समाज

एक पहाड़ी बच्चे के पहली बार बाराती बनने का किस्सा

बचपन में हम लोग गांव के अलावा और कहीं शायद ही कभी जाते. हमारी दुनिया गांव तक सिमटी हुई थी. वहीं गांव, घर, खेत खलिहान और लोग. इसके बाहर हम नहीं जानते थे. पांच साल की उम्र तक मैं अपने गांव और अपनी ननिहाल के अलावा कहीं भी नहीं गया था. इसलिए हम बच्चे अकसर बाहर जाने की जिद करते रहते. जब भी ऐसा कोई मौका आता, हम आगे आगे लग जाते. खास करके शादी-ब्याह के मौके पर. लेकिन मां बाप हमें ले जाते ही नहीं.
(Childhood Memoir by Govind Singh)

ऐसा ही एक मौका आया हमारे गांव के जोगी की शादी का. जोगी मुझसे पांच साल बड़ा रहा होगा. यानी मेरी उम्र पांच साल थी तो उसकी 10 साल रही होगी. लेकिन अपने बूढ़े बाप का अकेला बेटा होने के कारण उसकी शादी जल्दी हो रही थी. उसकी बारात हमारे गांव से 7-8 कि.मी. दूर नाखोली से हो रही थी.

मैं एक सप्ताह पहले से ही शादी में जाने के लिए जिद किए हुए था. इजा मना कर रही थी. मेरे पास शादी में जाने लायक कपड़े नहीं थे. लेकिन मुझे क्या, इस बार नहीं तो कभी नहीं. जब इजा-बाबा को यह लग गया कि इस बार की शादी में यह जाकर रहेगा, उन्होंने मेरे लिए एक मलस्या का कच्छा सिलने को दे दिया. गांव में टेलर आया हुआ था ही. सच बात यह है कि तब तक मुझे कच्छे का नाड़ा कैसे बांधा जाता है, पता ही नहीं था.

खैर बारात का दिन आया. मेरी चाची ने इस अवसर पर पहनने के लिए एक पीटी बनियान दे दिया. वह बनियान उन्होंने आज तक पता नहीं अपने कौन से संदूक में छिपा रखा था. मैंने नया कच्छा-बनियान पहना. इतना धैर्य नहीं था कि किसी से पूछ लूं कि नाड़ा कैसे बांधा जाता है. आव देखा न ताव, नाड़े के दोनों सिरों को बांध कर गले में लटका दिया. बांधने का झंझट ही खत्म. आखिर नाड़े की कुल उपयोगिता यही तो थी कि वह कच्छे को कमर के ऊपर थामे रखे. वह मैंने गले में लटका कर पूरी कर ली थी.

हाथ में लकड़ी की तलवार और कपड़े की ढाल लेकर मैं बन गया छलिया. सबसे आगे. फिर मुझे रोकने की किसी को हिम्मत नहीं हुई. यह मेरी पहली यात्रा थी, जब मैं किसी बारात में जा रहा था. गर्मी के दिन थे,नाखोली में हमें पुआल के ऊपर दरी बिछा कर सुला दिया गया. और दूसरे दिन जिस ब्योली को लेकर हम लौटे, वह हमारी ही उम्र की थी. छह साल की लड़की को ब्योली के रूप में देख कर हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा था.
(Childhood Memoir by Govind Singh)

कुछ दिनों बाद बिरादरी के एक भाई की शादी होनी थी, लामाघर से. यह जगह हमारे गांव से कुछ ज्यादा ही दूर थी. इसलिए इस बार पिताजी अड़े हुए थे कि गोविंद को नहीं ले जाना है. इतनी दूर चल नहीं पाएगा, कौन कंधे में उठाता फिरे. लेकिन मैं बारात शुरू होने से दो घंटे पहले ही घर से निकल पड़ा था. बारात अभी गांव से चली भी नहीं लेकिन मैं काफी आगे पहुंच गया था. जब पिताजी को यह यकीन हो गया कि अब मुझे वापस लाना असंभव है, तब वे अपने साथ मेरे लिए कुछ कपड़े ले गए ताकि रास्ते में मुझे पहनाए जा सकें.

