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रानी विक्टोरिया से इंसाफ मांगने लंदन पहुंचने वाली अवध की रानी ‘मल्लिका-ए-किश्वर’

1857 में ग़दर के साल एक भारतीय महिला ब्रिटेन की खबरों में छाई रही. अगस्त 1856 में उसके कलकत्ता में पानी के जहाज पर चढ़ने के साथ ही वह ब्रिटिश दैनिक अख़बारों की खबरों का हिस्सा हो चुकी थी. अगले एक साल वह लगातार ब्रिटेन के अख़बारों की सुर्ख़ियों में रही. मौसम के हिसाब से अपने महल बदलने वाली इस भारतीय महिला के बारे में कहा गया कि उसने अपनी जिन्दगी में एकबार इस्तेमाल कपड़े कभी दुबारा नहीं पहने. इतिहास के पन्नों से गायब यह महिला और कोई नहीं अवध की रानी ‘मल्लिका-ए-किश्वर’ थी.      

मल्लिका-ए-किश्वर अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की मां थी. डलहौजी ने जब अवध को भी अपने कब्जे में कर लिया तो मल्लिका-ए-किश्वर ही वह महिला थी जिसने जेम्स अट्रम के साथ मिलकर सुलह करने की कोशिश की. मल्लिका-ए-किश्वर की सुलह से पहले ही वाजिद अली शाह अंग्रेजों की संधि ठुकराकर ससम्मान कलकत्ता जाने को तैयार हो चुके थे. परिवार में तय हुआ ब्रिटिश गवर्नर जनरल के इस फरमान की शिकायत सीधा ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया से की जाय. मल्लिका-ए-किश्वर और वाजिद अली शाह की ब्रिटेन की यात्रा के लिये तैयारियां शुरु हुई.

बदकिस्मती से कलकत्ता पहुंचने तक वाजिद अली शाह की तबियत ख़राब हो गयी. वाजिद अली शाह की हालत ऐसी न रही की वह ब्रिटेन की लम्बी यात्रा कर सकें. अब सबकुछ मल्लिका-ए-किश्वर पर था. मल्लिका-ए-किश्वर ने रानी विक्टोरिया के लिये तोहफों से भरा एक बक्सा जहाज पर चढ़वाया और बिना वाजिद अली शाह के ही एक बड़े शाही दल के साथ इस लम्बी यात्रा पर निकल गयी.

कहते हैं कि इस बक्से में मल्लिका-ए-किश्वर ने रानी विक्टोरिया को तोहफ़े में देने के लिये चांदी की थाली में रखे तीस हजार रूपयों के सिक्कों के साथ अनेक अंगूठियां और कीमती पोशाकें रखी थी. बक्से की कुल कीमत उस समय के पचास हजार पाउंड आंकी गयी थी. किस्मत ने एक बार फिर अपना खेल खेला, मल्लिका-ए-किश्वर का यह बक्सा स्वेज नहर के पास समुद्र में कहीं गिर गया.

उधर इंग्लैंड में मल्लिका-ए-किश्वर के पहुंचने से पहले ही ब्रिटेन का तत्कालीन मीडिया रानी की भव्यता का दीवाना हो चुका था. मल्लिका-ए-किश्वर और उनका पूरा दल साउथहैमटन के सबसे बड़े होटल रॉयल यॉर्क में ठहरा. साउथहैमटन के इस सबसे बड़े होटल में अगले 10 दिन केवल मल्लिका-ए-किश्वर और उनका पूरा दल रुका हुआ था. इन दस दिनों में रानी ने इतनी मोटी रकम खर्ची की अगले एक साल ब्रिटेन का रानी और उसके शाही दल का पिछलग्गू बन गया. रानी और उसके शाही दल को लेकर छपने वाली खबरों और अफवाहों में ब्रिटेन का पाठक भी खूब रुचि लेता.

मसलन इंग्लैण्ड में मल्लिका-ए-किश्वर की पहली सार्वजनिक यात्रा को ब्रिटेन की मीडिया ने प्रमुखता से छापते हुये लिखा- भारत की रानी हमेशा परदे में रहती है. अपनी ट्रेन से यात्रा के दौरान उसके शाही दल ने स्टेशन मास्टर से आम लोगों के लिये ट्रेन के स्टेशन को बंद किये जाने की को कहा जिसे स्टेशन मास्टर ने विनम्रता से नामंजूर कर दिया. रानी के शाही दल ने स्टेशन में कपड़ों की दीवार से एक लम्बा गलियारा बना दिया. रानी ने अपनी पूरी ट्रेन यात्रा इस गलियारे से होकर ही पूरी की.

