आज हम जिस शांत और सुरम्य पिथौरागढ़ जिले को देखते हैं, उसका इतिहास सदियों पुराना और बेहद रोमांचक रहा है. कत्यूरी राजाओं के वैभव से लेकर अस्कोट के पाल राजाओं और सिरा के मल्ल राजाओं के संघर्षों तक, इस सीमांत क्षेत्र ने कई ऐतिहासिक साम्राज्यों का उत्थान और पतन देखा है. 1979 के आधिकारिक गजेटियर के अनुसार, आइए जानते हैं पिथौरागढ़ के इस गौरवशाली प्राचीन सफर को.
पिथौरागढ़ क्षेत्र का सबसे पहला जिक्र लोक-कथाओं और हमारे पौराणिक ग्रंथों में मिलता है. स्कंदपुराण के ‘मानसखंड’ में इस क्षेत्र की पवित्र नदियों, घाटियों और कैलाश-मानसरोवर जैसे ऊँचे पर्वतों का पूरे सम्मान के साथ वर्णन किया गया है.
अगर यहाँ के सबसे पहले निवासियों की बात करें, तो इस पहाड़ी क्षेत्र पर सबसे पहले ‘किरात’ (Kiratas) जनजाति का राज था. इन्हें यहाँ का आदि-निवासी माना जाता है. समय के साथ यहाँ ‘खस’ (Khasas) और अन्य जनजातियाँ भी आकर बसीं, जिन्होंने इस सुंदर घाटी की प्रारंभिक सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था की नींव रखी.
पिथौरागढ़ और पूरे कुमाऊं क्षेत्र के प्रामाणिक इतिहास की शुरुआत कत्यूरी राजवंश (Katyuri Dynasty) के साथ होती है. कत्यूरी राजाओं ने एक बहुत बड़े साम्राज्य पर राज किया था. शुरुआत में उनकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) थी, जिसे बाद में उन्होंने अल्मोड़ा की कत्यूर घाटी (बैजनाथ) में स्थानांतरित कर दिया था.
इस शक्तिशाली साम्राज्य के दौरान पिथौरागढ़ का पूरा इलाका उनके सीधे नियंत्रण में था. कत्यूरी शासक अपनी धार्मिक सहिष्णुता और कला-प्रेमी स्वभाव के लिए जाने जाते थे. इसी दौर में पिथौरागढ़ में भव्य शिव और विष्णु मंदिरों का निर्माण हुआ और वास्तुकला को एक नई ऊँचाई मिली.
11वीं और 12वीं शताब्दी के आते-आते केंद्रीय कत्यूरी सत्ता कमजोर होने लगी. नतीजा यह हुआ कि यह विशाल साम्राज्य कई छोटी-छोटी शाखाओं में टूट गया. इसके बाद पिथौरागढ़ के अलग-अलग हिस्सों में कई स्थानीय राजवंशों का उदय हुआ, जिनमें से तीन प्रमुख थे:
उस प्राचीन काल में सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा थी. इसलिए राजाओं और स्थानीय सामंतों ने ऊँची-ऊँची पहाड़ियों पर ‘कोट’ (मजबूत किले) बनवाए थे, जहाँ से पूरे इलाके पर नजर रखी जाती थी और शासन चलाया जाता था.
इसके अलावा, इतिहास हमें बताता है कि ये राजा धार्मिक कार्यों में गहरी रुचि रखते थे. तालेश्वर, गंगोलीहाट और सोर घाटी के कई प्राचीन मंदिरों के लिए राजाओं ने बड़ी मात्रा में भूमि दान (जिसे गुंठ भूमि कहा जाता था) दी थी, जिसका प्रमाण हमें उस दौर के ताम्रपत्रों (Copper Plates) और प्राचीन अभिलेखों से मिलता है.
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