रास्ते में एक-दो कस्बेनुमा स्थान पड़े. पहले चौबाटी, फिर साता. पहली बार मैंने जतिया का खोज देखा. एक बड़ी-सी चट्टान के बीचों-बीच भैंसा यानी राक्षस के एक पैर का निशान बना हुआ था. दंत कथा है कि बनवास के दौरान भीम और जतिया के बीच लड़ाई छिड़ी तो भीम ने उसे चुनौती दी कि इस चट्टान को एक ही छलांग में लांघ जाएगा तो भीम हार जाएगा. इस तरह जतिया हार गया था. भीम विजयी रहा.

जिंदगी में तब मैंने पहली बार कोई मोटर गाड़ी देखी थी. हम लोग साता से नीचे उतर रहे थे. तभी एक सड़क दिखाई दी. हमने सड़क क्रॉस की. राम सिंह सेक्रेटरी यानी रम दा ने मेरा हाथ पकड़ा और बोले- एक रुपया भेट चढ़ाएगा तो मैं आज तुझे एक खास चीज दिखाऊंगा. मैंने कहा रुपया तो पिताजी से ले लेना लेकिन मुझे तो चीज दिखा दीजिए.
(Childhood Memoir by Govind Singh)

खैर उन्होंने मुझे अपनी नजर उस पहाड़ी पर गड़ाए रखने की हिदायत दी. मैंने वैसा ही किया. तभी क्या देखता हूं कि एक बड़ी सी भैंस दौड़ती हुई सड़क पर चली आ रही है. मैं हैरान था कि ऐसी भैंस कहां से आई होगी और किसने बनाई होगी. दरअसल वह एक काली सी जीप थी. रात भर उसी के सपने आते रहे. फिर दूसरे दिन ढेर सारी गाड़ियां देखने को मिलीं. कई दिन तक उनकी याद हमारी चर्चाओं के केंद्र में रही.

‘पहाड़‘ में छपे गोविन्द सिंह के लेख ‘बचपन की छवियां’ से

प्रो. गोविन्द सिंह

देश के वरिष्ठ संपादकों में शुमार प्रो. गोविन्द सिंह सभी महत्वपूर्ण हिन्दी अखबारों-पत्रिकाओं के लिए काम कर चुके हैं. ‘अमर उजाला’ के मुख्य सम्पादक रहे गोविन्द सिंह पहले उत्तराखंड मुक्त विश्विद्यालय और फिर जम्मू विश्विद्यालय के मीडिया अध्ययन विभागों के प्रमुख रह चुके हैं. पिथौरागढ़ जिले से ताल्लुक रखते हैं.

इसे भी पढ़िये : मेरे बाबू ईजा की अजब गजब शादी
भारती कैंजा और पेड़ के साथ उनकी शादी

(Childhood Memoir by Govind Singh)

बचपन की छवियां

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

कुमाऊं में रामलीला की परम्परा

सांस्कृतिक परम्परा की दृष्टि से उत्तराखण्ड एक समृद्ध राज्य है. समय-समय पर यहां के कई…

1 day ago

‘पायर’ फिल्म के सुलगते सवाल…

जाने-माने पत्रकार, साहित्यकार और फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी से कल शाम मुलाकात हुई. दरअसल,उनके निर्देशन में…

2 days ago

हुक्का क्लब अल्मोड़ा की रामलीला से एक्सक्लूसिव तस्वीरें

उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा के मुख्य आकर्षण में से एक रामलीला का मंचन इन…

2 days ago

‘पायर’ पहाड़ की ठोस पीठ है

लोग इसे पहाड़ और पलायन की कहानी की तरह देखेंगे. लोग इसे खंडहर होते जा…

3 days ago

धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’

पिछली कड़ी : सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन संघर्षनामा का ये किस्सा आजादी…

4 days ago

गौरा को किसी से शिकायत नहीं थी

गाँव में सब उसे जानते थे. कोई उस के पास सब्जी लेने आता तो वह…

6 days ago