फोटो: गोपू बिष्ट
उत्तराखंड को केवल ‘देवभूमि’ ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर पर्वों, मेलों और त्यौहारों की अनोखी रौनक देखने को मिलती है. इन्हीं में से एक बेहद खूबसूरत त्यौहार है ‘फूलदेई’ (Phool Dei), जिसके जरिए पहाड़ों में बसंत ऋतु के आगमन का बाकायदा जश्न मनाया जाता है.
कुमाऊं और गढ़वाल में इसे ‘फूलदेई’, पुष्प संक्रांति या फूल संक्रांति कहा जाता है, जबकि जौनसार बावर क्षेत्र में यह ‘गोगा’ के नाम से विख्यात है. हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र मास के पहले दिन मनाया जाने वाला यह पर्व नए साल के स्वागत का भी प्रतीक है.
फूलदेई के दिन की शुरुआत घरों में विशेष साफ-सफाई के साथ होती है. महिलाएं सुबह उठकर घर की देहरी को ‘ऐपण’ से सजाती हैं. ऐपण उत्तराखंड की पारंपरिक शुभ-मांगलिक चित्रकला है. पारंपरिक मिट्टी के फर्श वाले घरों को लीपकर उन पर प्राकृतिक रंगों, गेरू और पिसे हुए चावल व आटे के घोल (बिस्वार) से बेहद आकर्षक आकृतियां बनाई जाती हैं. उत्तराखंड के हर धार्मिक अनुष्ठान और पर्व में इस कला का विशेष महत्व है.
इस त्यौहार की असली रौनक घर के छोटे बच्चे होते हैं. बच्चों की टोलियां सुबह-सुबह पास के जंगलों में जाती हैं और बसंत के ताजे फूल चुनकर लाती हैं. इन फूलों में श्वेतकुंज, सिल्फोड़ा, प्योंली, बुरांस, बासिंग, आड़ू, खुमानी और पय्याँ शामिल होते हैं.
बच्चे गांव में नाते-रिश्तेदारों और पड़ोसियों के घर-घर जाकर उनकी देहरी को इन फूलों और चावलों से सजाते हैं. इस दौरान वे एक सुर में कोरस गाकर घर की सुख-शांति और समृद्धि की मंगल कामना करते हैं:
फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार…फूल देई-छ्म्मा देई.
फूल देई माता फ्यूला फूल
दे दे माई दाल-चौल.
जब बच्चे देहरी पर फूल और मंगलकामनाएं अर्पित करते हैं, तो गृहस्वामियों द्वारा उनकी थाली में सप्रेम भेंट (नेग) डाली जाती है. इस भेंट में गुड़, चावल, सूजी और नकद पैसे शामिल होते हैं.
शाम के समय बच्चे इस इकट्ठी की गई सामग्री से सामूहिक रूप से मीठे ‘पुए’ पकाते हैं. कई जगहों पर बड़े लोग पकवान बनाने में बच्चों की मदद करते हैं, लेकिन इसे खाने का अधिकार केवल बच्चों का ही होता है. उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व एक दिन से लेकर आठ दिन (अष्टमी) या पूरे महीने भर तक उल्लास के साथ मनाया जाता है.
फूलदेई से ही पहाड़ों में ऋतुओं के गीत बदल जाते हैं. बसंत पंचमी से गाए जा रहे फाग के लोकगीत अब ‘ऋतुरैण’ की सुरीली धुनों में ढलने लगते हैं. इसी दिन से एक और खूबसूरत परंपरा की शुरुआत होती है— ‘भिटौली’.
चैत्र के इस महीने में मायके वाले अपनी ब्याहता बेटियों और बहनों के लिए उपहार और पारंपरिक पकवान (भिटौली) भिजवाते हैं. ससुराल में रह रहीं बेटियां बड़ी बेसब्री से अपने परिजनों और इस प्रेम भरी सौगात का इंतजार करती हैं.
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
Олимп казино официальный сайт в Казахстане - Olimp Casino ▶️ ИГРАТЬ Содержимое Преимущества игры в…
Qu’est‑ce que le 1xbet APK ?Télécharger et installer le 1xbet APK en toute sécuritéCréation de…
Betify Casino en Ligne | Jouez sur Betify avec 1000 € ▶️ JOUER Содержимое Betify…
Polskie kasyna online z darmowymi spinami dla nowych graczy ▶️ GRAĆ Содержимое Jak wybrać najlepsze…
Slovenské online kasína - zoznam odporúčaných kasín pre hráčov ▶️ HRAť Содержимое Odporúčané online kasína…
Zonder Cruks Online Casino - Veiligheid en beveiliging van spelers ▶️ SPELEN Содержимое Veiligheid van…