इधर अगले कई महीनों तक मल्लिका-ए-किश्वर को रानी विक्टोरिया से मिलने के लिये इंतजार करना पड़ा. रानी विक्टोरिया से मिलने के लिये मल्लिका-ए-किश्वर को बड़े जतन करने पड़े. सीधे रास्ते से जब बात न बनी तो उन्होंने बहुत से रूपये खर्च कर भी मुलाक़ात की कोशिश की. पर बात न बनी. बाद में 1857 के गदर ने तो हालात ऐसे कर दिये थे कि रानी विक्टोरिया और मल्लिका-ए-किश्वर की मुलाक़ात नामुमकिन लगने लगी थी.

भारत में 1857 के गदर में अवध की बेगम हजरत महल की भूमिका के चलते इंग्लैण्ड की मीडिया में अफ़वाह उड़ी कि मल्लिका-ए-किश्वर एक जासूस के तौर पर इंग्लैण्ड भेजी गयी हैं. बेगम हजरत महल और मल्लिका-ए-किश्वर के बीच की नजदीकियों के कारण एक अफ़वाह के अनुसार मल्लिका-ए-किश्वर रानी विक्टोरिया से मुलाक़ात के दौरान उसका कत्ल करने वाली हैं.

लम्बे अरसे तक एक बड़े दल के साथ रहने के चलते एक समय ऐसा भी आया जब मल्लिका-ए-किश्वर ने अपने दल के लोगों के खाने और रहने का खर्च निकालने के लिये अपने गहने और कपड़े इंग्लैण्ड की बाज़ार में बेच दिये. आखिर में 4 जुलाई 1857 के दिन रानी विक्टोरिया और मल्लिका-ए-किश्वर की एक छोटी सी मुलाक़ात हुई. रानी विक्टोरिया ने इस मुलाक़ात के बारे में लिखा है-

दोपहर के खाने बाद अवध की रानी से मुलाक़ात हुई. इस बात का इंतजाम करने में बड़ी मुश्किलात हुई कि कोई आदमी उनकी ओर न देख सके. मल्लिका-ए-किश्वर ने अपना पर्दा उठाया और मेरा हाथ चूमा, ऐसा ही उसके पोते ने भी किया…        

ब्रिटिश मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अपने बीमार उपनिवेशी दिमाग के चलते पहले दिन से भारतीय रानी की इस भव्यता को पचा नहीं पा रहा था. ब्रिटेन के अखबारों में आये दिन रानी और उसके दल के कार्टून बनते या रानी और उसके दल पर तीखे व्यंग्य लिखे जाते. दावा किया जाता है कि ‘पंच’ जैसी मैगजीन में रानी विक्टोरिया और मल्लिका-ए-किश्वर की इस मुलाकात पर आधारित एक भी कार्टून छपा. रानी विक्टोरिया के सामने चोली-लहंगा पहने अपने घुटनों पर बैठी बेहद दयनीय स्थिति में एक महिला का यह कार्टून आज भी मौजूद है जिसे ‘पंच’ ने 1858 में छापा था.

खैर, रानी विक्टोरिया से मुलाक़ात के बाद मल्लिका-ए-किश्वर को समझ आया कि रानी विक्टोरिया के हाथों के बजाय असल ताकत ब्रिटिश संसद के हाथों में है. रहे-सहे पैसों से उसने ब्रिटेन की संसद में भी गुहार लगाई लेकिन ब्रिटिश संसद ने मल्लिका-ए-किश्वर के सभी दावों को झूठा बताकर उनकी एक न सुनी. अब जब मल्लिका-ए-किश्वर के हारकर लौटने का समय था तो ब्रिटिश संसद ने एक और गंदा खेल खेला.

मल्लिका-ए-किश्वर, मक्का-मदीना होकर भारत लौटना चाहती थी जब उन्होंने इसके लिये तैयारियां शुरु की तो ब्रिटेन की सरकार ने उन्हें यह कहकर जाने से रोक दिया कि यदि वह मक्का-मदीना होकर भारत लौटना चाहती हैं तो उन्हें ब्रिटेन के नागरिक की हैसियत से जाना होगा न कि अवध की रानी. मक्का-मदीना जाने के लिये रानी को ब्रिटेन का पासपोर्ट बनाने के आदेश हुये. मल्लिका-ए-किश्वर ने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया और किसी तरह फ़्रांस के प्रतिनिधियों से बात-चीत कर पेरिस रवाना हो गयी. पेरिस में ही मल्लिका-ए-किश्वर की मौत भी हुई. कुछ दिनों बाद यात्रा में उनके साथ गये एक बेटे और पोती की भी मौत हो गयी. तीनों को पेरिस कुछ वर्ष पूर्व जब रानी के परिवार की पांचवी पीढ़ी के वंशज शब-ए-बारात के मौके पर कब्र पर गये तो कब्र ढूंढने में उन्हें पूरे दो दिन लगे.

–गिरीश

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