द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म ‘मेघा आ’ का है. ‘मेघा आ’ फ़िल्म के गीत आज भी एक पीढ़ी को मुंहजबानी याद हैं तो इसकी वजह दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ है. कुमाऊं के सुप्रसिद्ध लोकगायक और रंगकर्मी दीवान सिंह कनवाल, जिन्हें पूरा पहाड़ प्रेम से ‘दीवान दा’ कहकर पुकारता था, अब हमारे बीच नहीं रहे. दीवान दा महज़ गीत गाने वाले कलाकार नहीं थे, वे अपनी आवाज़ में पहाड़ की मिट्टी की महक, उसकी पीड़ा, उसका उल्लास और उसके जीवन की धड़कन को समेट लेते थे. सिर पर हैट, चेहरे पर एक शांत और सहज मुस्कान अब सिर्फ़ उनकी तस्वीरों और पुराने विडियो में देखने को मिलेगी.

सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के खत्याड़ी गांव में जन्मे ‘दीवान दा’ को कला एक तरह से विरासत में मिली थी. उनके पिता त्रिलोक सिंह कनवाल भी अल्मोड़े की रामलीलाओं के चर्चित कलाकार रहे थे. दीवान दा ने अपने कलात्मक सफर की शुरुआत अल्मोड़े के प्रसिद्ध ‘हुक्का क्लब’ की रामलीला से की थी. अल्मोड़े के लोगों ने उन्हें कभी मंदोदरी तो कभी परशुराम की भूमिका में खूब देखा. पिछले कुछ सालों से दीवान दा दशरथ की भूमिका निभा रहे थे.

अल्मोड़े की रामलीला में दीवान दा. फ़ोटो : जयमित्र सिंह बिष्ट

साल 1980 में नजीबाबाद रेडियो स्टेशन से बतौर ‘बी-ग्रेड’ कलाकार के रूप में जुड़े दीवान दा आगे चलकर आकाशवाणी अल्मोड़ा में ‘बी-हाई ग्रेड’ कलाकार बने. जैसा की हम पहाड़ियों के भाग्य में बेरोज़गारी की मार के चलते मैदान जाना लिखा है, दीवान दा के जीवन में भी यही मोड़ आया. 1984 में दीवान दा दिल्ली पहुंचे. कला का प्रेमी अपनी राह ढूँढ ही लेता है सो दिल्ली में उनका संपर्क संगीतकार मोहन उप्रेती और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तत्कालीन निदेशक बी.एम. शाह से हुआ. यहां वो पर्वतीय कला केंद्र से जुड़कर रंगकर्म और संगीत की बारीकियों को और गहराई से समझने लगे. बाद में पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते दीवान दा को फिर अल्मोड़ा लौटना पड़ा और उन्होंने अल्मोड़ा को-ऑपरेटिव बैंक में नौकरी की. अल्मोड़ा को-ऑपरेटिव बैंक से ही दीवान दा रिटायर्ड हुए थे.

रिटायरमेंट के बाद दीवान दा ने डॉ. अजय ढौंडियाल के साथ मिलकर ‘अजय-दीवान’ की जोड़ी बनाई. द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में… इस जोड़ी का सबसे लोकप्रिय गीत है जो लोककवि शेरदा ‘अनपढ़’ है.सुवा, पैलाग, हुड़की घमा-घम, थात बात, सुफल है ई जै पंचनाम देवा, दीवान दा की एल्बम के नाम हैं. दीवान दा की आवाज़ में बने दाज्यू हमरि घरवाई रिसै गे… कसि भिड़ै कुनई पंडित ज्यू… ह्यूं भरी दाना… उत्तरखंड बणियां कतुक साल हैंगीं… जैसे गीत हमेशा पहाड़ के लोगों की जुबान पर जिंदा रहेंगे. आज दीवान दा के जाने के बाद शेरदा का गीत, द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में यानी इस दुनिया में दो दिन का ही बसेरा है, खूब याद आ रहा है. अलविदा, दीवान दा!

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