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कुली बेगार आन्दोलन से पहले कुमाऊं परिषद

अमृतसर कांग्रेस के बाद के महीने अत्यन्त सक्रियता भरे थे. एक प्रकार से कुमाऊं परिषद के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस बीच ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन का असाधारण कार्य किया. जगह जगह परिषद् की शाखाएँ खुली. प्रचार सभाएँ आयोजित हुई. जिसमें स्थानीय तथा राष्ट्रीय ऐजेण्डे के मुद्दे प्रस्तुत किये जाते रहे. कुली ऐजेन्सियों का विरोध करते हुए बेगार को पूरी तरह उठाने की माँग की गई. कुमाऊं परिषद समाज सुधार में भी सक्रिय तथा अगुवा थी. परिषद् के प्रयासों से नैनीताल में ‘नायक सुधार समिति’ की स्थापना हुई, जिसकी पहली बैठक नवम्बर 1919 में नैनीताल में सम्पन्न हुई. आर्य समाज द्वारा सरकार को नायक बच्चों की शिक्षा तथा नायक समुदायों में आपस में विवाह हेतु प्रस्ताव पारित कर भेजा गया.

अब तक कांग्रेस में नरमपंथियों का प्रभाव घट गया था. कुमाऊं परिषद् में यह ज्यादा स्पष्टता से दृष्टिगोचर होने लगा था. 1920 का पूरा साल सघन सक्रियता भरा रहा. कुमाऊं गढ़वाल के जो जो इलाके कुमाऊं परिषद् के स्पर्श से वंचित थे, उनसे परिषद् का पहला परिचय इसी साल हुआ. इस समय राष्ट्रीय स्तर पर जनित सामाजिक ऊर्जा के प्रवाह के साथ स्थानीय स्तर पर संगठन सक्रियता और सहयोग गहनतम था. समाज के अब तक अविचलित हिस्से भी राष्ट्रवाद से प्रभावित हो रहे थे. 1920 में मोतीलाल नेहरू भी अलमोड़े आये. उनके सभापतित्व में वृहद सभा हुई और विदेशी कपड़ों की होली जली थी.

लक्ष्मी दत्त शास्त्री, हरगोविन्द पंत, बदरी दत्त पाण्डे, मोहन सिंह मेहता, मथुरादत्त त्रिवेदी, पूर्णानन्द जोशी, हरिदत्त बिष्ट तथा केशर सिंह सहित कुमाऊं परिषद् के दर्जनों वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने इस साल जगह जगह जनता को संगठित किया और परिषद् की शाखाएँ खोली. राष्ट्रीय तथा स्थानीय मुद्दों को एक कार्यक्रम के भीतर समेटने में भी कामयाबी मिली. 20 सितम्बर 1920 से मोहन जोशी ने इलाहाबाद से ‘क्रिश्चियन नेशनलिस्ट’ साप्ताहिक का प्रकाशन भी शुरू किया था. जिसके कुछ ही अंक निकले.

1920 में संयुक्त प्रांत में सर्वत्र बेगार विरोधी आन्दोलन चला हुआ था. कुमाऊं में बेगार आन्दोलन की आक्रामकता और इसके परिणामों को सरकार तब गंभीरता से नहीं ले रही थी.

इस प्रक्रिया की परिणति 20 से 23 दिसम्बर 1920 को काशीपुर में आयोजित कुमाऊं परिषद् के चौथे अधिवेशन में हुई. अधिवेशन के अध्यक्ष हरगोविन्द पंत थे और अधिवेशन पर असहयोग का ऊपर से तथा बेगार और वन आन्दोलन का नीचे से गहन असर था. पहली बार परिषद् का अध्यक्ष सरकार परस्त उदारपंथियों में से नहीं छाँटा जा सका, न ही वे प्रगतिशील युवकों की बातों / निर्णयों में परिवर्तन करा सके. हरगोविन्द पंत उस समय प्रगतिवादियों के प्रतिनिधि और प्रतीक थे, जो न सिर्फ कुली उतार को तुरन्त समाप्त करना चाहते थे और जंगलात की नीति में सुधार चाहते थे वरन् इन समस्याओं के साथ वे इस स्थानीय आन्दोलन को राष्ट्रीय संग्राम, असहयोग आन्दोलन – के साथ जोड़ना आवश्यक मानते थे.

