दास्तान तिकोनिया के फेमस शंकर मीट भात की
अब से चालीस एक साल पहले हल्द्वानी क़स्बा खनन माफिया, भू-माफिया किस्म के लोगों का शहर नहीं हुआ करता था. अलबत्ता छोटे-मोटे अपराधी खैर और शराब की तस्करी जरूर किया करते थे और इसे अपराध ही माना जा... Read more
कल है उत्तराखंडी लोकपर्व घ्यूं त्यार
उत्तराखण्ड के दोनों अंचलों कुमाऊं और गढ़वाल में भादो महीने की संक्रान्ति को घ्यूं त्यार मनाया जाता है. कुमाऊं के कुछ इलाकों और गढ़वाल में इसे घी संक्रान्त कहते हैं. इस दिन विभिन्न प्रकार के... Read more
अब मुझे दर्द की असली फितरत का पता चला – इरफ़ान खान
फिल्म अभिनेता इरफ़ान खान ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा में अपने लिए एक अलग स्थान बनाया है. वे हमारे उपमहाद्वीप के सबसे प्रतिभावान और वर्सेटाइल कलाकार हैं. दुर्भाग्यवश कुछ दिन पूर्व उन... Read more
भारत सरकार ने 1994 में उनकी फोटू वाला एक डाक टिकट जारी किया और नामकरण किये जाने से छूट गईं एकाध सड़कों के नाम उनके नाम पर रख दिए. उत्तराखंड बनने के बाद जब राज्य सरकार को अपने स्थानीय नायकों... Read more
यह धरती सबकी साझा है
आज सुबह आते-जाते दो-तीन बार उस पर नजर पड़ी. बुरी तरह भीगा हुआ था और जुगाली भी नहीं कर रहा था. इस घनघोर जाड़े की बरसात में पूरी रात ठरते हुए सीमेंट पर गुजार देना कहीं उसकी छोटी सी मासूम जिंदग... Read more
सपने में भी भेड़ प्यासी है
शायदा चंडीगढ़ में रहने वाली पत्रकार शायदा का गद्य लम्बे समय से इंटरनेट पर हलचल मचाता रहा है. इस दशक की शुरुआत से ही उनका ब्लॉग बहुत लोकप्रिय रहा. वे साहित्य, कला और संगीत के अलावा सामाजिक म... Read more
सबसे खतरनाक है कामयाब लोगों का अलगाववाद
उन्हें इस देश की सड़कें नापसंद हैं. वो ज्यादातर सफर हवाई जहाज से करते हैं और हो सके तो हवाई जहाज से सिटी सेंटर तक आने के लिए हेलिकॉप्टर का इस्तमाल करते हैं. भारत में दुनिया के लगभग सारे लक्ज... Read more
फ़िल्मों की बहार उर्फ़ जाने कहां गए वो दिन – 3
(पिछली किस्त से आगे) और नजीर हुसैन हमेशा न जाने कैसे कोई एक बेहद अमीर आदमी होता है. उसकी बीवी नहीं होती. संतान केनाम पर एक मात्र लड़की होती है – जवान और खूबसूरत. वह फिल्म के शुरू में ब... Read more
फ़िल्मों की बहार उर्फ़ जाने कहां गए वो दिन – 2
(पिछली क़िस्त से आगे) सिनेमा की टिकटों के लिए खिड़की खुलने से काफी पहले ही लम्बी क़तार लग जाया करती थी. टिकट क्लर्क सरकारी बाबुओं की तरह कुछ देर से आकर आसन ग्रहण करता और बड़े इत्मीनान से टिकट... Read more
फ़िल्मों की बहार उर्फ़ जाने कहां गए वो दिन – 1
जिस तरह पुराने हीरो अब हीरो नहीं रहे, एक दम ज़ीरो हो गए हैं या दादा-नाना बनकर खंखार रहे हैं, उसी तरह अपने शहर के दो सिनेमाघरों में भी एक वीरान पड़ा है तो दूसरा मॉल बन गया है. अपने को पुराने... Read more