कुमाऊँ की खड़ी होली
इन दिनों उत्तराखंड के कुमाऊँ में होली की धूम है. जगह-जगह खड़ी होली और बैठकी होली का आयोजन भी किया जा रहा है. होली के रंग में रंगे होलियारों का जोश देखते ही बनता है. कल हुई चतुर्दशी का होली म... Read more
आधी सदी से आंदोलनरत उत्तराखंड का सबसे बड़ा गांव
बात उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी जब देश भर में घूमकर और लिखकर ‘ग्राम स्वराज’ का महत्व लोगों को बता रहे थे. ऐसा राज जो स्वशासन, सहभागिता और अधिकारों पर आधारित था. यह 1930 का दशक था. ठीक इ... Read more
फूल, तितली और बचपन
बचपन की दुनिया इस असल दुनिया से कई गुना खूबसूरत होती है. शायद इसलिए क्योंकि बचपन की दुनिया ख्यालों और ख्वाबों से भरी होती है. मेरी बचपन की दुनिया भी बहुत खूबसूरत हुआ करती थी. (Flowers Butter... Read more
पिछली कड़ी : तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन आजादी के दौर में 1946 से 1954 तक का समय उत्तरप्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों या आज के उत्तराखंड के लिए आधारभूत नीतिगत नींव र... Read more
अनूठी शान है कुमाऊनी महिला होली की
यूं तो होली पूरे देश में मनाए जाने वाला एक उमंग पर्व है परन्तु अलग अलग अंचलों में इस पर्व की विविधता देखने को मिलती है. उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में होली का विशिष्ट स्वरूप दृष्टिगोचर होता है... Read more
दुनिया के अनेक लोक कथाओं में ऐसा जिक्र तो आता है कि धरती जीवित है, वह सांस लेती है, महसूस करती है और कभी कभी अपने भीतर की आवाज भी सुनाती है. भारत में भी धरती को माँ कहा जाता है. हम उसे धरती... Read more
कथा दो नंदों की
उपकोशा की चतुराई, धैर्य और विवेक से भरी कथा के बाद अब कथा एक नए मोड़ पर पहुँचती है. यह वह समय है जब विद्या, योग और सत्ता; तीनों एक, दूसरे से टकराते हैं. इस खंड में हम देखते हैं कि कैसे व्याक... Read more
इस बदलते मौसम में दो पहाड़ी रेसिपी
पहाड़ों में मौसम का बदलना जीवन की गति को भी बदल देता है. सर्दियों की कड़ाके की ठंड अब ढलान पर है और धूप में हल्की गर्माहट घुलने लगी है. कुमाऊँ क्षेत्र में सदियों से यह मान्यता रही है कि भोजन... Read more
अल्मोड़े की लखौरी मिर्च
उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक संपदा, पारंपरिक खेती और लोक संस्कृति के लिए जाना जाता है. पहाड़ की मिट्टी, जलवायु और मेहनतकश किसानों की पहचान यहां के उत्पादों को एक विशिष्ट स्वरूप देती है. ऐसे ही उ... Read more
एक गुरु की मूर्खता
केरल की मिट्टी में कुछ तो है, या शायद वहाँ की हवा में, जो मलयालियों के स्वभाव में हल्की-सी बेबाकी, तंज और व्यंग्य भर देती है. इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मध्यकालीन केरल के कई प्रसिद्ध लो... Read more



