उदारवादियों के अनेक प्रयत्नों के बावजूद असहयोग का प्रस्ताव पारित हुआ. अधिवेशन में तमाम प्रतिनिधियों ने खड़े होकर यह प्रतिज्ञा की कि वे अब कुली बर्दायश नहीं देंगे और इस कलंक को माथे से हटा देंगे. बेगार सम्बन्धी प्रस्ताव में बदरी दत्त पाण्डे ने कहा था.

“कुमाऊं नौकरशाही का दुर्ग है. यहाँ नौकरशाही ने सभी को कुली बना रखा है. सबसे पहले हमें कुमाऊं के माथे से कुली कलंक हटाना है तभी हमारा देश आगे बढ़ सकता है”

परिषद् के सरकार परस्त हिस्से ने अनेक प्रयत्न किये पर वे प्रगतिवादियों के निर्णय को नहीं बदल सके. अन्ततः उन्हें अपनी पराजय के साथ सभा स्थल ही छोड़ना पड़ा. हरगोविन्द पंत ने अपने भाषण में कुमाऊं के पीछे रहने के कारणों को बताते हुए कहा कि इसके पीछे सिर्फ कुमाऊं की राजनीतिक सुषुप्ति है. अधिवेशन में बेगार विरोध से जनित जनकष्टों के निवारण हेतु एक कोष की स्थापना का निर्णय भी लिया गया.

मोहनसिंह मेहता

इसी अधिवेशन में परिषद् की चामी (कत्यूर-बागेश्वर) शाखा के अध्यक्ष शिवदत्त पाण्डे, मंत्री रामदत्त तथा मोहन सिंह मेहता, केशवदत्त पाण्डे और श्यामलाल साह आदि ने परिषद् के प्रमुख नेताओं से बागेश्वर के मेले में आने का आग्रह करते हुए कहा कि वहाँ तब पहाड़ के कोने कोने से जनता एकत्रित होगी और प्रचार कार्य तथा बेगार के विरुद्ध सार्वजनिक निर्णय लेने में सरलता होगी. हरगोविन्द पंत, बदरी दत्त पाण्डे तथा चिरंजीलाल ने नागपुर से लौटकर बागेश्वर आने का विश्वास दिलाया. बदरी दत्त पाण्डे, हरगोविन्द पंत, चिरंजीलाल सहित 20-25 प्रतिनिधि काशीपुर से ही कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में शामिल होने के लिए गये. नागपुर कांग्रेस राष्ट्रीय कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण घटना थी. कांग्रेस ने नरमपंथियों से मुक्ति पाई थी और गरमपंथियों की सम्पूर्ण विजय हुई थी. लेकिन उत्तराखण्ड से नागपुर अधिवेशन में गये कार्यकर्ताओं का इस समय राष्ट्रीय से ज्यादा स्थानीय संघर्ष में ध्यान केन्द्रित था और उनका उद्देश्य मात्र कांग्रेस अधिवेशन में शामिल होना न था, वरन् वे महात्मा गाँधी से बागेश्वर आने का आग्रह करना चाहतें थे. गाँधी ने सिर्फ इतना कहा कि : मेरे कुमाउँनी भाइयों से कह दें कि कुली देना नहीं होता है.’ नागपुर में इन कार्यकर्ताओं की मुलाकात स्वामी सत्यदेव से हुई थी, उनसे भी बागेश्वर आने का आग्रह किया गया.

चिरंजीलाल

नागपुर से वापसी के बाद बेगार विरोधी पहली बड़ी घटना बागेश्वर संगम के करीब स्थित गाँव चामी में हुई, जहाँ 1921 के पहले दिन लगभग 400 ग्रामीण जन और स्थानीय कार्यकर्ता स्थानीय हरू मंदिर में एकत्रित हुए थे. इस सभा में शपथ ली गई थी कि कुली उतार नहीं दिया जायेगा और उत्तरायणी के अवसर पर बागेश्वर मेले में इस निर्णय में कुमाऊं की जनता को शामिल करने का आहवान किया जायेगा.

पिछली कड़ी कुमाऊँ परिषद के शुरुआती वर्ष

मशहूर पर्यावरणविद और इतिहासकार प्रोफ़ेसर शेखर पाठक द्वारा सम्पादित सरफरोशी की तमन्ना के कुछ चुनिन्दा अंश.

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Girish Lohani

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