व्यक्तित्व

चनका – पलायन को ठेंगा दिखाता एक मेहनती पहाड़ी

चनका ब्रिटिश भारत के नागरिक जो ठहरे. बिल्कुल 24 कैरेट की पहाड़ी पर्सनालिटी. पीठ में आज से 30 बरस पहले बाजार में मिलने वाला पिट्ठू और एक लाठी हाथ में. हलका शरीर, 5’5’’ का कद और एक फौजी की सी चाल. दाहिना पांव थोड़ा लटका सा पर स्मार्टली चलते हैं. बत्तीसी में 17 दांत अभी जीभ के साथ जुगलबंदी के लिए साबुत हैं. आंख पर न जाने किस नंबर का चश्मा लगता है नजदीक अव्वल दिखता है दूर कम. कान आवश्यकतानुसार साथ देते हैं कभी नहीं भी. (Column by Girija Kishore Pathak)

चनका यानि चंद्र बल्लभ पाठक ओखराणी चुचेर में रहते है. गांव में वे पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं लेकिन गांव से 3 स्टेशन पार करने के बाद होटल में सपकाने में कोई परहेज नहीं. पकौड़े, जलेबी, आलू के गुटके,  राजमा चावल बहुत भाता है चनका को. एक प्लेट रायते के साथ ये सब मिल जाय तो गजब. दाहिना पांव एक बार मोच खाया तब से धोखा दे गया और कमर 10 साल पहले भैंसी की थोरी के लिए क्वेराल के पत्ते काटने में पेड़ से गिरे तो लचक गयी. बताते हैं 30 किमी दूर हास्पिटल  गये तो थे पर डाक्टर नहीं था सो कंपाउंडर ने कुछ गोलियां दी पर कमर जस-की-तस ही रही. देशी इलाज तो हुआ पर कमर अपडेट न हो पायी. फिर भी जिंदगी अपने बल पर जीने का पूरा हौसला. उनका शौक खैनी और सुर्ती खाना. दो कमरे का घर, 7 नाली जमीन, 2 गाय-भैंस और 2 बैल गोठ में और 2 बुढ्ढे-बुढ़िया घर के अंदर. 2 गाज्यो मांग्अ  (चरागाह पशुओं के चारे की घास) के लिए. 2 बेटे और  एक बेटी सब अपने-अपने ठिकानों पर दुरस्त हैं.

आज मार्निंग वाक पर सड़क पार करते  चनका मिल गये. नमस्कार चमत्कार में मुझे पहचान नहीं पाये. साथ में तरदा द्वारा परिचय करने पर कि ये हरदत्त  मास्टर साहब के लड़के हैं. कुछ देर एकटक ताकते रहे. स्मृति को टटोलने के बाद फिर बोले अच्छा गणेश! कब आये? तुमको मैंने तब देखा था जब तुम कक्षा 5 में पड़ते थे. 50-55 साल बाद कैसे पहचानूं? बोले पंडित ज्यू से मेरा बहुत घरू संबंध था. उनकी कुशल पूछी. खुश हो गये जब बताया की ईजा-बाबू स्वस्थ हैं. बात-बात में एक बात का एहसास मुझे भी हुआ कि आप कितने ही बड़े हो जाओ गाँव में आपकी पहचान आपके पुरखों से ही होती है.

चनका बताये वृद्धावस्था पेंसिन लेने पांखू स्टेट बैंक जा रहा हूँ. उम्र पूछने पर बताने का अंदाज 5 बीसी 8 यानि (20x 5+8) = 88 साल. मैंने कहा पैदल 8 किमी जाना और 8 किमी वापस आना कैसे हो पायेगा आपसे? बोले 12-16  किलोमीटर चलना साधारण सी बात है. अब तो आदत सी हो गयी है. किया भी क्या जाए. जब विकल्प नहीं होते तो शरीर अपने विकल्प खुद तलाश लेता है.  सरकार विकास का भोंपू बजाती है. इस पीडब्ल्यूडी की सड़क से हमें क्या फायदा जो साल भर से मोटर गाड़ियों के चलने लायक ही न हो? अंग्रेज राज में भी पैदल चलते थे और आज भी . तब भी गाँवों में खच्चर सामान लाते थे आज भी! अंतर केवल ये है कि पहले घोड़ी रोड पर खच्चर चलते थे आज लोक निर्माण विभाग और प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क पर ये समान ढो रहे हैं. हम सब तो जस-के-तस हैं. सड़क शो पीस है हम सारे ग्रामवासियों के लिए.

