पिछली कड़ी यहां पढ़ें- वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गई: पिथौरागढ़ महाविद्यालय में मेरा पहला दिन वर्ष 1979 सितम्बर का महीना भीगी भीगी सी सुबह. दीप तो साढ़े चार बजे ही आ मेरा दरवाजा खटखटा चुका थ... Read more
कुमाऊं का ऐसा गुप्त संगठन जिसकी सदस्यता खून से हस्ताक्षर करने पर ही मिलती थी
भारत की स्वतंत्रा के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन में अनेक रूपों में जनता ने अपना योगदान दिया. देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय जागरण का दौर चला और अपने अपने तरीकों से लोगों ने इसमें अपनी समिधा डाली.... Read more
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘सौत’
जब रजिया के दो-तीन बच्चे होकर मर गये और उम्र ढल चली, तो रामू का प्रेम उससे कुछ कम होने लगा और दूसरे व्याह की धुन सवार हुई. आये दिन रजिया से बकझक होने लगी. रामू एक-न-एक बहाना खोजकर रजिया पर ब... Read more
कत्यूर राजधानी बैजनाथ पर एक महत्वपूर्ण लेख
कौसानी के डॉडे से सामने दूर नगाधिराज के श्वेत हिममण्डित सैकड़ों शिखरों की श्रेणियाँ दिखाई पड़ती हैं या पर्वत निः श्रेणियों के निचले भाग में विशाल कत्यूर उपत्यका लेटी पड़ी है- सोई हुई है. यह... Read more
अगर पहाड़ हैं जिन्नत तो रास्ता है यही
सुना करते थे वह बाग़ पुरफ़िज़ा है यहीअगर पहाड़ हैं जिन्नत तो रास्ता है यही हम वक्त के उस दौर में हैं जब समय को बेधने की हमारी कुव्वत बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है. ये टूट–फूट दुतरफा है.... Read more
वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गई: पिथौरागढ़ महाविद्यालय में मेरा पहला दिन वर्ष 1979
पिछली कड़ी यहां पढ़ें: छिपलाकोट अंतर्कथा : मुझे एक जगह आराम नहीं, रुक जाना मेरा काम नहीं डॉ मुन्ना भाई शाह अलमस्त से वह, जो पिथौरागढ़ महाविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहे और मुझे... Read more
गढ़वाल का शहर, दुगड्डा : रूह है पर आब उड़ गई
-भगवतीप्रसादजोशी , ‘हिमवन्तवासी ‘ यू.पी. में पुख्ता बुनियाद वाले जिला बिजनौर में नवाब नजीबुद्दौला द्वारा बसाए गए और दिल दिलेर मानिन्द शेर डाकू सुलताना के जन्म स्थान के रूप में म... Read more
“सम्यक् प्रकारेण विरोधाभावान् अपास्य समभावान् जीवनोपयोगिनः करोति इति संस्कृतिः” अर्थात संस्कृति वह है जो मानवता को विकृत करने वाले भावों को निरस्त करके उनके स्थान पर जीवनोपयोगी भावों को प्र... Read more
नराई होती नहीं, लगा करती है
सुवा कैं नराई लागी आंचली में फेड़ी- वियोगावस्था में आलम्बन के प्रति आश्रय के मनोगत भावों की यही सबल अभिव्यक्ति साहित्य की अनमोल धरोहर है. सुवा अर्थात प्रेयसी (प्रेयसी और प्रियतम दोनों के लिए... Read more
हर शुभ की पहचान गेरू और बिस्वार की जोड़ी गायब है
पहाड़ में कोई भी त्यौहार हो पारम्परिक कुमाऊनी घर गेरू की भिनी सुगंध से सरोबार हो जाया करते. एक समय ऐसा भी था जब दिवाली के समय के समय गेरू और बिस्वार की जोड़ी से सजे घर कुमाऊं की अपनी पहचान ह... Read more


























