‘मिसाइल मैन’ वाली हेयर स्टाइल
कुछ रोज पहले की बात है. मैं, बाल कटवाने गया था. नापित के यहाँ बाल कटवाने में नंबर लगाना पड़ता है. पुरानी सी दुकान थी. दुकान में एक टूटी हुई व्हीलचेयरनुमा जीर्ण-शीर्ण कुर्सी थी, जिस पर एक नौज... Read more
साझा कलम: 9 पदमिनी अबरोल
[एक ज़रूरी पहल के तौर पर हम अपने पाठकों से काफल ट्री के लिए उनका गद्य लेखन भी आमंत्रित कर रहे हैं. अपने गाँव, शहर, कस्बे या परिवार की किसी अन्तरंग और आवश्यक स्मृति को विषय बना कर आप चार सौ से... Read more
पंडित प्रतापनारायण मिश्र के ‘ब्राह्मण’ और डकैत फूलन देवी के ‘ठाकुर’ पिछली बार हमारा किस्सा इस बात के जिक्र पर ख़त्म हुआ था कि साहित्य और भाषा की चाल में कोई यूटर्न नहीं होता. इसका मतलब यह है... Read more
गुडी गुडी डेज़ -अमित श्रीवास्तव गुडी गुडी मुहल्ले के शोभा चाचा. नाम शोभनाथ या शोभाकांत जैसा कुछ रहा होगा. हमें यही मिला था बोलने को- शोभा चाचा. महीन, ज़हीन और सत्तर की उमर में भी ताज़ा तरीन दिख... Read more
यह हम सबकी चुगली है
मोहिनी, यह तुम्हारी घात नहीं है -नवीन जोशी तुमसे विनती है कि तुम, जो इसे पढ़ोगे, यही सोचना कि मैं उसकी ‘घात’ (शिकायत) नहीं कह रहा हूँ. अब तक सम्भाल कर रखी गई मेरी डायरी में उसका कहा लिखा है-... Read more
खटारा मारुति में पूना से बागेश्वर – 4
(पिछले हिस्से: खटारा मारुति में पूना से बागेश्वर -1, खटारा मारुति में पूना से बागेश्वर -2,खटारा मारुति में पूना से बागेश्वर – 3) हाथरस आ पहुंचे. काका हाथरसी का शहर. शहर में पहुंचते ही... Read more
दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ – अन्तिम हिस्सा
(पिछली क़िस्त – दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ – 3) तभी, शेखर ने सामने उगी लैंटाना यानी कुरी की झाड़ी पर से उसके नन्हे, रंग-बिरंगे फूलों का छोटा-सा गुच्छा तोड़ा और आकर मेरी वास्कट की जेब पर सजात... Read more
जोहार घाटी का सफ़र – 3
(पिछली क़िस्त का लिंक – जोहार घाटी का सफ़र – 2) काफी देर बाद यह सहमति बनी कि कैमरे दे दिए जाएं और कल शंकर भाई की हालत देखकर आगे जाने या न जाने का विचार किया जाएगा. कैमरों को फौजी स... Read more
सूरज की मिस्ड काल – 6
सूरज भाई गुलगपाड़ा सुनकर गर्मा गये आज सुबह जरा जल्दी जग गये. सूरज भाई का इन्तजार करते उधर देखते रहे जिधर से उनका आगमन होता है. सबसे पहली नजर से कोमल लालिमा देखकर लगा कि उगते सूरज को चारों दिश... Read more
कुतर्की समय में कुछ तार्किक बातें
यह 2011 साल का सितम्बर महीना था जब जबलपुर से निकलने वाली प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ ने दो दिन की सिनेमा कार्यशाला ‘प्रतिरोध का सिनेमा अभियान’ के साथ मिलकर आयोजित की थी. प्रतिरो... Read more


























