लोगों ने बड़ी कुर्बानियां दीं उनके बारे में बातें करने वाले तो हजार हैं लेकिन न कोई उनकी लड़ाई लड़ने वाला रहा न उनके बारे में सोचने वाला.
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