थोड़ी कुशल-क्षेम पूछने के बाद चनका नान स्टाप शुरू हो गये. हम बस साथ चलते रहे और चनका को सुनते रहे.  चनका बताते हैं 17-18 की उम्र में वे घर से भाग कर अल्मोड़ा गये थे किसी देशी साहब के वहां एक साल खाना बर्तन का काम किया पर वहां मन नहीं लगा सो घर लौट आया. फिर जो घर लौटा कभी सरयू पार नहीं की. चनका कुछ भावुक होकर बताते हैं बचपन में गरूड़ से खच्चरों में रोज मर्रा के सामान की गांवों में आवक-जावक होती थी. आज मोटर रोड गांव की दहलीज पर है अलबत्ता सड़क पगडंडी से भी खराब है इसलिए ट्टुओं से सामान गांव पहुंचने का सिलसिला जारी है. चनका बताते हैं कि पुराने जमाने में आग जलाना और उसे सुरक्षित रखना  सबसे बड़ी समस्या होती थी. गांवों में दुकानें नहीं थी माचिस मिलना बड़ा कठिन था. गांव के लोग रौन (एक तरह की सगड़ी) में बांज के कोयलों की आग को राख से ढंक देते थे जब जरूरत हो उससे आग जला लेते थे. कभी कोयले बुझ गये तो गांव के किसी के घर से आग मागकर डाड़ू में लाते थे और तब चूल्हे जलते थे.  जो लोग तंबाकू, हुक्का और बीड़ी के शौकीन होते थे वे डांसी डुंग (चकमक पत्थर) का लोहे के टुकड़े से घर्षण कर आग की चिंगारी  को बकौल के पत्तों के भूसे से जला लेते थे. माचिस का प्रचलन नहीं के बराबर था.

चनका बताते हैं कि आज बीपीएल के अनाज से भकार भरे हैं पहले 90% अनाज घर में पैदा करते थे. हाथ के कोल्हू से सरसों पेरते थे. हर घर में गाय भैंस दूध, दही, घी इफरात में थी. बस साबुन, मिश्री, कपड़ा और गुड़ के लिए बाजार पर निर्भर थे. जिन खेतों को आज तुम बंजर देख रहे हो वे लहलहाते थे. गाय, भैंस, बैल शुद्ध गोबर की खाद से शुद्ध अनाज मिलता था और खान-पान सब बिना रसायन खादों के शुद्ध था. बीपीएल के अनाज ने सबकुछ खत्म कर दिया. गेहूं और धान के खेत गाज्यो के मागौं (घास के मैदान ) में बदल गये हैं. चूंकि सबको खूब अनाज मिल रहा है इसलिए खेती के लिए न सामुदायिक पहल वल्ट-पल्ट, हुड़की बॉल और न खेतिहर मजदूर. हां, गांव में टैक्टर बहुत आ गये हैं. बहुऐं अब खेत-खलिहानों से बचती फिरती हैं. साला मोबाइल ने सत्यानाश कर दिया है. लड़के भी अगर ग्रेजुएट हो गये तो रोपाई के पांग में कौन जाये और पुत कौन डाले. फिर बोआई से लेकर गोड़ाई, निराई, कटाई, मढ़ाई, अन्न भकार तक मिट्टी के आठ सर काम करना पड़ता है. टीवी और मोबाइल ने बौड़ियों को भी निकम्मा बना दिया है. रही की खेती की संभावना पर बीपीएल के अनाज ने पूर्णविराम लगा दिया है. सो खेती का चौपट होना तो तय ही है. चनका कहते हैं मेन तो जब तक जिंदा रहूँगा न पहाड़ छोड़ूँगा न ही खेती पाती.

