फोटो: कमलेश जोशी
मैं पर्यटन स्थलों को छोड़कर, उत्तराखंड के आंतरिक ऐसे किसी पहाड़ी गांव में नहीं गया था जहां पलायन को इतना करीब से देखा हो. अपनी पिछली यात्रा के दौरान मैं चंपावत जिले के पाटी ब्लॉक में रीठा साहिब से 14-15 किलोमीटर दूर स्थित गांव डाबरी पहुँचा. डाबरी, रीठा साहिब से पैदल मार्ग पर लगभग 4-5 किलोमीटर दूर घाटी पर स्थित है. नए बने मोटरमार्ग से आप गांव की तलहटी तक तो आसानी से पहुँच सकते हैं लेकिन गांव तक पहुँचने के लिए आपको लगभग डेढ़ किलोमीटर पैदल ऊबड़-खाबड़ ट्रैक से होकर गुजरना पड़ता है. इस नए बने मोटरमार्ग पर दिनभर में कुछ चुनिंदा ट्रैकर चलते हैं जिन्हें फोन करके पहले से सूचित करना होता है कि अमुक तारीख या दिन को कुछ सवारियां गांव से तराई की तरफ जाएँगी या फिर तराई से ऊपर गांव की तरफ आएँगी. अन्यथा निजी वाहन के अलावा पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है जिससे आसानी से यात्रा की जा सके. (Migration from Dabri village of Champawat)
ग्राम सभा परेवा में स्थित गांव डाबरी सन 1985 तक एक भरापूरा सम्पन्न गांव था. गांव में रहने वाले श्री हेम चन्द्र टिटगांई जी बताते हैं कि उस समय तक गांव में लगभग 12-15 परिवार रहते थे. जिनकी आजीविका मुख्यत: कृषि पर निर्भर थी. डाबरी की भूमि कृषि के लिए बेहद उपजाऊ हुआ करती थी. पानी की भरपूर सुविधा के चलते गेहूं, भट्ट, गहत व स्वींट की दाल, मंडुवा, गडेरी, मिर्च, संतरा, अखरोट आदि फसलें प्रमुखता से हुआ करती थी. गांव में सिंचाई के लिए बनीं नालियॉं आज खुद में झाड़-झंकाड़ समेटे हुए हैं. कभी जो खेत फसलों से लहलहाते थे आज बंजर पड़े हुए हैं. दूर तक नजर दौड़ाने पर सीढ़ीनुमा खेतों में सिर्फ घास ही घास नजर आती है. जगह-जगह दिखने वाले लूट (जानवरों के लिए इकट्ठा किया गया घास) अब दो-चार ही नजर आते हैं.
टिटगांई जी आगे बताते हैं कि मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते लोग यहॉं से पलायित होने को मजबूर होने लगे. बच्चों की शिक्षा व रोजगार की कमी पलायन के प्रमुख कारणों में अग्रणी रहे. गांव से 2 किलोमीटर दूर आमलिंग में जूनियर हाईस्कूल है जिसके हालात बच्चों की कमी के चलते बहुत अच्छे नहीं हैं. इंटर तक की शिक्षा के लिए छात्रों को गांव से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर चौड़ापिता (रीठा साहिब) जाना होता जो पैदल छात्रों के लिए अपने आप में दूभर था और आज भी है.
प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र भी गांव से लगभग 12-15 किलोमीटर दूर चौड़ा मेहता में है. अगर कभी कोई आपातकालीन स्थिति पैदा हो जाए तो अस्पताल तक पहुंचना ही अपने आप में सबसे कठिन है. मरीज को पैदल मार्ग से ले जाने के अलावा कोई ऐसा दूसरा विकल्प नहीं है जिससे जल्द से जल्द अस्पताल ले जाया जा सके और यह स्थिति अगर रात में पैदा हो जाए तो जंगली जानवरों के डर के चलते सुबह तक का इंतजार करना मजबूरी है. अन्यथा कई बार गांव वाले जोखिम उठाकर रात में भी मरीज को अस्पताल ले जाने को मजबूर हो जाते हैं. प्राथमिक चिकित्सालय भी कंपाउंडरों के भरोसे ही चलता है जहां प्रमुख डॉक्टरों की कमी है. मरीज की गंभीरता को देखते हुए कई बार उसे चंपावत या हल्द्वानी रेफर कर दिया जाता है. (Migration from Dabri village of Champawat)
1985 के बाद से अपने बच्चों की शिक्षा व रोजगार की तलाश के चलते अधिकतर परिवार अपना घर-बार व खेती-बाड़ी छोड़कर ऊधम सिंह नगर में जाकर बस गए. पलायन एक कटु सत्य है लेकिन इसी पलायन ने डाबरी से पलायित परिवारों व उनके बच्चों को नए अवसर प्रदान किये. कुछ बुजुर्ग माता-पिता गांव में सिर्फ इसलिए हैं कि वो शहरों में रह रहे अपने बच्चों को समय-समय पर घी, सब्ज़ियाँ, दालें, फल आदि भेजकर उनकी बाजार पर निर्भरता को थोड़ा कम कर सकें. आज की तारीख में डाबरी में मात्र तीन परिवार बचे हैं जिनके सदस्यों को आप उंगलियों में गिन सकते हैं.
