केरल की मिट्टी में कुछ तो है, या शायद वहाँ की हवा में, जो मलयालियों के स्वभाव में हल्की-सी बेबाकी, तंज और व्यंग्य भर देती है. इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मध्यकालीन केरल के कई प्रसिद्ध लोक नायक शरारती और हाज़िरजवाब थे. इन्हीं में से एक थे नाडुवेलिप्पाट भट्टाथिरी, जिनकी पहचान जितनी चतुराई के लिए थी, उतनी ही बदनामी के लिए भी. कहा जाता है कि उन्होंने एक बार अपने ही गुरु के साथ ऐसा व्यावहारिक मज़ाक किया कि गुरु को अपमान झेलना पड़ा, जबकि भारत में गुरु को ईश्वर के बाद सर्वोच्च स्थान दिया जाता है.
उस समय नाडुवेलिप्पाट मध्य केरल के त्रिशूर स्थित एक ब्राह्मण शिक्षालय में रहकर वेदों का उच्च अध्ययन कर रहे थे. प्रारंभिक शिक्षा वे अपने घर पर पूरी कर चुके थे. वे पढ़ाई में तेज़ थे, लेकिन स्त्रियों के प्रति उनका झुकाव उनकी विद्या और आश्रम जीवन के अनुकूल नहीं माना जाता था. आश्चर्य की बात यह थी कि उस शिक्षालय के प्रधान, जो स्वयं एक नंबूदरी ब्राह्मण थे, भी इसी कमजोरी से ग्रस्त थे. वे विवाहित होते हुए भी नगर में एक उपपत्नी रखे हुए थे. यह बात वे छिपाकर रखते थे, क्योंकि विवाहित नंबूदरियों के लिए ऐसे संबंध वर्जित थे; हालाँकि अविवाहित वयस्कों को इसकी अनुमति थी, बल्कि समाज में इसकी अपेक्षा भी की जाती थी.
नंबूदरी को यह भ्रम था कि उनके इस संबंध के बारे में कोई नहीं जानता, जबकि वास्तव में सभी जानते थे. नाडुवेलिप्पाट ने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाया. धीरे-धीरे यह रोज़ का नियम बन गया कि रात को शिष्य सो जाने के बाद गुरु चुपचाप अपनी उपपत्नी से मिलने निकल जाते, और उनके थोड़ी देर बाद नाडुवेलिप्पाट भी अपनी यात्राओं पर निकल पड़ते.
नाडुवेलिप्पाट की कोई स्थायी संगिनी नहीं थी. वे जहाँ मन हुआ और अवसर मिला, वहीं रात बिताते. आमतौर पर वे भोर से पहले लौट आते, गुरु के आने से पहले ही. लेकिन कभी-कभी रात भर की थकान के कारण वे देर से उठते और लौटते समय पकड़े जाते. ऐसे अवसरों पर उन्हें नंबूदरी की कठोर फटकार और अपमान सहना पड़ता.
इस अपमान से बचने के लिए नाडुवेलिप्पाट ने एक उपाय निकाला. वे अपनी रात की मुलाक़ात के बाद सीधे स्थानीय मंदिर जाकर कुछ समय पूजा में बिताने लगे, ताकि यदि गुरु उन्हें देख लें तो वे सत्य के साथ कह सकें कि वे मंदिर गए थे. लेकिन एक दिन वे किसी और शरारत में उलझ गए और बहुत देर रात लौटे. यह बात उनके लिए भारी पड़ गई.
उस रात नंबूदरी अपनी उपपत्नी के पास नहीं गए थे. वे जागते हुए नाडुवेलिप्पाट की प्रतीक्षा कर रहे थे और उन्हें चोरी-छिपे लौटते हुए पकड़ लिया. अब यह स्थिति अस्वीकार्य थी. नंबूदरी ने अनुशासन लागू करने का निश्चय किया.
उन्होंने सख़्त आदेश दिया, “अब से तुम मेरी शय्या के पास ही सोओगे. और सुबह मंदिर जाकर पूजा नहीं करोगे; जहाँ सोते हो, वहीं बैठकर प्रार्थना कर लिया करो.”
नाडुवेलिप्पाट ने विनम्रता से आज्ञा मानने का वचन दिया, लेकिन मन ही मन वे इस बंधन से मुक्त होने का अवसर खोजने लगे. नई व्यवस्था में जितनी बेचैनी शिष्य को थी, उतनी ही गुरु को भी. कुछ सप्ताह के संयम के बाद गुरु का धैर्य टूट गया. एक रात, यह सुनिश्चित करने के बाद कि नाडुवेलिप्पाट गहरी नींद में हैं, नंबूदरी चुपचाप भवन से निकल पड़े और अपनी उपपत्नी के घर की ओर चल दिए. लेकिन नाडुवेलिप्पाट सो नहीं रहे थे, वे केवल सोने का नाटक कर रहे थे. जैसे ही गुरु बाहर निकले, वे भी उनके पीछे हो लिए. एक छोटा रास्ता अपनाकर वे गुरु से पहले ही उस स्त्री के घर पहुँच गए और दरवाज़े के पास छिप गए.