मैंने जिज्ञासावश पूछा क्या जरूरत पड़ने पर बेटे मदद करते हैं कुछ गुस्साते भाव से चनका कहते हैं वे खुद खा लें यही काफी है. चनका बताते हैं बुढ़िया, यानि काकी, अब कुकड़ा गयी है बस घर का ही काम कर पाती है थोड़ा बहुत. चनका दिन में गाय चराने जंगल जाते हैं. इस साल अपनी मेहनत के बल पर 10 लूटे, गाज्यों काटे. खेत-बाड़ी से सब्जी, फल, घी, शहद बेचते हैं. आज से 10-12 साल पहले उनके पास 15-20 बकरियाँ भी थी. 1998 में एक साथ 4 बकरियों को बाघ खा गया फिर सारी बकरियाँ बेच दीं. बकरियों से इनकम ज्यादा होती थी ऐसा चनका बताते हैं. चनका बताते हैं कि सन 92-93 की बात होगी दशोली के 2 लड़के आए 3-4 साल में धन दुगुना होने की बात कह कर चनका से 30,000 रुपये ले गया और सारे गाँव से भी 3-4 लाख रुपए ले गये बाकायदा बैंक की रसीद भी दिए. सन 96 में पता लगा बैंक ही डूब गया. बस 30 हजार रुपया चनका का डूब गया. ये पैसा उन्होंने 3-4 बकरियां बेच कर और 2 घास के लुट बेच कर जमा किये थे. वे कहते हैं मैं खून का घूंट पीकर रह गया. बाद में पता लगा कि बैंक बंद होने पर वो लड़के बंबई भाग गया.

पहाड़ के विकास के बारे में 88 साल के अनुभव के आधार पर  चनका कहते हैं कि शून्य गुणे  शून्य और  हासिल हुआ शून्य (0X0=0), यानि शून्य से शून्य को गुणा करने की रिहर्सल सरकारें करती रहती है लेकिन हिमालय के विकास की कोई ठोस एकल नीति नहीं होने के कारण हासिल भी अंततः शून्य ही होता है. सरकारों को चनका जैसे लोगों के लिए सड़क, सुरक्षा, स्वास्थ, उत्पादन के विपणन की व्यवस्था के दायित्व का निर्वहन करना ही चाहिये. एक बात सामने आयी कि चनका के अंदर आक्रोश है अपाहिज व्यवस्था के प्रति.

जो भी हो चनका आत्मनिर्भर हैं. महीने में 12-15 हजार रुपये काम लेते हैं. स्वस्थ है. बाजार समान ले जाने का खच्चर का भाड़ा बहुत लगता है, रोड ठीक हो जाए तो 3-4 हजार और फायदा हो जाएगा. 88 साल की उम्र में खेती-बाड़ी करना, सब्जी, शहद, घी का उत्पादन, उसे बाजार में बिकवाना गजब का काम है. वे पहाड़ी योद्धा हैं. 16 किलोमीटर जाकर पेन्सिन ला रहे हैं, बीमार हो गए तो फिर 16 आते-जाते होंगे. फल-फूल, सब्जी, सारे बाजार विपणन के लिए भी 16 किलोमीटेर जाते हैं. उनके अनुसार कई बार उनके लड़कों ने देश (मैदानी शहर) आने को कहा लेकिन पलायन की बात चनका कभी सोचते तक नहीं. उनकी हिम्मत और उनका हौसला गजब का है. कोरोना काल में छोटी-मोटी  नौकरियां छोड़ कर पहाड़ लौटे हजारों युवाओं के लिए चनका रोल माडल हैं. परंपरागत खेती में भी 15-20 हजार काम रहे हैं. स्वस्थ और खुश हैं. इस बीच मैंने एक किताब ‘इकिगाई’ पढ़ी, जो जापान के लोगों के लंबे जीवन और खुशहाल रहने के टिप्स पर आधारित है. चनका कुमाऊनी इकिगाई के माडल पुरुष हैं.  चनका का जीवन मंत्र है काम करो, स्वस्थ रहो. वे कर्मवीर हैं. उनके साहस और पुरुषार्थ को नमन.

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मूल रूप से ग्राम भदीना-डौणू; बेरीनाग, पिथौरागढ के रहने वाले डॉ. गिरिजा किशोर पाठक भोपाल में आईपीएस अधिकारी हैं. विभिन्न समाचार पत्रों-पत्रिकाओं के लिए लेखन करते रहे हैं.

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Sudhir Kumar

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