कथा

सियारों ने हाथी को राजा बनाकर मार डाला- पहाड़ी लोककथा

सियारों के झुण्ड ने तय किया कि अबकी शिकार में हाथी को मारा जायेगा और छक कर मौज उड़ाई जायेगी. सियारों का पूरा झुण्ड हाथी के पास गया. सियारों के सरदार ने हाथी से कहा- मेरे प्यारे मालिक हमें जंगल में राजा की जरूरत है जो जंगल में राज कर सके हमारे पुराने राजा शेर की मौत के बाद से हमारे जंगल के सारे अस्त-व्यस्त है. अगर आप हमारा राजा होना स्वीकार करते हैं तो हम पूरी तरह से आपकी सेवा में लग जायेंगे. मेरे प्यारे मालिक आपको खाने के लिए ईधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं पड़ेगी. आपको घर पर आराम से बैठना है हम आपके लिये आपकी हर जरूरत की चीज वहीं ले आयेंगे.
(Elephant and Fox Uttarakhand Folklore)

हाथी को सियारों के असल मनसूबे का इल्म न हुआ. हाथी ने सियारों का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उनके साथ सियारों के जंगल हो चला. सियारों ने हाथी की सेवा शुरु कर दी. हर कोई सियार हाथी की सेवा के लिये अपने पंजों पर खड़ा रहता. हाथी बड़ा खुश रहने लगा.

अब सियारों के जाल फेंकने का समय था. सियार हाथी के लिये एक दलदल की नरम-नरम हरी घास लेकर आने लगे. हाथी को यह घास खूब पंसद आई. सियारों ने हाथी को दलदल की हरी नरम घास की आदत लगा दी. हाथी को अब सिर्फ हरी नरम घास पंसद आने लगी.

एक दिन सियारों के सरदार ने हाथी से कहा- मेरे प्यारे मालिक हम आपके लिये कुछ भी कर सकते हैं लेकिन यह बड़ा अच्छा होगा कि किसी दिन आप हमारे साथ जंगल में जाकर नरम हरी घास के मैदान पर चलें और वहां चलकर जी भरकर नरम नरम हरी घास का आनन्द लें. सारे सियारों हाथी के सामने दया मांगते हुये खड़े हो गये.
(Elephant and Fox Uttarakhand Folklore)

हाथी सियारों की बात में आ गया और चला दलदल की ओर. हाथी दलदल में भीतर जाता रहा पर घास उसकी सूंड़ से अभी भी दूर थी. सियारों ने कहा- हमारे मालिक आप भीतर को जायें अगर कहीं फंस गये तो हम आपको खींच लेंगे. हाथी बेचारा भोला-भाला जैसा सियारों ने कहा आगे बढ़ता गया कि अचानक हाथी डूबने लगा वह चिल्लाया- अरे दोस्तों मुझे बचाओ.

सियारों के झुण्ड ने पूरी ताकत से हाथी को ऊपर खींचा और फिर नीचे छोड़ दिया. सियारों के झुण्ड ने ऐसा तब तक किया जब तक हाथी मर न गया. बेचारा हाथी मारा गया सियारों ने मारे हुये हाथी को दलदल से खींचकर बाहर निकाला. मिट्टी में सना हाथी सियारों ने चट कर दिया.
(Elephant and Fox Uttarakhand Folklore)

यह कथा ई. शर्मन ओकले और तारादत्त गैरोला की 1935 में छपी किताब ‘हिमालयन फोकलोर’ के आधार पर है. इस पुस्तक में इन लोक कथाओं को अलग-अलग खण्डों में बांटा गया है. प्रारम्भिक खंड में ऐतिहासिक नायकों की कथाएँ हैं जबकि दूसरा खंड उपदेश-कथाओं का है. तीसरे और चौथे खण्डों में क्रमशः पशुओं व पक्षियों की कहानियां हैं जबकि अंतिम खण्डों में भूत-प्रेत कथाएँ हैं.

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