समाज

1850 तक एक भी पक्का मकान नहीं था हल्द्वानी में

दस्तावेजों में हल्द्वानी का जिक्र 1824 में मिलता है जब उस साल हैबर नाम का एक अंग्रेज पादरी बरेली से अल्मोड़ा जाते हुए यहाँ के बमौरी गाँव से हो कर गुजरा था. (Haldwani History Nineteenth Century)

हैबर ने लिखा है: “हम एक ऐसे इलाके में आ गए थे जहाँ पेड़ों ने नीचे से गाय-भैसों के छोटे छोटे समूह दिखाई दे रहे थे. हमारे साथ चल रहे लोगों ने हमें बताया कि हम बमौरी के नजदीक थे. यहाँ हमने जो आबादी देखी वह कुमाऊं के बाशिंदे खसिया लोग थे जो हर साल मैदानों में उतरा करते थे (*हैबर का यह कथन दिखाता है कि कुमाऊं के सामाजिक तानेबाने के बारे में तब उसकी जानकारी कितनी कम थी). ये लोग अपने मवेशियों को चराने और गेहूं-बाजरा उगाने के उद्देश्य से यहाँ आते थे और अप्रैल के आते-आते अपने घरों (पहाड़) को लौट जाते थे. इसके अलावा वे पहाड़ों से शहद और ऐसी ही चीजें लेकर आते थे जिन्हें बेचकर वे यहाँ से उन चीजों को खरीदते थे जो हिन्दुस्तान के केवल अधिक विकसित स्थानों पर ही मिला करती थीं.” (Haldwani History Nineteenth Century)

कुमाऊं के पहले कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल (1818-1835) ने लिखा है कि कुमाऊं पर अंग्रेजों के काबिज होने से पहले ही गौला नदी के आसपास न केवल सिंचाई की व्यवस्था थी, मल्ला-तल्ला बमौरी, बिठौरिया और फतेहपुर जैसे गाँव बसे हुए थे. इन गाँवों में भीमताल के आसपास रहने वाले सौन और हैड़ी लोग रहा करते थे. जान-माल की कोई सुरक्षा न थी. मेवाती डाकुओं के मुखिया को रिश्वत दे कर ही यहाँ रहना संभव था.

अंग्रेजों के आगमन के बाद पुलिस व्यवस्था में सुधार हुआ और रामगढ़ और आसपास के लगों ने भी यहाँ बसना शुरू किया. इन लोगों ने बमौरी, बिठौरिया, पन्याली और फतेहपुर में खेती करना शुरू किया . इसके उपरान्त मुखानी, तल्ली हल्द्वानी और कुसुमखेड़ा गाँव अस्तित्व में आये. इन इलाकों में पर्याप्त सिंचाई-जल था और कृषि के लिए पहाड़ से भाबर आने वालों की भीड़ भी न थी. खेती केवल जाड़ों में की जाती थी.

तब ऐसी ईमानदारी थी हल्द्वानी में

1837 में बैटन ने गौला नदी के दोनों किनारों पर पहाड़ की जड़ से करीब छः मील तक हरे-भरे खेत लहलहाते देखे थे.

1850 के बाद हैनरी रैमजे के शासनकाल में भाबर में नहरों और गूलों के निर्माण के विशेष प्रयास हुए. काठगोदाम के पास गौला नदी में एक बांध बनाकर गाँवों में अनेक नहरें पहुंचाई गईं.

हल्द्वानी के इतिहास के विस्मृत पन्ने: अंतिम क़िस्त

1834 से पहले भाबर की सबसे प्रमुख बस्ती मोटा हल्दू में थी. नई बस्तियों के अस्तित्व में आने के बाद ट्रेल ने इलाके में मंडी की कमी को पूरा करने के लिए हल्द्वानी में मंडी की स्य्थापना की.

1850 से पहले हल्द्वानी में केवल झोपड़ियां ही थीं. जलवायु भी अच्छी नहीं थी. जैसे ही जाड़ों की फसल कटती लोग पहाड़ों को लौट जाया करते. इस बीच आसपास के क्षेत्रों की सफाई और झाड़ियों के कट जाने से जलवायु में सुधार हुआ और हल्द्वानी भाबर के मुख्य केंद्र के रूप में विकसित होने लगा. 1850 के बाद यहाँ पक्के मकान बनने शुरू हुए.

(डॉ. किरन त्रिपाठी की पुस्तक ‘हल्द्वानी: मंडी से महानगर की ओर’ के आधार पर)

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