सरयू आज भी सिसकती है – कुसुमा की त्रासद लोककथा
सुसाट मन को कपोरता है. लग जाता है एक उदेख जिसके अंदर कुहरा जाती है बाली कुसुमा की ओसिल कहानी. सरयू आज भी सिसकती है. इतना तो समय बीत गया. विदित नहीं अब देवराम और सरूली दीदी जीवित होंगे भी कि... Read more
ठेठ कुमाऊंनी रामलीला का इतिहास – 2
[पिछली कड़ी का लिंक : ठेठ कुमाऊंनी रामलीला का इतिहास – 1] 1900 से पूर्व अल्मोड़ा की एक मात्र रामलीला बद्रेश्वर में होती थी. 1948 में बद्रेश्वर के रामलीला आयोजन स्थल पर उठे विवाद के कारण यहाँ आ... Read more
विष्णु खरे: बिगाड़ के डर से ईमान का सौदा नहीं किया
विष्णु जी नहीं रहे. हिंदी साहित्य संसार ने एक ऐसा बौद्धिक खो दिया, जिसने ‘बिगाड़ के डर से ईमान’ की बात कहने से कभी भी परहेज़ नहीं किया. झूठ के घटाटोप से घिरी हमारी दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम... Read more
‘अपनी धुन में कबूतरी’ वृत्तचित्र का प्रदर्शन
(जगमोहन रौतेला की रपट) कुमाउनी लोकजीवन के ऋतुरैंण, न्योली, छपेली, धुस्का व चैती आदि विभिन्न विधाओं की लोकप्रिय लोकगायिका रही कबूतरी देवी के जीवन पर आधारित वृत्तचित्र ‘अपनी धुन में कबूतरी’ का... Read more
गोलू देवता की कहानी
ग्वल्ल ज्यू की जन्म भूमि ग्वालियूर कोट चम्पावत थी. इस ग्वालियूर कोट में चंद वंशी राई खानदान का राज्य था जिनमें हालराई, झालराई, तिलराई, गोरराई और कालराई आदि प्रमुख राजा हुए. ग्वल्ल ज्यू के पि... Read more
ठेठ कुमाऊंनी रामलीला का इतिहास
चंदवंशी राजा बालो कल्याण चंद ने जिस अल्मोड़ा शहर को 1563 में बसाया, उसी अल्मोड़ा शहर के स्व. देवी दत्त जोशी (काली कुमाऊं के तहसीलदार) की प्रेरणा से 1860 में पहली कुमाऊंनी रामलीला बद्रेश्वर में... Read more
टोपी पहना दी जाती है तो कभी पहननी पड़ जाती है
टोपी का भी अपना इतिहास है. क्षेत्र व समुदाय से लेकर अपनी अलग पहचान बनाने के लिए भी टोपी पहनने का रिवाज रहा है. बाॅलीवुड से लेकर कविता हो या शायरी या फिर मुहावरा, टोपी कहीं नहीं छूटी है. हर ज... Read more
नरैणा काफल पाको चैता
अगर आप उत्तराखंड से हैं तो आपके साथ बेड़ू पाको अपने आप जुड़ जाता है. उत्तराखंड का व्यक्ति अपना परिचय देता है और सामने वाला बेड़ू पाको अपने आप जोड़ लेता है. वर्ष 1955 में सोवियत संघ (वर्तमान... Read more
बर्फ़बारी के स्वागत का उत्सव सेल्कु मेला
उत्तराखण्ड के ज्यादातर त्यौहारों, मेलों का स्वरूप अध्यात्मिक के साथ-साथ प्राकृतिक भी दिखाई देता है. यहाँ के लोग उत्सव प्रेमी हैं और ज्यादातर उत्सव प्रकृति के साथ इंसानी रिश्तों की गाथा समेटे... Read more
किर्जी महोत्सव की कथा
उत्सव शब्द ही अपने आप में हर्षो-उल्लास एवं खुशी को व्यक्त करता है. जब भी किसी उत्सव की बात होती है, तो लोगों के उत्साह सा दिखायी पड़ता है. उत्सव एक माध्यम है अपनी परम्परा व संस्कृति को दर्शान... Read more


























