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गढ़वाल की पांडव लीला

गढ़वाल की एक विस्तृत लोक धार्मिक परंपरा का नाम है पांडव नृत्य. पांडव नृत्य ही ‘पांडव लीला’ भी कहा जाता है. पांडव लीला गढ़वाल की एक विस्तृत अनुष्ठानिक परंपरा है, जो कई दिनों तक चलती है. उत्तराखंड राज्य की गढ़वाल कमिश्नरी में मंदाकनी घाटी के ऊपर ऐसे कई सारे गांव हैं, जहां कार्तिक से मंगसीर महीने के बीच पांडव लीला होती है. गढ़वाल में पांडव कथा खेतों, जंगलों, मंदिरों और नृत्य मंडलों में सांस लेती है. इस बहु-दिवसीय अनुष्ठानिक परंपरा में नृत्य, गायन, कथा-वाचन और देव-अवेश सम्मिलित होते हैं.

ढोल दमाऊँ, हुड़का और लोक गायन के साथ यह आयोजन कई दिनों तक चलता है जिसमें गाँव के पुरुष पांडवों, द्रौपदी, कुंती, कृष्ण आदि पात्रों का अभिनय और नृत्य करते हैं. पांडव नृत्य में कुंती और द्रौपदी दो अत्यंत महत्वपूर्ण स्त्री पात्र हैं। कुंती मातृत्व, संयम और नैतिकता की प्रतीक हैं, जबकि द्रौपदी को काली के रूप में देखा जाता है—उग्र, शक्तिशाली और कभी कभी रक्त बलि से जुड़ी हुई. अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर केवल पौराणिक नायक नहीं, बल्कि साहस, सम्मान और युद्ध नीति के आदर्श हैं.

गांव वाले मानते हैं कि इसमें ख़ुद पांडव देवताओं का अवतरण होता है और यह नृत्य गाँव की समृद्धि, पशुधन की रक्षा और रोगों से मुक्ति के लिए जरूरी है. कई बार महामारी या आपदा के बाद भी मन्नत के रूप में पांडव लीला करायी जाती है. प्रोफ़ेसर डी. आर. पुरोहित का कहना है कि पांडवों के इस क्षेत्र में पूजित होने का एक कारण है कि उनकी आखिरी यात्रा स्वर्गारोहिणी के रूप में यहां से की गयी थी. वो कहते हैं कि यहां के ग्रामीण पांडवों की छत्र छाया में रहते आये हैं और उनकी सामजिक समृद्धि इन वीर योद्धाओं की कृपा के स्वरूप में है.  

इतिहासकार डॉ. अजय रावत अपनी किताब उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास में प्रोफ़ेसर पुरोहित के हवाले से लिखते हैं कि अगस्त्यमुनि, सिल्ला, कालीमठ, रांसी  और फाल्सी गावों में दो महीने के लम्बे समय के लिये महाभारत की नृत्य नाटिकाओं का आयोजन किया जाता था. त्यूरी, मैखंडा, जामू, खरिया, सेर्सी, बदासू, त्रिजुगीनारायण, जल मल्ला और तल्ला गांवों में महाभारत संबंधी नृत्य नाटिकाओं का सांगीतिक प्रस्तुतिकरण जन्माष्टमी में होता है. पांडव लीला कई गावों में अत्यधिक लोकप्रिय है और कुछ विभिन्नताओं के साथ टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून जिलों में शीतकालीन महीनों में मंचित की जाती है.          

गढ़वाल में महाभारत की कथाएँ संस्कृत ग्रंथ से हूबहू नहीं ली गयीं, बल्कि लोक स्मृति और भूगोल से जुड़कर बदली हुई हैं. पांडवों का जन्म पांडुकेश्वर में माना जाता है, वनवास के प्रसंगों को स्थानीय घाटियों, झीलों और पर्वतों से जोड़ा जाता है और स्वर्गारोहिणी पर्वत को पांडवों के अंतिम पथ के रूप में देखा जाता है. यहां सबसे ज्यदा ध्यान देने वाली बात ये है कि इस परंपरा में कलाकार और दर्शकों के बीच स्पष्ट विभाजन नहीं होताहै. पूरा गांव किसी न किसी रूप में इसमें सहभागी होता है, जिससे यह आयोजन एक सामुदायिक कर्मकांड का रूप ले लेता है.  

गढ़वाल में ‘पांडौ नचौना’ यानि पांडवों के नाचने के इस अनुष्ठान की ख़ास बात यह है कि इसमें पांडवों की कोई मूर्ति नहीं होती है. धनुष, बान, भाले और चक्र आदि ही इसमें पूजे जाते हैं. हनुमान, युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम आदि का अवतरण मानव शरीर में होता है. मानवशास्त्री William Sax अपनी किताब Dancing the Self में यह स्थापित करते हैं कि पांडवलीला को केवल लोकनाट्य, नृत्य-नाटिका या धार्मिक उत्सव के रूप में देखना इस परम्परा की गहराई को कम कर देना होगा. वह इसके प्रस्तुतीकरण को नाटकीय अभिनय के बजाय दैवी अवतरण अधिक मानते हैं.

गढ़वाल में होने वाली इस पांडव लीला का एक सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसमें होने वाला पांडवों का श्राद्ध है. गढ़वाल की पांडव लीला पर दीर्घकालिक शोध करने करने वाले प्रोफेसर डी. आर. पुरोहित अपने एक व्यख्यान में कहते हैं कि गढ़वाल में जहां-जहां पांडव लीला होती है वहां गैंडा वध परम्परा को निभाया जाता है. इसमें वह पांडवों का तर्पण उसी तरह करते हैं जैसे श्राद्ध कर्म के दौरान किया जाता है. यह इस बात की पुष्टि करता है कि गढ़वाल के लोग स्वयं को पांडवों का वंशज मानते हैं.    

गढ़वाल में होने वाली पांडव लीला में स्थानीयकरण के माध्यम से महाभारत एक ‘बाहरी कथा’ न रहकर समुदाय की अपनी कथा बन जाती है. इस तरह पांडव लीला केवल संस्कृत महाभारत कथा नहीं रहती, बल्कि वह गढ़वाल के उन लोगों की स्थानीय समझ का हिस्सा बन जाती है जो उसमें भाग लेते हैं. गढ़वाल की पांडव लीला एक गहन शोध का विषय है एक ऐसा शोध जिसमें अधिक से अधिक स्थानीय लोगों का प्रतिनिधित्व हो. पांडव लीला के धार्मिक महत्त्व को साथ में रखते हुये इस पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी शोध की आवश्यकता है. यह कोशिश जरूर की जानी चाहिये की पांडव लीला के माध्यम से हम गढ़वाल की भूमि के चिन्हिंत स्थानों को विश्व स्तर पर महाभारत के ऐतिहासिक स्थल के रूप में स्थापित कर सकें.  

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