ये परिवार जहां आज भी खेती कर रहे हैं वहां संतरे, मिर्च, गडेरी, भट्ट की दाल, आलू आदि भरपूर मात्रा में पैदा होता ही है लेकिन जंगली सुअर, बंदर व लंगूर से फसलों को बचा पाना सबसे कठिन काम है. तैयार फसल की निगरानी के लिए इंसान के साथ-साथ पालतू कुत्तों का होना बहुत जरूरी है अन्यथा जानवर फसलों की बेतरतीब बर्बादी कर देते हैं. तैयार फसल व पके संतरों को देखकर लगता तो है कि कितनी शानदार फसल हुई है लेकिन उस शानदार फसल के पीछे की मेहनत को समझ पाना उतना ही कठिन है.
पलायन का दर्द ऐसा है कि दीवाली के बाद दूतिया त्यार के दिन अपने बच्चों व नाती पोतों के गांव न आ पाने की मजबूरी के चलते बुजुर्ग फौजी केशव दत्त टिटगांई व उनकी पत्नी ने बच्चों की पुरानी फोटो पर ही च्यूढ़े का तिलक कर के त्यौहार मनाया. बच्चों के बाहर रहने के कारण इन बुजुर्गों को देखने वाला कोई नहीं है. बूढ़ी टॉंगें भी कब तक लट्ठी के सहारे पहाड़ों को नापेंगी. फौजी साहब कहते हैं कि इस बुढ़ापे में गांव में अकेले रह पाना बहुत मुश्किल है. बस कुछ समय बाद हम भी सब छोड़ के हरिद्वार बच्चों के पास ही चले जाएँगे. (Migration from Dabri village of Champawat)
मात्र तीन घरों से आबाद यह गांव श्री भैरव दत्त टिटगांई, श्री हेम चन्द्र टिटगांई, फौजी केशवदत्त टिटगांई व उनकी पत्नियों के कंधों पर टिका है. उन्हें और गांव के हालात देखकर लगता है कि यह आखिरी पीढ़ी है जो गांव में रहेगी. इनके बाद बाकी सब गांव वाले आज ही की तरह बाद में भी सिर्फ अपने इष्टदेव की पूजा के लिए गांव आया करेंगे. इन तीन आबाद घरों में आज भी किसी चीज की कमी नहीं है. जिस रहीशी व सम्पन्नता में ये तीन परिवार अभी रहते हैं ऐसी सम्पन्नता आपको मैदानी इलाकों में खोजने से भी नहीं मिलेगी. दिन भर खेतों में काम कर आज भी ये परिवार इतना सारा अनाज, फल व सब्जियॉं उगा लेते हैं कि उसे बाजार में बेच सकें. हर घर में गाय भैंसे आज भी हैं जिससे दूध, दही व घी की कोई कमी नहीं होती. कमी है तो सिर्फ खाने वालों की.
अपने पैतृक गांव को छोड़कर कौन जाना चाहता है. उत्तराखंड को बने 19 साल हो गए लेकिन डाबरी आज भी गांव तक सड़क का इंतजार कर रहा है. सरकार ने पलायन आयोग तो बना दिया लेकिन पलायित हुए लोगों को कैसे वापस उनके गॉंवों की तरफ आकर्षित किया जाए इसका अभी तक कोई रोड मैप तैयार नहीं है. पलायित लोगों को वापस आकर्षित करना तो दूर, सरकार आज तक पहाड़ों में फल व सब्जियॉं पैदा कर रहे किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तक तय नहीं कर पायी है. पहाड़ में पैदा होने वाले अनाजों के लिए कोई स्थापित मंडियॉं तक नहीं हैं जो लोगों को किसानी के लिए प्रोत्साहित कर सकें. पहाड़ में ऑर्गेनिक खेती के चर्चे बहुत हैं लेकिन इस तरह की स्कीम का पता डाबरी जैसे गॉंवों में किसी को नहीं है. (Migration from Dabri village of Champawat)
उत्तराखंड का युवा गॉंवों की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखता तो है लेकिन जब जमीनी हकीकत से रूबरू होता है तो उसे वो प्रदूषित दिल्ली ज्यादा अच्छी लगती है जो उसके परिवार के भरण पोषण का जरिया है. भावनात्मक रूप से हर कोई अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और अपने पैतृक गांव वापस जाने का सपना भी देखता है लेकिन देहरादून में बैठी सरकार दिल्ली के इतर कुछ देख ही नहीं पाती. सरकारों ने मैदानी क्षेत्रों से ध्यान हटाकर पहाड़ों की मूलभूत सुविधाओं की ओर ध्यान दिया होता तो आज पलायन आयोग बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. आती जाती सरकारें बस पलायन का रोना रोती रही हैं जिनसे पलायित होते लोग हर दिन सिर्फ गुजारिश करते रह जाते हैं.
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नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशीने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.
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पलायन पर चर्चा, "चर्चा" में रहने का आसान तरीका है सरकारों के लिए । बस इससे अधिक कुछ काम करना नहीं ।