गायत्री आर्य

सिर्फ ‘नर’ योनि में जन्म लेने भर से लड़कों के पास ज्यादा मौके हैं

4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – 46  (Column by Gayatree arya 46)
पिछली किस्त का लिंक:  पिताओं के निकम्मेपन की वजह से माएं बच्चों के साथ एंजॉय नहीं कर पाती

तुम एक लड़के के रूप में जन्म लेते ही बहुत सारी जिम्मेदारियों से खुद-ब-खुद मुक्त हो गए हो मेरे बच्चे! सिर्फ एक ‘नर’ योनि में जन्म लेने भर से तुम्हारे पास — अपने सपनों को पूरा करने के लिए, अपने ढंग से जीवन जीने के लिए, अपनी छोटी-बड़ी इच्छाएं पूरी करने के लिए, एक लड़की की तुलना में बहुत ज्यादा समय है. ज्यादा ताकत है, ज्यादा मौके हैं. लड़कियों की आधे से ज्यादा ताकत तो उन कामों में खर्च हो जाती है जो उन्हें सिर्फ दूसरों की खुशी के लिए करने होते हैं.

तुम एक लड़के हो मेरे बेटे, इस कारण तुम चाहो तो अपने दिमाग की सारी ऊर्जा  सिर्फ अपनी रचनात्मकता में लगा सकते हो. लेकिन लड़कियों की दिमागी ऊर्जा का पता नहीं कितना हिस्सा, बहुत सारी फालतू की चीजों के मैंनेजमेंट में खर्च हो जाता है. घर के भीतर सुरक्षा, सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा, सामाजिक परम्पराएं, ताने, कमेंट्स, तीज-त्यौहार, सामाजिक संस्थाएं, एकतरफा सेवा की अपेक्षा आदि पता नहीं कितनी चीजें हैं लड़की की दिमागी और शारीरिक ऊर्जा सोखने के लिए. तुम अपने खुद के लिए कितने लक्की हो रंग! इस मौके को यूं ही मत गंवाना मेरे बच्चे. इस जीवन को आकंठ जीना, बस किसी बेकसूर को कभी दुख मत देना और साथ ही दूसरों द्वारा खुद को दुखी होने देने से भी तुम्हें खुद को बचाना है.

हो सके तो इस मिट्टी, हवा, पानी और असंख्य मनुष्यों, जीवों और पेड़-पौधों वाले इस परिवेश का कर्ज चुकाना. मैं नहीं कहूंगी मेरी जान, कि तुम सिर्फ अपने माता-पिता के ही कर्जदार हो. जो ऐसा कहते हैं वे गलत कहते हैं.

असल में सच तो ये है कि सारे मां-बाप अपने स्वार्थ और खुशी के चलते बच्चे पैदा करते हैं. उनका लालन-पालन करते हैं. मां-बाप को खुद ऐसा करके खुशी मिलती है. साथ ही वे अपने बुढ़ापे का सहारा भी चाहते हैं. खासतौर से बेटे के हाथों जलकर स्वर्ग में जाना चाहते हैं. अपने ग्रह सुधारना चाहते हैं. मैं सच में मानती हूँ कि मां-बाप का कोई बहुत बड़ा कर्ज उनके बच्चे के ऊपर नहीं होता. बड़ा कर्ज अगर किसी का है तो वह सिर्फ और सिर्फ प्रकृति का है और देश-दुनिया के असंख्य लोगों का है.

सिर्फ और सिर्फ प्रकृति ही है जो तुम्हें ‘शुद्ध निःस्वार्थ’ प्रेम करती है और तुम्हारी जरूरतें ‘निःस्वार्थ’ रूप से पूरी करती ही जाती है, जीवनभर. पशु-पक्षी भी अपने बच्चों की निःस्वार्थ ही सेवा करते हैं लेकिन इंसान सबसे स्वार्थी जानवर है मेरी जान! इंसान अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए, अपने बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए बच्चे पैदा करते हैं. तुम खुद ही सोचकर देखो मेरे बेटे. मैं और तुम्हारे पिता जिस दिन नहीं रहेंगे, तुम तब भी जिंदा रहोगे. लेकिन जिस भी दिन इस प्रकृति ने हवा, पानी, धूप में से एक भी चीज अपनी वापस ले ली या देना बंद कर दी तुम जी नहीं पाओगे, है न?

इस प्रकृति के साथ-साथ तुम इस मानवता मतलब कि उन असंख्य लोगों के भी कर्जदार हो जिनकी बदौलत तुम जीओगे, खाओगे, पहनोगे, काम करोगे. तुम्हारे रोज के जीवन में काम आने वाली असंख्य चीजों के लिए पता नहीं दुनिया के किस-किस कोने में किस-किस व्यक्ति के कर्जदार हो, हम सभी कर्जदार हैं.

हम तुम्हारे लिए जो खाना, कपड़ा, खिलौने, किताबें, अन्य जरूरत व सुविधा की चीजें जुटा पाएंगे, वे सिर्फ इसलिए नहीं कि हमारे पास उन्हें खरीदने का पैसा है, बल्कि इस कारण कि इस दुनिया के असंख्य लोग तुम्हारे-हमारे लिए ये चीजें बनाने और उन्हें हम तक पहुंचाने में अपने दिन-रात खपा रहे हैं. मैं और तुम्हारे पिता तो बेहद-बेहद छोटी सी कड़ी हैं मेरे बेटे! ये चीजें तुम तक पहुंचाने के लिए.

मां का कर्ज कुछ ज्यादा मान सकते हो, क्योंकि वह सच में अपनी ढेर सारी ऊर्जा, समय, सपने, चैन-सुकून अपने बच्चे के लिए बेशर्त खोती-खपाती है. पिता बच्चे के आने से पहले भी अपने लिए कमा ही रहे होते हैं, उसी में बच्चे में भी पलने लगते हैं. ज्यादातर पिता अलग से ज्यादा ऊर्जा और समय बच्चे के लिए नहीं लगाते. ज्यादातर पिता कमाने भर को ही पितृत्व निभाना मान लेते हैं, पर ऐसा है नहीं.

यदि सिर्फ पैदा करने को मातृत्व निभाना नहीं माना जाता, तो सिर्फ कमाने या संसाधन जुटाने भर को पितृत्व निभाना कैसे कहा जा सकता है बेटू? तुम ही बताओ मेरी जान, क्या ये सही है? ये अफसोसजनक है कि हमारे देश में ज्यादातर पिता अपने बच्चों के सिर्फ जैविक पिता हैं.

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उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.

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Sudhir Kumar

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  • बिना इस्लाम की निंदा किये हिंदू धर्म का महिमामंडन और पाकिस्तान मुर्दाबाद बोले हिंदुस्तान जिंदाबाद कहना जिस तरह दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है उससे कई गुना कठिन कार्य है बिना पुरुषों को गरियाये स्त्रीवाद पर लिखना ।

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