कला साहित्य

मुल्क कुमाऊँ को ढुंगो ढुंगो होलो

लोकरत्न गुमानी पन्त के बाद जिस कुमाऊनी कवि का नाम आता है वह हैं कृष्ण पांडे. अल्मोड़ा जिले के पाटिया में जन्में कृष्ण पांडे के विषय में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं हैं. कृष्ण पांडे की कविताओं का संकलन उनकी मृत्यु के 50-60 वर्षों बाद पंडित गंगा दत्त उप्रेती द्वारा किया गया.
(Kalyug-An old Kumauni Satire)

गियर्सन कलयुग – अ स्पेसिमेन ऑफ़ कुमाऊनी लैंग्वेज (Kaliyug-A specimen of the Kumauni Language) में कृष्ण पांडे की कविताओं को संकलित कर उनका एक अनुमान आधारित परिचय देते हैं और उन्हें कमीश्नर ट्रेल का समकालीन मानते हैं. गियर्सन लिखते हैं कि अपनी कुछ कविताओं में उन्होंने नये शासकों पर जमकर हमला बोला. गियर्सन का मानना है कि कृष्ण पांडे की कविताओं में शासकों के प्रति आया यह विरोध देशभक्ति भाव के कारण नहीं था. कृष्ण पांडे की कविताओं का उदेश्य सरकार पर व्यंग कर अपने लोगों को हंसाना था.

कृष्ण पांडे की कविताओं में हिन्दू धर्म में माने जाने वाले नीति शास्त्र की झलक दिखती है. वह इस नीति शास्त्र को कुमाऊनी भाषा में रोचक अंदाज में कहते हैं. कृष्ण पांडे की उपलब्ध कविता को गियर्सन कलयुग एन ओल्ड कुमाऊनी सटायर (Kalyug-An old Kumauni Satire) नाम से प्रकाशित करते हैं. कृष्ण पांडे की इन कविताओं में न केवल उनके समय की सोच दिखती है बल्कि उस समय की एक झलक भी देखने को मिलती है.        
(Kalyug-An old Kumauni Satire)  

कलकत्ता बटि फ़िरंगि आयो।
जाल जमाल का बोजा बाँदि लायो।।01।।

लाट गवर्नल बाड़ बाड़ा भूप।
मुल्क लुटण मुणि अनेक रूप।।02।।

फ़िरंगि राजा कलि अवतार।
आपन पाप लै औरन मार।।03।।

फ़िरंगि राजै की अकल देख।
कूड़ि बाड़ि बेचि बेर इस्तब लेख।।04।।

पितला को टुकड़ा को चुपड़ास कियो।
मुल्क को सुनो रुपो लुटि लियो।।05।।

जाल धौलड़िया है गे देवान।
मुल्क उजड़ि गयो कै न्हाति फाम।।06।।

मुलुकिया यारो कलयुग देखो।
घरकुड़ि बेचि बेर इस्तीफा लेखो।।07।।

मुल्क कुमाऊँ में बड़ो भारि चैन।
नौ नालि ब्वे बेर छै नालि भैन।।08।।

द्वी माणा धान में धनुलि ऐंछ।
एक माणा मड़ुवा में मनुलि ऐंछ।।09।।

बामण मारों को यौ बड़ो ज्ञान।
मड़ुवा मानिर दिन घर घर चान।।10।।

तल घर खिमदा को बहड़ बिनार।
मलि घर गोपिदा की ज्वे लागि धार।।11।।

मुल्क कुमाऊँ में बड़ो भारि पाप।
घर कुड़ि बेचि बेर इष्टाम छाप।।12।।

किष्णा पाँडे ज्यू को लेखणा को काम।
हर नाम लीणा की नै रुनि फाम।।13।।

बद्री-केदार बड़ा भया धाम।
धर्म कर्म कि कै न्हाति फाम।।14।।

बद्री-केदार द्वी छन धाम।
कल जग ऐ गो कै न्हाति फाम।।15।।

पातर भौजि को बड़ो भारि ज्ञान।
घर कुड़ि ठगि बेर मुख नि बुलान।।16।।

मुल्क कुमाऊँ में कफुवा बासो।
ज्वे कन है गयो खसम को साँसो।।17।।

दिन परि दिन कलयुग आलो।
च्यालाका हाथ ले बाप मार खालो।।18।।

भाई-बिरादर घर-घर मार।
मुलुक कुमाऊँ में पड़ि गयो छार।।19।।

भाई-बिरादर घर-घर मार।
भद्याली ली बेर ज्वे लागि धार ।।20।।

बिलैती कपड़ौंक बणायो कोट।
रीण करी बेर घर कुड़ि चोट।।21।।

सौक्याण जै बेर आयो छ लूण।
घागरि दी बेर ज्वे न्हाति गूण।।22।।

मुलकिया लोगो कलि जुग सूण।
घागरि दी बेर ज्वे न्हाति गूण।।23।।

हौसिया यारौ कलि जुग सूण।
लता सेर दी बेर ज्वे न्हाति गूण।।24।।

एक गाँव का नौ छिया पधान।
गाँव बजीगयो कै के न्हाति फाम।।25।।

येक येक गौं का नौ नौ पधान।
ग्वाड़ बणौण कि कै न्हाति फाम।।26।।

गंगा में है-गोछ तुमड़िया तार।
भाइ बिरादर घर घर मार।।27।।

धर्म कर्म में पड़ि गोछ छार।
कौंणि झुंगरो बिन ज्वे लागि धार।।28।।

किष्णा पाँडे ले कलि जुग खोलो।
मुल्क कुमाऊँ को ढुंगो ढुंगो होलो।।29।।

मुलकिया यारौ हर नाम लीयौ।
ज्वे चेला बेचि बेर इष्टाम दियौ।।30।।

चार दिन मेरि भौजि भज राम राम।
हरनाम आलो परनाम काम।।31।।

मुलकिया लोगो हर नाम लीयौ।
किष्णा पाँडे ले कलि जुग कीयौ।।32।।

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