जब नंबूदरी पहुँचे और आवाज़ दी, तो स्त्री बाहर आई और उनके पैर धोने के लिए पानी का घड़ा ले आई. इसी अँधेरे और नए चाँद की रात का लाभ उठाकर नाडुवेलिप्पाट फुर्ती से घर के भीतर घुस गए और बिस्तर के नीचे छिप गए.
उस रात उन्हें ज़्यादा नींद नहीं आई. भोर से पहले ही वे उठ गए और उसी बिस्तर के पास बैठकर ऊँचे स्वर में पवित्र मंत्रों का जाप करने लगे. इससे नंबूदरी की नींद खुल गई.
“कौन है?” उन्होंने घबराकर पूछा.
“मैं हूँ,” नाडुवेलिप्पाट ने विनम्रता से कहा.
“तुम? यहाँ क्या कर रहे हो?”
“आपके आदेश का पालन,” नाडुवेलिप्पाट बोले.
“क्या?”
“आपने कहा था कि मुझे आपकी शय्या के पास ही सोना है और उठते ही वहीं प्रार्थना करनी है; मैं वही कर रहा हूँ.”
“बस, बहुत हुआ,” गुरु गुस्से में बोले और तुरंत उठकर लौटने लगे. नाडुवेलिप्पाट उनके पीछे कुछ दूरी बनाए रखते हुए चल पड़े.
रास्ते में गुरु रुके और बोले, “अब से तुम जहाँ चाहो सो सकते हो और जहाँ चाहो जा सकते हो. मैं तुम्हें पूरी स्वतंत्रता देता हूँ; लेकिन आगे से मुझे परेशान मत करना.”
“जैसा आप कहें,” नाडुवेलिप्पाट ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया.
नाडुवेलिप्पाट उम्र भर अपनी शरारती प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाए. उन्हें घमंडी और दिखावटी लोगों का अहंकार तोड़ने में विशेष आनंद आता था. जीवन के उत्तरार्ध में, जब वे त्रावणकोर के राजा के दरबार में तिरुवनंतपुरम में रहते थे, उनका एक प्रिय निशाना स्वयं प्रधानमंत्री हुआ करता था.
प्रधानमंत्री एक मोटे, सजावटी व्यक्ति थे, जो बेहद पतली और पारदर्शी धोती पहनते थे, जिसे रत्नों जड़ी सुनहरी करधनी से बाँधा जाता था. एक दिन महल परिसर में उन्हें टहलते देखकर नाडुवेलिप्पाट अत्यंत आदर दिखाते हुए पास आए, झुक गए और हाथ से मुँह ढँक लिया.
प्रधानमंत्री ने उन्हें घूरते हुए पूछा, “तुम क्या चाहते हो?”
“एक विनम्र निवेदन,” नाडुवेलिप्पाट ने धीमी आवाज़ में कहा.
“क्या?”
“क्या मैं एक बार आपकी नितंबों को चूम सकता हूँ?”
प्रधानमंत्री क्रोध से लाल हो गए और सीधे राजा के पास जाकर शिकायत की. उन्होंने कहा कि नाडुवेलिप्पाट उनका अपमान कर रहा है और अभी-अभी उनसे ऐसी बात कही है जिसे वे दोहरा भी नहीं सकते.
जब राजा ने नाडुवेलिप्पाट को बुलाकर पूछा, तो उन्होंने कहा, “मैंने उनका अपमान नहीं किया. बात यह है कि जब मैंने उन्हें इतनी पारदर्शी धोती और सोने की कमरपट्टी में देखा, तो मुझे उनके स्थूल नितंबों को चूमने की इच्छा हुई. बिना अनुमति ऐसा करना उचित नहीं होता, इसलिए मैंने उनसे पूछ लिया. अगर उन्हें यह पसंद नहीं था, तो वे मना कर सकते थे; बात वहीं समाप्त हो जाती.”
राजा अपनी मुस्कान मुश्किल से रोक पाए. उन्होंने नाडुवेलिप्पाट को यह कहकर विदा किया कि वे इस विषय पर विचार करेंगे. दरअसल राजा को भी प्रधानमंत्री का इस तरह पारदर्शी वस्त्र पहनना कभी पसंद नहीं था, लेकिन वे कोई रास्ता नहीं ढूँढ पा रहे थे. नाडुवेलिप्पाट की शरारत ने उन्हें अवसर दे दिया. इसके बाद राजा ने आदेश जारी किया कि दरबार में उपस्थित होने वाला प्रत्येक व्यक्ति कमर के चारों ओर एक अतिरिक्त वस्त्र अवश्य धारण करेगा.
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