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हिमालयी क्षेत्रों में विकास के नाम पर जबरन शहरीकरण थोपा जाना कितना सही है

पिछले कुछ दशकों में हिमालयी क्षेत्रों में विकास के नाम पर जबरन शहरीकरण थोपा जा रहा है. शिमला, नैनीताल, दार्जिलिंग, गंगटोक आदि कुछ ऐसे शहरों के नाम हैं जो दिन पर दिन बदसूरत होते जा रहे हैं. इन सबका एक मुख्य कारण बाहरी लोगों द्वारा विकास की गड़ी परिभाषा है जिसमें चौड़ी सड़क, आलीशान बार और कैफे, बड़े-बड़े होटल्स, ब्रांडेड दुकानें और आई लव डैश-डैश जैसे भौंडे बोर्ड तक शामिल हैं. यह बेहद अहम सवाल है कि विकास के नाम पर जो कुछ पिछले तीन दशकों में हिमालयी क्षेत्र में काम किया गया है उसमें यहां के स्थानीय लोगों की कितनी राय ली गयी है? मसलन उत्तराखंड में बने ऑल वैदर रोड को ही लिया जाय.
(Exploitation of Himalaya)

धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर शुरू इस सड़क को बनाने से पहले क्या इस बात पर विचार किया गया कि जिन धार्मिक पर्यटक स्थलों तक इसे ले जाया जा रहा है वह छः माह तक तो स्वयं ही बंद रहते हैं. यहां बेहद महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इतने हजारों किमी को प्रभावित करने वाले इस बड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले स्थानीय जनता से किस प्रकार का राय मशविरा किया गया. यह दुखद है कि पर्यावरण किसी भी देश की सरकार के एजेंडे का आखिरी बिन्दु है पर क्या इस आखिरी बिन्दु पर सरकार द्वारा किसी प्रकार का आंकलन किया गया?

हिमालय के इतने बड़े भू-भाग को प्रभावित करने वाले इस प्रोजेक्ट के विषय में सरकार के पास एक भी भूवैज्ञानिक की रिपोर्ट नहीं है जो इस प्रोजेक्ट को सही ठहराती हो. इस प्रोजेक्ट के शुरू होने के बाद शायद ही कोई ऐसा हफ्ता गुजरा हो जब सड़क दुर्घटना में किसी की मौत न हुई हो.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब सरकार से पर्यावरण आंकलन संबंधित प्रश्न किये गये तो धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने जैसा हवाई तर्क देने के बजाय इसे सामरिक दृष्टिकोण से राष्ट्रहित में महत्वपूर्ण घोषित करार किया गया.  प्रोजेक्ट के लिये काटे गये पेड़ों के नुकसान की भरपाई के लिये सरकार ने नये पेड़ों के लिये राजस्थान और कर्नाटक में आवंटित जमीन का हवाला दिया गया.   इसके बावजूद कोर्ट ने सड़क की चौड़ाई कम करने संबंधित आदेश दिये लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. ऑल वैदर रोड एक उदाहरण है कि कैसे हिमालयी लोगों को सुनहरे सपने दिखाकर विकास के नाम पर जबरन शहरीकरण थोपा जाता है.
(Exploitation of Himalaya)

हिमालयी क्षेत्र के पुराने मन्दिर, जल स्रोत आदि में लगी टाइल्स इसी शहरीकरण का एक नमूना है. सालों पुराने हिमालयी स्थापत्य और कला को चमकीले टाइल्स से ढ़ककर विकास के कसीदे पढ़े जाते हैं. हिमालयी क्षेत्र में स्थित वनों पर स्थानीय अधिकार शून्य कर विकास के इस नये मॉडल ने यहां के पारम्परिक घरों के स्वरूप पूरी तरह बदल दिये हैं. सामाजिक सहभागिता हिमालयी क्षेत्र में जीवन का अभिन्न हिस्सा थी विकास के नये मॉडल में इसका भी कोई स्थान नहीं है.

एक नीति के तहत टूरिज्म को हिमालयी क्षेत्र में एकमात्र आय का साधन बताने के दुष्कर प्रयास में बाज़ार और सरकार सफ़ल रहा है. टूरिज्म को हिमालयी क्षेत्र में एकमात्र आय का साधन सिद्ध करने के लिये कैसे फिल्मों और सोशियल मीडिया का प्रयोग किया गया है इस पर अलग से बात की जानी चाहिये. चाहे वह टूरिज्म हो या टूरिज्म के नाम पर इको टूरिज्म, दोनों ने ही हिमालय से उसकी खूबसूरती और यहां रहने वालों से उनकी जमीन, पानी और उनके अधिकार छीन लिये हैं. हिमालय और यहां रहने वालों के कथित विकास के नाम पर टूरिज्म सेक्टर द्वारा हिमालय में सबसे ज्यादा गंदगी फैलाई जाती है इसका एक उदाहरण एवरेस्ट और उसका बेस कैम्प है. यह ‘टूरिज्म से आय’ की थोपी गयी अवधारणा ही है जिसने आज एवरेस्ट को दुनिया का सबसे ऊंचाई पर स्थित कूड़ाघर बना दिया. एवरेस्ट बेस कैम्प के पास बना दुनिया में सबसे ऊंचाई पर स्थित गट्टर विकास के नाम पर हिमालय पर जबरन थोपे गये शहरीकरण का ही एक परिणाम है.
(Exploitation of Himalaya)

नोट- यह पोस्ट हिमालयी क्षेत्र की आवाज के रूप में कार्य कर रही संस्था Kastura Echoes of Himalaya के फेसबुक पेज से ली गयी है.

इसे भी पढ़ें: हिमालयी विकास मॉडल और उनसे जुड़ी आपदाएं

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